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फसलों के अवशेष से एमडीयू ने वाहनों के लिए तैयार किया ईको फ्रेंडली बायो इथेनॉल
Updated Tue, 22 May 2018 03:16 AM IST
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फसलों के अवशेष से एमडीयू ने वाहनों के लिए तैयार किया ईको फ्रेंडली बायो इथेनॉल
- एमडीयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की लैब में सूक्ष्म जीव विशेषज्ञों ने तैयार किया बॉयोफ्यूल, पेट्रोल से कम खर्च पर दौड़ सकेंगे वाहन
- खेतों में फसल के अवशेष जलाने से बढ़ रही प्रदूषण की समस्या का किया जा सकता है समाधान
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
बायो इथेनॉल ईंधन का नया विकल्प है, ईको फ्रेंडली है तो प्रदूषण की समस्या का समाधान है और पेट्रोल से सस्ता है।
यह कमाल कर दिखाया है एमडीयू के माइक्रोबायोलोजिस्ट्स ने। ईको फ्रेंडली बायो इथेनॉल वाहनों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। लैब में किए शोध में यह स्पष्ट हो गया है। अब एमडीयू के सूक्ष्मजीव विशेषज्ञ इस ईंधन के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर प्रयासरत हैं। इसके चलते राज्य व केंद्र सरकार से विवि को अप्रैल में 90 लाख रुपये का बजट मिला है। हालांकि इससे बड़ा प्लांट लगाना असंभव है, मगर लैब में शोध के लिए जरूरी उपकरण खरीदे जा सकते हैं।
दरअसल, एमडीयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की लैब में ईंधन का नया विकल्प तलाशा गया है। इसे बायो इथेनॉल नाम दिया गया है। यह ईंधन फसलों के अवशेष से तैयार किया जाएगा। इसलिए इसे बायोफ्यूल भी कहा गया है। लैब में 10 ग्राम एग्रो वेस्ट से चार ग्राम इथेनॉल बनाया गया है। इस मात्रा को बेहतर सुविधाओं से और बढ़ाया जा सकता है। ये पेट्रोल से सस्ता रहेगा। खास बात यह रहेगी कि यह पूरी तरह ईको फ्रेंडली है। इस ईंधन के जलने से किसी तरह का प्रदूषण नहीं होगा। पर्यावरण पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
यूं तैयार होता है बायो इथेनॉल
सूक्ष्मजीव विशेषज्ञ के मुताबिक, फसल के अवशेष को लेकर लैब में शोध किया गया। इस दौरान एग्रो वेस्ट पर फंगस ग्रो की गई। फंगस से एंजाइम तैयार हुआ। एंजाइम ने वेस्ट को एक्सोज व पैंटोज शुगर में बदल दिया। इस शुगर से तरल रूप में बायो इथेनॉल प्राप्त हुई। कम मात्रा होने पर इसे पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक मिक्स करके प्रयोग किया जा सकता है। इससे पेट्रो पदार्थों पर हमारी 10 प्रतिशत निर्भर्ता कम होगी।
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ब्राजील में बायोफ्यूल से दौड़ रहे वाहन
ब्राजील में गन्ने से बायोफ्यूल बनाया जा रहा है। यह पर्याप्त मात्रा में होने के चलते उनकी पेट्रोल व डीजल पर निर्भरता नहीं है। इसके अलावा यूएस मक्का से इथेनॉल बना रहा है। इससे वह ईंधन में आत्मनिर्भर बना है।
पर्यावरण में नहीं फैलेगा प्रदूषण
फसली सीजन में फसल की कटाई के बाद अक्सर अवशेष को लेकर विवाद उठता है। खासकर फसल अवशेष को जलाए जाने पर उठने वाले धुएं से। रबि व खरीफ फसलों की कटाई के बाद करीब 10 हजर टन से ज्यादा पराली निकलती है। इसमें से ज्यादातर को किसान प्रयोग में नहीं आने पर जला देते हैं। इस वेस्ट के जलने से कार्बनडाईऑक्साइड सरीखी हानिकारक गैस वायूमंडल में फैल कर इसे दूषित बनाती है। पराली में मौजूद सिलिका के कारण पशुओं के इसे हजम करना मुश्किल रहता है। सर्दी के मौसम में एग्रो वेस्ट जलने से स्मॉग की समस्या उभर कर सामने आती है। इस स्थिति में सड़क पर चलना तक मुश्किल हो जाता है। बच्चों व बुजुर्गों के अलावा दमा रोगियों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। ऐसे में विपक्ष भी सरकार पर किसनों की फसल के अवशेष खरीदने का दबाव बनाता है।
