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Rewari News: पुलिस की लापरवाह जांच बनी आरोपियों के बरी होने की वजह, कोर्ट ने बताई कई कमियां

Fri, 12 Jun 2026 11:31 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी Updated Fri, 12 Jun 2026 11:31 PM IST
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Negligent police investigation led to the acquittal of the accused; the court pointed out several shortcomings.
रेवाड़ी। मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी जोगिंद्री की अदालत ने बाइक चोरी व फर्जी नंबर प्लेट लगाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए दो आरोपियों लिसाना निवासी पुनीत व गुरुग्राम के सथराना निवासी रामनिवास को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। अदालत ने माना कि पुलिस जांच में खामियां रहीं और अभियोजन पक्ष आरोपों को सिद्ध करने में विफल रहा।
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शहर थाना क्षेत्र के बल्लूवाड़ा निवासी विजय कुमार अग्रवाल की मोटरसाइकिल 30 जनवरी 2025 को उनके घर के बाहर से चोरी हो गई थी। उन्होंने ऑनलाइन शिकायत दर्ज कराई थी। 6 अप्रैल 2025 को पुलिस चौकी पहुंचकर लिखित शिकायत दी। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की और आरोपी पुनीत को गिरफ्तार कर लिया।
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आरोपी ने चोरी का जुर्म स्वीकार करते हुए चोरी की गई बाइक पर फर्जी नंबर प्लेट लगाकर इस्तेमाल करने की बात कही। बाद में गुरुग्राम निवासी रामनिवास को जांच में शामिल किया गया। रामनिवास ने आरोपी को फर्जी नंबर प्लेट दिलाई थी।
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मामले में अभियोजन पक्ष ने नौ गवाहों को पेश किया। शिकायतकर्ता विजय कुमार अग्रवाल ने जिरह के दौरान कहा कि उन्होंने आरोपियों को चोरी करते नहीं देखा। वह यह नहीं जानते कि वारदात किसने की। अदालत ने इसे अभियोजन पक्ष के लिए महत्वपूर्ण कमजोरी माना।
पुलिस जांच में मिलीं खामियां : 10 जून को सुनाए फैसले में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा है कि शिकायतकर्ता की बाइक आरोपियों ने ही चुराई थी। यह साबित भी नहीं किया जा सका कि आरोपी ने मोटरसाइकिल पर नकली नंबर प्लेट लगाई थी या सबूत मिटाकर असली अपराधी को बचाने की कोशिश की थी।
अहम विरोधाभास, एफआईआर दर्ज करने में बिना वजह देरी, कथित नकली नंबर प्लेट का न मिलना, उसे बदलने के बारे में दस्तावेजी सबूतों की कमी और पुलिस की अधूरी जांच अभियोजन पक्ष की कहानी पर काफी शक पैदा करते हैं।

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अपराध बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम
कोर्ट ने कहा कि यह अदालत इस बात से वाकिफ है कि जांच के दौरान स्वतंत्र गवाहों को शामिल करना कोई सख्त नियम नहीं है। निजी गवाहों को शामिल न करना अभियोजन पक्ष के मामले को खत्म नहीं करता है। इस मामले के खास तथ्यों और हालात में जहां कथित चोरी की तारीख से लगभग दो महीने की देरी के बाद एफआईआर दर्ज की गई थी। जांच अधिकारी के लिए यह समझदारी भरा होता कि वे कम से कम मोटरसाइकिल बरामदगी के समय शिकायतकर्ता या किसी स्वतंत्र गवाह को शामिल करते। ऐसी कोई कोशिश नहीं की गई। ऊपर बताई गई कमियां अहम हो जाती हैं और अभियोजन पक्ष के मामले को और कमजोर करती हैं। तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अभियोजन पक्ष आरोपी का अपराध बिना किसी शक के साबित करने में नाकाम रहा है। इसलिए शक का लाभ देते हुए आरोपी व्यक्तियों को उन पर लगाए गए आरोपों से बरी किया जाता है।
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