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अधिकारियों की मिलीभगत से पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग में डायलिसिस का सामान बेच रहा बाहरी व्यक्ति

Mon, 08 Jan 2018 02:30 AM IST
Updated Mon, 08 Jan 2018 02:30 AM IST
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अधिकारियों की मिलीभगत से पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग में डायलिसिस का सामान बेच रहा बाहरी व्यक्ति
डायलिसिस विभाग में बाहरी व्यक्ति (बाएं से) दवा देता हुआ, मरीज को इंजेक्‍शन लगाने की तैयारी करता - फोटो : shailesh tiwari
अमर उजाला स्टिंग
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अधिकारियों की मिलीभगत से पीजीआई के नेफ्रोलॉजी विभाग में डायलिसिस का सामान बेच रहा बाहरी व्यक्ति

संजय कुमार/शैलेश तिवारी
रोहतक।
पीजीआईएमएस में लाला श्याम लाल अति विशिष्ट चिकित्सा केंद्र के नेफ्रोलॉजी विभाग की डायलिसिस यूनिट संस्थान के तीन शीर्ष अधिकारियों और एक विभागाध्यक्ष की बदौलत एक बाहरी व्यक्ति के हवाले है। यूनिट में बाहरी व्यक्ति डायलिसिस के सामान और इंजेक्शन के लिए 4200 रुपये तक वसूलता है।

वह मरीजों को इंजेक्शन के साथ ही ड्रिप भी लगाता है। इसके लिए यूनिट में ही इस व्यक्ति को कुर्सी, मेज, अलमारी आदि की सुविधाएं दी गई हैं। जबकि यही दवाएं मार्केट में खरीदी जाएं तो 3000 से 3200 रुपये में मिल सकती हैं। इस तरह सरकारी संस्थान के अधिकारी मरीजों के साथ लूट की खुली छूट दे रहे हैं।
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नेफ्रोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अमित मान हैं। कुछ जागरूक पाठकों ने इस संबंध में जानकारी दी तो अमर उजाला की टीम ने लगातार कई दिनों तक इस पर नजर रखी। इसके बाद अधिकारियों की हद दर्जे की लापरवाही का यह मामला सामने आया। डायलिसिस यूूनिट में चल रहे खेल में जूनियर डॉक्टरों की भी भूमिका अहम है।
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किडनी की डायलिसिस कराने आए मरीजों को जूनियर डॉक्टर, स्टाफ नर्स और तकनीशियन भी बाहरी व्यक्ति से डायलिसिस का सामान लेने की सलाह देते हैं। बता दें कि इस यूनिट में प्रतिदिन औसतन 20 मरीज डायलिसिस कराने आते हैं। इस बाबत प्रबंधन के तीन शीर्ष अधिकारियों और विभागाध्यक्ष से बात की गई तो उन्होंने जांच कराने की बात कही। यह तब है जबकि सबकुछ उनकी आंखों के सामने हो रहा है।

गौरतलब है कि एक मरीज को एक बार डायलिसिस कराने के लिए 1200 रुपये देने पड़ते हैं। एक माह में लगभग आठ बार इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके अलावा डायलिसिस के मरीज को खून बढ़ाने का 3000 रुपये का इंजेक्शन भी निजी व्यक्ति द्वारा उपलब्ध कराया जाता है। सवाल उठता है कि पीजीआई प्रबंधन ने किसी निजी व्यक्ति को अंदर बैठने की अनुमति किस आधार पर दे रखी है।

किसको जरूरत होती है डायलिसिस
डायलिसिस की जरूरत उन मरीजों को पड़ती है जो किडनी का प्रत्यारोपण नहीं करा पाते हैं। इन मरीजों के जीवन का अंतिम विकल्प डायलिसिस होता है। लगभग एक वर्ष पहले पीजीआई में मरीज को डायलिसिस का सामान निशुल्क मिलता था, लेकिन यह सुविधा एक यूनिट में थी दूसरी में नहीं। अब स्थिति यह हो गई है कोई सामान संस्थान से नहीं मिलता। यूनिट में सिर्फ दाखिल मरीजों को ही निशुल्क सामान दिया जाता है।

