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खेतों को खा गई सेम,खेती छोड़ अरावली के पहाडों पर मजदूरी कर रहे किसान

Sun, 25 Jun 2017 11:55 PM IST
Updated Sun, 25 Jun 2017 11:55 PM IST
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खेतों को खा गई सेम,खेती छोड़ अरावली के पहाडों पर मजदूरी कर रहे किसान
खेतों को खा गई सेम, खेती छोड़ पहाड़ों पर मजदूरी कर रहे किसान
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चरखी दादरी।
जिले के छह गांवों के करीब दो हजार किसान कृषि योग्य जमीन सेमग्रस्त होने से पहाड़ों पर पत्थर तोड़ने या फिर मजदूरी करने को विवश है। 1995 की बाढ़ के बाद से ही इन किसानों के खेतों में अन्न का एक दाना नहीं हुआ है। सरकारों की अनदेखी के कारण नाममात्र किसानों को कुछ मुआवजा दिया गया लेकिन वह पर्याप्त नहीं था। जिले में बार-बार जलभराव से बढ़ती सेम की समस्या के कारण खेती न होने पर अब किसान पहाड़ों पर पत्थर तोड़ अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। इस समय जिले की साढ़े पांच हजार एकड़ जमीन खेती लायक नहीं हैं इतना ही नहीं प्रति वर्ष मानसून बारिश से जलभराव होने पर यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। अकेेले गांव इमलोटा में करीब 1500 एकड़ जमीन खेती लायक नहीं है।
जानकारी के अनुसार जिले में 1995 की बाढ़ के बाद से हालात सुधरे नहीं हैं। बाढ़ के दौरान छह गांवों में लगातार करीब चार से पांच माह तक बाढ़ के पानी का जमाव बने रहने से कई गांवों में खेती की जमीन खराब हो गई। उसके बाद हर वर्ष की मानसून बारिश से इन गांवों में जलभराव लगातार बना रहा जिससे जमीन की उपजाऊ शक्ति लगातार क्षीण होती चली गई। जमीन को सेम ने जकड़ लिया जिससे अनाज पैदा होना ही बंद हो गया। जमीन दलदल बनने पर खेती के लायक नहीं रही। वैसे तो चरखी दादरी के करीब 18 गांव ऐसे हैं जहां हर साल करीब 200 एकड़ जमीन पूर्णतया खराब होने लगी है इससे जिले का कृषि योग्य एरिया भी लगातार खत्म होने लगा है। जिले का कुल रकबा एक लाख 22 हजार हेक्टेयर क्षेत्र है इसमें कृषि योग्य क्षेत्र अब मुश्किल से एक लाख 15 हजार एकड़ ही बचा है। इन जलभराव प्रभावित प्रमुख गांवों में इमलोटा, सरूपढ़, सातौर, भागवी, कंहेटी, झिंझर, अचीना, लोहरवाड़ा, जयश्री, कमोद, मिसरी, मिर्च, फतेहगढ़, साहुवास, चरखी, पांडवान, बिरही कलां, छपार, रासीवास,भैरवी आदि शामिल हैं। इनमें बरसाती पानी भराव के लिहाज से गांव इमलोटा, जयश्री, मिसरी, चरखी, पांडवान,बिरही को अति संवेदनशील माना जाता है। अब कई गांवों में खेती लायक जमीन न होने पर किसानों के समक्ष आजीविका का संकट पैदा होने लगा है। बहुत से ऐसे किसान हैं जिनकी पूरी जमीन इस जलभराव क्षेत्र में ही आती है ऐसे में उनके रोजी-रोटी का समक्ष संकट बना हुआ है। वे अब तक पूर्णतया इस खेती पर ही निर्भर रहे हैं। गांव पांडवान, बिरही कलां व चरखी दादरी के पश्चिमी दिशा में अरावली की पहाड़ियों पर रोजाना काफी किसान पत्थर तोड़कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं। इतना ही नहीं सैकड़ों की संख्या में किसान शहर में भी दिहाड़ी पर काम करने आते हैं। किसान दुकानों, प्रतिष्ठानों में श्रमिक के रूप में काम करने को मजबूर हैं।
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इमलोटा गांव की एक हजार एकड़ कृषि योग्य भूमि खराब