किसानों को होगी अतिरिक्त आय
बायो इथेनॉल को ईंधन के विकल्प में उपयोग करने के लिए फसलों के अवशेष की जरूरत होगी। यह जरूरत पूरी कर किसान भी फसल से अतिरिक्त आय कमा सकता है। फसल निकालने के बाद बचे अवशेष को जलाने के बजाय संबंधित फर्म इसे खरीद लेगी और इससे बायो इथेनॉल तैयार कर सकेगी।
30 दिन में 3000 हजार वाहन उतर रहे सड़क पर
सड़कों पर वाहनों की भीड़ तेजी से बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो हर महीने औसतन तीन हजार गैर व्यवसायिक वाहन खरीदे जा रहे हैं। व्यावसायिक वाहनों का आंकड़ा एक महीने में करीब 100 का है। ऐसे में ईंधन के रूप में पेट्रो पदार्थों की मांग बढ़ना स्वभाविक है। इस जरूरत के चलते पेट्रोल के दाम 75 रुपये प्रति लीटर के आसपास बने हुए हैं। पेट्रोल की उपलब्धता व खपत के चलते वाहनों के ईंधन के विकल्प तलाश्ना जरूरी हो गया है। बयोफ्यूल इस ओर बेहतर कदम साबित हो सकता है।
विवि के सूक्ष्मजीव विशेषज्ञों ने लैब में बायोफ्यूल तैयार किया है। फसलों के अवशेष से इथेनॉल के रूप में ईको फ्रेंडली ईंधन तैयार किया जा सकता है। यह पेट्रोल से सस्ता रहेगा। इसके लिए बड़े प्लांट लगाकर किसानों से फसल अवशेष लेकर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहतर है। इस काम में डॉ. बिजेंद्र सिंह, डॉ. केके शर्मा, डॉ. राजीव कपूर, डॉ. अनीता, डॉ. पूजा गुलाटी, डॉ. संजय कुमार, डॉ. पूजा सुनेजा भी सहयोग कर रही हैं। फिलहाल लैब में बायोफ्यूल के व्यावसायिक इस्तेमाल पर काम चल रहा है।
- प्रो. प्रत्यूश शुक्ला, एचओडी, माइक्रोबायोलॉजी, एमडीयू।
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- एमडीयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की लैब में सूक्ष्म जीव विशेषज्ञों ने तैयार किया बॉयोफ्यूल, पेट्रोल से कम खर्च पर दौड़ सकेंगे वाहन
- खेतों में फसल के अवशेष जलाने से बढ़ रही प्रदूषण की समस्या का किया जा सकता है समाधान
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक।
बायो इथेनॉल ईंधन का नया विकल्प है, ईको फ्रेंडली है तो प्रदूषण की समस्या का समाधान है और पेट्रोल से सस्ता है।
यह कमाल कर दिखाया है एमडीयू के माइक्रोबायोलोजिस्ट्स ने। ईको फ्रेंडली बायो इथेनॉल वाहनों में ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। लैब में किए शोध में यह स्पष्ट हो गया है। अब एमडीयू के सूक्ष्मजीव विशेषज्ञ इस ईंधन के व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर प्रयासरत हैं। इसके चलते राज्य व केंद्र सरकार से विवि को अप्रैल में 90 लाख रुपये का बजट मिला है। हालांकि इससे बड़ा प्लांट लगाना असंभव है, मगर लैब में शोध के लिए जरूरी उपकरण खरीदे जा सकते हैं।
दरअसल, एमडीयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग की लैब में ईंधन का नया विकल्प तलाशा गया है। इसे बायो इथेनॉल नाम दिया गया है। यह ईंधन फसलों के अवशेष से तैयार किया जाएगा। इसलिए इसे बायोफ्यूल भी कहा गया है। लैब में 10 ग्राम एग्रो वेस्ट से चार ग्राम इथेनॉल बनाया गया है। इस मात्रा को बेहतर सुविधाओं से और बढ़ाया जा सकता है। ये पेट्रोल से सस्ता रहेगा। खास बात यह रहेगी कि यह पूरी तरह ईको फ्रेंडली है। इस ईंधन के जलने से किसी तरह का प्रदूषण नहीं होगा। पर्यावरण पूरी तरह सुरक्षित रहेगा।