मरीज होते हैं भ्रमित
डायलिसिस कराने आए मरीजों को यह भी पता नहीं होता है कि सामान देने वाला कोई सरकारी आदमी है या बाहरी। इस व्यक्ति को दवाएं रखने के लिए बाकायदा एक अलमारी, मेज कुर्सी और सामान बेचने के लिए जगह भी दी गई है।

अधिकारी भी करते हैं अनदेखी
पीजीआईएमएस के एमएस और मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. नित्यानंद के ऑफिस के बाहर ही एक बाहरी व्यक्ति अपनी दुकान चला रहा है। लेकिन विभागाध्यक्ष को वह व्यक्ति नजर नहीं आता है।

पहले भी हो चुकी है शिकायत
सूत्रों की मानें तो विभाग में चल रही कालाबाजारी की पहले भी शिकायत हो चुकी है। मामले की विजिलेंस जांच भी हो चुकी है। अब तो विभाग के अंदर ही सामान उपलब्ध कराया जा रहा है।

एक घंटा कम होती है डायलिसिस
एक्सपर्ट की मानें तो एक मरीज की कम से कम चार घंटे डायलिसिस होनी चाहिए, लेकिन पीजीआई में तीन घंटे में ही प्रक्रिया पूरी कर दी जाती है। इससे मरीज का पूरा काम नहीं हो पाता। एक्सपर्ट बताते हैं कि इससे मरीज की आयु कम हो जाती है।

नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष के अलावा वीसी, रजिस्ट्रार व एमएस जिम्मेदार
नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अमित मान के अलावा संस्थान में वीसी प्रो. ओपी कालरा, रजिस्ट्रार डॉ. एचके अग्रवाल व चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नित्यानंद नेफ्रोलॉजिस्ट हैं। कुलपति को छोड़कर सभी डॉक्टरों के निर्देशन में किडनी के मरीजों की डायलिसिस होती है। इसके बावजूद मरीजों के साथ ठगी का खेल हो रहा है। नेफ्रोलॉजी विभाग की मानें तो कुलपति स्वयं नेफ्रोलॉजिस्ट होने के बाद अपने विभाग की सुध नहीं लेते।

बाहरी व्यक्ति करता है तकनीशियन का भी काम
बाहरी व्यक्ति की पैठ यहां तक है कि वह डायलिसिस की मशीन खराब हो जाने पर मशीन को भी डॉक्टर और तकनीशियन के साथ मिलकर ठीक करवाता है।

किडनी का डायलिसिस नेफ्रोलॉजी विभाग में होता है, लेकिन यह होता मेडिसन यूनिट के अंदर है। पहले सामान नि:शुल्क मिलता था, लेकिन आज कल ओपीडी वालों के लिए नि:शुल्क उपलब्ध नहीं है। 20 डायलिसिस प्रतिदिन के हिसाब से होती है। यहां आठ मशीन उपलब्ध हैं। जल्द ही संस्थान में हैपेटाइटिस बी, सी और एचआईवी के मरीजों की डायलिसिस करने की नई मशीन आ जाएगी। यूनिट में होने वाली अव्यवस्थाओं के लिए संबंधित अधिकारियों को सूचित किया जा चुका है।

- डॉ. अमित मान, विभागाध्यक्ष, नेफ्रोलॉजी विभाग, पीजीआईएमएस

हमारे डॉक्टर नेफ्रोलॉजी विभाग में जाकर मरीज का डायलिसिस करते हैं। वहां सामान कौन उपलब्ध कराता है, इसकी जानकारी नहीं है। बाहरी व्यक्ति वार्ड में नहीं बैठ सकता, यदि ऐसा है तो इसकी जांच के निर्देश दिए जाएंगे।
- डॉ. एचके अग्रवाल, रजिस्ट्रार, हेल्थ विश्वविद्यालय
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