गांव इमलोटा पूर्व सरपंच धर्मबीर सिंह ने बताया कि उनके गांव में जमीन का कुल रकबा करीब 31 सौ एकड़ है। इसमें से करीब 15 सौ एकड़ जमीन जलभराव से खराब हो रही है। इसमें करीब एक हजार एकड़ जमीन खेती लायक नहीं है। इससे काफी किसान मजदूरी करने के लिए मजबूर हो गए हैं। उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से मुआवजा भी नाममात्र का ही मिला है। वहीं, सरपंच प्रतिनिधि ओमप्रकाश ने भी इस बात की पुष्टि की है।
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पांडवान में 400 एकड़ भूमि हर साल होती है मानसून में जलमग्न
गांव पांडवान निवासी सरपंच राजकरण ने बताया कि गांव की कुल जमीन 17 सौ एकड़ है। 400 एकड़ जमीन पर बारिश के पानी का जमाव हर साल होता है इससे जमीन अब खेती लायक नहीं रही है। इससे इन किसानों के लिए अब आजीविका का संकट पैदा हो गया है। सरपंच राजकरण ने बताया कि उनके आसपास अरावली की पहाड़ियां हैं जहां अब किसान पत्थर तोड़कर अपने परिवार का भरण पोषण करने को मजबूर हैं।
मिसरी गांव की 600 एकड़ भूमि पर नहीं हो पा रही बिजाई
सरपंच प्रतिनिधि ब्रह्मप्रकाश ने बताया कि मिसरी गांव में करीब 26 सौ एकड़ जमीन कृषि योग्य है लेकिन 1995 की बाढ़ के बाद से ही करीब 600 एकड़ पर फसलों की बिजाई ही नहीं हो पा रही है। करीब 700 एकड़ जमीन ऐसी है जिस पर कम बारिश होने पर बिजाई संभव है। 1995 की बाढ़ के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री भजनलाल ने मुआवजा दिया था लेकिन इसके बाद से कोई मुआवजा किसानों को नहीं दिया गया। करीब सौ एकड़ जमीन का पिछले साल बीमा भी करवाया था लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अब ऐसे किसान जिनकी जमीन जलभराव से खराब हो चुकी है। वे चरखी दादरी शहर में मजदूरी व अन्य छोटे-मोटे काम कर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं।
जयश्री में महज सौ एकड़ जमीन ही बची कृषि लायक
जयश्री सरपंच राजकुमार ने बताया कि गांव में कृषि योग्य करीब 635 एकड़ जमीन है। 1995 की बाढ़ के बाद से इसमें से महज करीब 100 एकड़ जमीन ही कृषि योग्य बची है। बाढ़ के बाद से किसानों को कोई मुआवजा किसी सरकार ने नहीं दिया। गांव की करीब 250 एकड़ जमीन का बीमा पिछली दफा करवाया गया था लेकिन नाममात्र किसानों को ही मुआवजा मिला है।
25 साल से परेशान बिरही कलां के परेशान
--गांव बिरही कलां के सरपंच प्रतिनिधि धर्मेंद्र का कहना है कि 1992 के बाद से ही गांव में जलभराव की समस्या है लेकिन 1995 की बाढ़ के बाद इसमें और इजाफा हो गया है। गांव में करीब 2200 एकड़ जमीन कृषि योग्य थी लेकिन करीब 1200 एकड़ जलभराव से प्रभावित है। करीब 1500 एकड़ से अधिक का बीमा पिछली दफा किसानों ने करवाया था लेकिन अब तक 40 से 50 एकड़ का मुआवजा ही किसानों को मिला है।

वर्जन
डीसी ने खुद इस बारे बाढ़ संभावित गांवों का दौरा कर सभी विभागों के अधिकारियों को दिशा-निर्देश दिए हैं। मानसून सत्र को लेकर लगभग जिला प्रशासन की तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। गांवों के खेतों में अगर बारिश का पानी भरता है तो तुरंत पंप सैट लगाकर इसकी निकासी की जाएगी। किसानों की मदद का प्रशासन हर संभव प्रयास करेगा।
ओमप्रकाश देवराला, एसडीएम
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