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आरटीआई का पहले जवाब नहीं, दिया तो गलत और मांगी माफी जुर्माना भरने के निर्देश
Updated Fri, 22 Jun 2018 03:04 AM IST
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आरटीआई का पहले जवाब नहीं, दिया तो गलत और मांगी माफी जुर्माना भरने के निर्देश
- ‘रक्त दाता से प्रोफार्मा में पूछी जाने वाली बीमारियों में नहीं का विकल्प ही नहीं’
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक। पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के ब्लड बैंक की ओर से जारी प्रोफार्मा में रक्तदाता से पूछी जाने वाली बीमारियों में नहीं का विकल्प न होने के मामले पर प्रशासन को माफी मांगनी पड़ी है। इसके अलावा आरटीआई में पूछा गया था कि क्या रक्तदाता का पहले एचबी व ब्लड ग्रुप टेस्ट होता है, तो इसके जवाब में पहले हां कहा गया और बाद में न कहते हुए गलती मानी गई। यही नहीं आरटीआई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि संस्थान ने स्वास्थ्य विभाग के एसीएस के निर्देशों की अवहेलना करते हुए एंटी तंबाकू एक्ट के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया था।
हिसार निवासी अशोक कुमार प्रजापत की ओर से मांगी गई जानकारी में संस्थान की आरटीआई शाखा पर सवाल खडे़ कर दिए हैं। अशोक ने 19 अगस्त 2016 को आरटीआई लगा कर सवाल पूछा था कि आप रक्तदाता का रक्त लेने से पहले उसका एचबी व ब्लड ग्रुप जांच करते हैं या नहीं। दूसरे सवाल में पूछा गया कि रक्तदाता से पूछी जाने वाली जानकारी के प्रोफार्मा में अंग्रेजी में तो यस और नो के ऑप्शन हैं, जबकि हिंदी में केवल हां का ही विकल्प है, इसमें नहीं का कोई विकल्प क्यों नहीं है। तीसरे सवाल में पूछा गया कि संस्थान को स्वास्थ्य विभाग के एसीएस की ओर से एंटी तंबाकू एक्ट के तहत जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश हैं, क्या उसका पालन हो रहा है। इस संबंध में संस्थान ने पहले तो प्रार्थी को कोई सूचना ही नहीं दी। इस पर जब प्रार्थी ने पहली अपील 19 अगस्त 2016 को लगाई तो कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद दूसरी अपील 8 मार्च 2017 को चंडीगढ़ में लगाई गई। इस पर संस्थान ने आधे-अधूरे और गलत जवाब दिए। प्रार्थी ने जब चंडीगढ़ फिर संपर्क किया तो इस पर संस्थान को 29 नवंबर 2017 को पहला शो कॉज नोटिस जारी हुआ। इस पर संस्थान ने अपनी गलती मानी और कहा कि उन्होंने गलत शपथ पत्र दिया है। वह रक्तदाता का पहले एचबी व ब्लड ग्र्रुप नहीं जांच करते। दूसरे प्रोफार्मा को भी बदल दिया है, इसमें नहीं का विकल्प भी डाल दिया गया है। तीसरा सवाल एंटी तंबाकू एक्ट पर संस्थान फिर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया। इस पर कमीशन ने माना कि प्रार्थी ने जो मुद्दे उठाए हैं वह जनहित के हैं। पीजीआईएमएस ने जानबूझ कर जवाब देने में देरी की और गुमराह करने वाले जवाब दिए। इस पर संस्थान को दूसरा शो कॉज नोटिस जारी हुआ। इस पर संस्थान ने कहा कि प्रार्थी स्वयं आकर रिकॉर्ड जांच ले और जो जानकारी चाहिए वह ले ले। इस पर कमीशन ने संज्ञान लेते हुए कहा कि प्रार्थी का इस चक्कर काटने में खर्च भी हुआ है। इसके लिए वह प्रार्थी को पांच हजार रुपये और सारी जानकारी सहित अपना जवाब 31 मई 2018 को दे और 29 जून 2018 को स्वयं कमीशन के समक्ष पेश हो।
मनमर्जी से चलती है संस्थान की आरटीआई शाखा
जनहित की याचिका पर संस्थान ने जवाब देने में दो साल लगा दिए। वह भी जब प्रार्थी लगातार अपने केस को फॉलो करता रहा। संस्थान की आरटीआई शाखा में कर्मचारियों व अधिकारियों की मनमर्जी चल रही है। यहां पहला तो जवाब नहीं दिया जाता, दूसरे देेते हैं तो गलत जवाब दे देते हैं। कुछ विभागों की स्थिति यह है कि वह जवाब ही देना पसंद नहीं करते। इसका नतीजा यह हो रहा है कि आरटीआई शाखा का स्टाफ हजारों सवालों तले दबा हुआ है।
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हिंदी की मिस प्रिंटिंग बन गई मजाक
अंग्रेजी में भले ही सही जवाब पूछे गए, लेकिन हिंदी में नहीं का विकल्प न होना मजाक बन गया। क्योंकि इसमें खाना खाने, क्रोनिक बीमारी होने, एचआईवी, कैंसर होने के विकल्प में नहीं चुनने के लिए स्थान ही नहीं था। हालांकि विभाग इसे लिपिकीय गलती मान रहा है, लेकिन आरटीआई में इस प्रोफार्मा को भेजना बताता है कि अधिकारी कमीशन को लेकर कितने अलर्ट हैं।