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यूं तैयार होता है बायो इथेनॉल
सूक्ष्मजीव विशेषज्ञ के मुताबिक, फसल के अवशेष को लेकर लैब में शोध किया गया। इस दौरान एग्रो वेस्ट पर फंगस ग्रो की गई। फंगस से एंजाइम तैयार हुआ। एंजाइम ने वेस्ट को एक्सोज व पैंटोज शुगर में बदल दिया। इस शुगर से तरल रूप में बायो इथेनॉल प्राप्त हुई। कम मात्रा होने पर इसे पेट्रोल में 10 प्रतिशत तक मिक्स करके प्रयोग किया जा सकता है। इससे पेट्रो पदार्थों पर हमारी 10 प्रतिशत निर्भर्ता कम होगी।
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ब्राजील में बायोफ्यूल से दौड़ रहे वाहन
ब्राजील में गन्ने से बायोफ्यूल बनाया जा रहा है। यह पर्याप्त मात्रा में होने के चलते उनकी पेट्रोल व डीजल पर निर्भरता नहीं है। इसके अलावा यूएस मक्का से इथेनॉल बना रहा है। इससे वह ईंधन में आत्मनिर्भर बना है।
पर्यावरण में नहीं फैलेगा प्रदूषण
फसली सीजन में फसल की कटाई के बाद अक्सर अवशेष को लेकर विवाद उठता है। खासकर फसल अवशेष को जलाए जाने पर उठने वाले धुएं से। रबि व खरीफ फसलों की कटाई के बाद करीब 10 हजर टन से ज्यादा पराली निकलती है। इसमें से ज्यादातर को किसान प्रयोग में नहीं आने पर जला देते हैं। इस वेस्ट के जलने से कार्बनडाईऑक्साइड सरीखी हानिकारक गैस वायूमंडल में फैल कर इसे दूषित बनाती है। पराली में मौजूद सिलिका के कारण पशुओं के इसे हजम करना मुश्किल रहता है। सर्दी के मौसम में एग्रो वेस्ट जलने से स्मॉग की समस्या उभर कर सामने आती है। इस स्थिति में सड़क पर चलना तक मुश्किल हो जाता है। बच्चों व बुजुर्गों के अलावा दमा रोगियों को भारी परेशानी उठानी पड़ती है। ऐसे में विपक्ष भी सरकार पर किसनों की फसल के अवशेष खरीदने का दबाव बनाता है।
किसानों को होगी अतिरिक्त आय
बायो इथेनॉल को ईंधन के विकल्प में उपयोग करने के लिए फसलों के अवशेष की जरूरत होगी। यह जरूरत पूरी कर किसान भी फसल से अतिरिक्त आय कमा सकता है। फसल निकालने के बाद बचे अवशेष को जलाने के बजाय संबंधित फर्म इसे खरीद लेगी और इससे बायो इथेनॉल तैयार कर सकेगी।
30 दिन में 3000 हजार वाहन उतर रहे सड़क पर
सड़कों पर वाहनों की भीड़ तेजी से बढ़ रही है। सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो हर महीने औसतन तीन हजार गैर व्यवसायिक वाहन खरीदे जा रहे हैं। व्यावसायिक वाहनों का आंकड़ा एक महीने में करीब 100 का है। ऐसे में ईंधन के रूप में पेट्रो पदार्थों की मांग बढ़ना स्वभाविक है। इस जरूरत के चलते पेट्रोल के दाम 75 रुपये प्रति लीटर के आसपास बने हुए हैं। पेट्रोल की उपलब्धता व खपत के चलते वाहनों के ईंधन के विकल्प तलाश्ना जरूरी हो गया है। बयोफ्यूल इस ओर बेहतर कदम साबित हो सकता है।
विवि के सूक्ष्मजीव विशेषज्ञों ने लैब में बायोफ्यूल तैयार किया है। फसलों के अवशेष से इथेनॉल के रूप में ईको फ्रेंडली ईंधन तैयार किया जा सकता है। यह पेट्रोल से सस्ता रहेगा। इसके लिए बड़े प्लांट लगाकर किसानों से फसल अवशेष लेकर इस्तेमाल किया जा सकता है। यह पर्यावरण की दृष्टि से भी बेहतर है। इस काम में डॉ. बिजेंद्र सिंह, डॉ. केके शर्मा, डॉ. राजीव कपूर, डॉ. अनीता, डॉ. पूजा गुलाटी, डॉ. संजय कुमार, डॉ. पूजा सुनेजा भी सहयोग कर रही हैं। फिलहाल लैब में बायोफ्यूल के व्यावसायिक इस्तेमाल पर काम चल रहा है।
- प्रो. प्रत्यूश शुक्ला, एचओडी, माइक्रोबायोलॉजी, एमडीयू।