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- ‘रक्त दाता से प्रोफार्मा में पूछी जाने वाली बीमारियों में नहीं का विकल्प ही नहीं’
अमर उजाला ब्यूरो
रोहतक। पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के ब्लड बैंक की ओर से जारी प्रोफार्मा में रक्तदाता से पूछी जाने वाली बीमारियों में नहीं का विकल्प न होने के मामले पर प्रशासन को माफी मांगनी पड़ी है। इसके अलावा आरटीआई में पूछा गया था कि क्या रक्तदाता का पहले एचबी व ब्लड ग्रुप टेस्ट होता है, तो इसके जवाब में पहले हां कहा गया और बाद में न कहते हुए गलती मानी गई। यही नहीं आरटीआई की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि संस्थान ने स्वास्थ्य विभाग के एसीएस के निर्देशों की अवहेलना करते हुए एंटी तंबाकू एक्ट के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया था।
हिसार निवासी अशोक कुमार प्रजापत की ओर से मांगी गई जानकारी में संस्थान की आरटीआई शाखा पर सवाल खडे़ कर दिए हैं। अशोक ने 19 अगस्त 2016 को आरटीआई लगा कर सवाल पूछा था कि आप रक्तदाता का रक्त लेने से पहले उसका एचबी व ब्लड ग्रुप जांच करते हैं या नहीं। दूसरे सवाल में पूछा गया कि रक्तदाता से पूछी जाने वाली जानकारी के प्रोफार्मा में अंग्रेजी में तो यस और नो के ऑप्शन हैं, जबकि हिंदी में केवल हां का ही विकल्प है, इसमें नहीं का कोई विकल्प क्यों नहीं है। तीसरे सवाल में पूछा गया कि संस्थान को स्वास्थ्य विभाग के एसीएस की ओर से एंटी तंबाकू एक्ट के तहत जागरूकता अभियान चलाने के निर्देश हैं, क्या उसका पालन हो रहा है। इस संबंध में संस्थान ने पहले तो प्रार्थी को कोई सूचना ही नहीं दी। इस पर जब प्रार्थी ने पहली अपील 19 अगस्त 2016 को लगाई तो कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद दूसरी अपील 8 मार्च 2017 को चंडीगढ़ में लगाई गई। इस पर संस्थान ने आधे-अधूरे और गलत जवाब दिए। प्रार्थी ने जब चंडीगढ़ फिर संपर्क किया तो इस पर संस्थान को 29 नवंबर 2017 को पहला शो कॉज नोटिस जारी हुआ। इस पर संस्थान ने अपनी गलती मानी और कहा कि उन्होंने गलत शपथ पत्र दिया है। वह रक्तदाता का पहले एचबी व ब्लड ग्र्रुप नहीं जांच करते। दूसरे प्रोफार्मा को भी बदल दिया है, इसमें नहीं का विकल्प भी डाल दिया गया है। तीसरा सवाल एंटी तंबाकू एक्ट पर संस्थान फिर संतोषजनक जवाब नहीं दे पाया। इस पर कमीशन ने माना कि प्रार्थी ने जो मुद्दे उठाए हैं वह जनहित के हैं। पीजीआईएमएस ने जानबूझ कर जवाब देने में देरी की और गुमराह करने वाले जवाब दिए। इस पर संस्थान को दूसरा शो कॉज नोटिस जारी हुआ। इस पर संस्थान ने कहा कि प्रार्थी स्वयं आकर रिकॉर्ड जांच ले और जो जानकारी चाहिए वह ले ले। इस पर कमीशन ने संज्ञान लेते हुए कहा कि प्रार्थी का इस चक्कर काटने में खर्च भी हुआ है। इसके लिए वह प्रार्थी को पांच हजार रुपये और सारी जानकारी सहित अपना जवाब 31 मई 2018 को दे और 29 जून 2018 को स्वयं कमीशन के समक्ष पेश हो।
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मनमर्जी से चलती है संस्थान की आरटीआई शाखा
जनहित की याचिका पर संस्थान ने जवाब देने में दो साल लगा दिए। वह भी जब प्रार्थी लगातार अपने केस को फॉलो करता रहा। संस्थान की आरटीआई शाखा में कर्मचारियों व अधिकारियों की मनमर्जी चल रही है। यहां पहला तो जवाब नहीं दिया जाता, दूसरे देेते हैं तो गलत जवाब दे देते हैं। कुछ विभागों की स्थिति यह है कि वह जवाब ही देना पसंद नहीं करते। इसका नतीजा यह हो रहा है कि आरटीआई शाखा का स्टाफ हजारों सवालों तले दबा हुआ है।
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हिंदी की मिस प्रिंटिंग बन गई मजाक
अंग्रेजी में भले ही सही जवाब पूछे गए, लेकिन हिंदी में नहीं का विकल्प न होना मजाक बन गया। क्योंकि इसमें खाना खाने, क्रोनिक बीमारी होने, एचआईवी, कैंसर होने के विकल्प में नहीं चुनने के लिए स्थान ही नहीं था। हालांकि विभाग इसे लिपिकीय गलती मान रहा है, लेकिन आरटीआई में इस प्रोफार्मा को भेजना बताता है कि अधिकारी कमीशन को लेकर कितने अलर्ट हैं।