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Rewari News: जमीन के मामले में निचली अदालत का फैसला बरकरार
Fri, 11 Jul 2025 11:40 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
Updated Fri, 11 Jul 2025 11:40 PM IST
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संवाद न्यूज एजेंसी
रेवाड़ी। जमीन के मामले में एडिशनल सेशन जज (एसीजे) जतिन गर्ग की अदालत ने कोसली की निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। मलेसियावास निवासी सदाराम के वकील ने सिविल अपील निचली अदालत कोसली की ओर से पारित 18 जनवरी 2020 के फैसले के विरुद्ध एडिशनल सेशन जज की अदालत में सिविल अपील दायर की थी।
मामले में एसीजे की अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि जमीन ग्राम पंचायत की है और वादग्रस्त संपत्ति पर कृषि-कब्जा भी रखती है। वादी को उस पर स्वामित्व का दावा करने और 40-50 वर्षों से कृषि-कब्जा होने के कारण स्वामित्व के कॉलम में अपना नाम दर्ज करने की घोषणा मांगने का कोई अधिकार नहीं है।
वादी राहत पाने का भी हकदार नहीं है क्योंकि प्रतिवादी समय-समय पर उसे भूमि निश्चित अवधि के लिए पट्टे पर दी थी। समग्रता, तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस न्यायालय की राय में निचली अदालत ने वादी के वाद को लागत सहित सही रूप से खारिज कर दिया है।
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इस प्रकार निचली न्यायालय द्वारा पारित 18 जनवरी 2020 के निर्णय और डिक्री में कोई त्रुटि नहीं है। ऐसे में वर्तमान अपील विफल होती है और इसे लागत सहित खारिज किया जाता है।
सदाराम के वकील ने कोर्ट में बताया था कि वर्तमान सिविल अपील निचली अदालत कोसली द्वारा पारित 18 जनवरी 2020 के निर्णय के विरुद्ध है। कोसली कोर्ट द्वारा पारित आदेश के तहत वादी का वाद लागत सहित खारिज कर दिया गया था।
वादी वादग्रस्त संपत्ति का स्वामी होने का हक रखता है क्योंकि वह पिछले 50 वर्षों से खेती योग्य भूमि पर कार्य कर रहा है। राजस्व अभिलेख में स्वामित्व के कॉलम में अपना नाम दर्ज कराने का अधिकारी है।
साथ ही स्थायी निषेधाज्ञा के लिए भी एक आदेश मांगा गया है कि प्रतिवादियों को वादी के वादग्रस्त संपत्ति पर शांतिपूर्ण कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोका जाए और यदि वाद के लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी वादी को संपत्ति से बेदखल करने या उसमें हस्तक्षेप करने में सफल हो जाते हैं, तो वादी अनिवार्य निषेधाज्ञा के आदेश का हकदार है।
बताया कि भूमि गांव मलेसियावास तहसील कोसली की राजस्व संपदा में है, पर कृषि भूमि पर काबिज है। एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जतिन गर्ग ने कहा कि दोनों पक्षों के दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार किया गया। वादी अपना मामला साबित नहीं कर पाया है। साक्ष्य में यह बात आई है कि ग्राम पंचायत विवादित संपत्ति की मालिक है। वादी 40-50 वर्षों से विवादित संपत्ति पर कब्जा साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सका।
कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य में यह बात सामने आई है कि पूर्व में ग्राम पंचायत जाखाला और मलेसियावास में वादग्रस्त संपत्ति पर किकर के पेड़ थे, जिन्हें 1991 में नीलामी में बेच दिया गया था। इसके बाद वादग्रस्त भूमि को कृषि के लिए पट्टे पर दिया गया था।
उपरोक्त गवाहों ने मुकदमे वाली संपत्ति को अन्य सह-ग्रामीणों को एक वर्ष के कार्यकाल के लिए पट्टे पर देने को दर्शाने वाले दस्तावेज भी दाखिल किए हैं। इस संबंध में पट्टा रजिस्टर डी1 की प्रति से पता चलता है कि प्लॉट नंबर 6 वाली संपत्ति को 1993-1994 में सदा राम को पट्टे पर दिया गया था।
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रेवाड़ी। जमीन के मामले में एडिशनल सेशन जज (एसीजे) जतिन गर्ग की अदालत ने कोसली की निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। मलेसियावास निवासी सदाराम के वकील ने सिविल अपील निचली अदालत कोसली की ओर से पारित 18 जनवरी 2020 के फैसले के विरुद्ध एडिशनल सेशन जज की अदालत में सिविल अपील दायर की थी।
मामले में एसीजे की अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि जमीन ग्राम पंचायत की है और वादग्रस्त संपत्ति पर कृषि-कब्जा भी रखती है। वादी को उस पर स्वामित्व का दावा करने और 40-50 वर्षों से कृषि-कब्जा होने के कारण स्वामित्व के कॉलम में अपना नाम दर्ज करने की घोषणा मांगने का कोई अधिकार नहीं है।
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वादी राहत पाने का भी हकदार नहीं है क्योंकि प्रतिवादी समय-समय पर उसे भूमि निश्चित अवधि के लिए पट्टे पर दी थी। समग्रता, तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस न्यायालय की राय में निचली अदालत ने वादी के वाद को लागत सहित सही रूप से खारिज कर दिया है।
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इस प्रकार निचली न्यायालय द्वारा पारित 18 जनवरी 2020 के निर्णय और डिक्री में कोई त्रुटि नहीं है। ऐसे में वर्तमान अपील विफल होती है और इसे लागत सहित खारिज किया जाता है।
सदाराम के वकील ने कोर्ट में बताया था कि वर्तमान सिविल अपील निचली अदालत कोसली द्वारा पारित 18 जनवरी 2020 के निर्णय के विरुद्ध है। कोसली कोर्ट द्वारा पारित आदेश के तहत वादी का वाद लागत सहित खारिज कर दिया गया था।
वादी वादग्रस्त संपत्ति का स्वामी होने का हक रखता है क्योंकि वह पिछले 50 वर्षों से खेती योग्य भूमि पर कार्य कर रहा है। राजस्व अभिलेख में स्वामित्व के कॉलम में अपना नाम दर्ज कराने का अधिकारी है।
साथ ही स्थायी निषेधाज्ञा के लिए भी एक आदेश मांगा गया है कि प्रतिवादियों को वादी के वादग्रस्त संपत्ति पर शांतिपूर्ण कब्जे में हस्तक्षेप करने से रोका जाए और यदि वाद के लंबित रहने के दौरान, प्रतिवादी वादी को संपत्ति से बेदखल करने या उसमें हस्तक्षेप करने में सफल हो जाते हैं, तो वादी अनिवार्य निषेधाज्ञा के आदेश का हकदार है।
बताया कि भूमि गांव मलेसियावास तहसील कोसली की राजस्व संपदा में है, पर कृषि भूमि पर काबिज है। एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज जतिन गर्ग ने कहा कि दोनों पक्षों के दस्तावेजी साक्ष्यों पर विचार किया गया। वादी अपना मामला साबित नहीं कर पाया है। साक्ष्य में यह बात आई है कि ग्राम पंचायत विवादित संपत्ति की मालिक है। वादी 40-50 वर्षों से विवादित संपत्ति पर कब्जा साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं पेश कर सका।
कोर्ट ने कहा कि साक्ष्य में यह बात सामने आई है कि पूर्व में ग्राम पंचायत जाखाला और मलेसियावास में वादग्रस्त संपत्ति पर किकर के पेड़ थे, जिन्हें 1991 में नीलामी में बेच दिया गया था। इसके बाद वादग्रस्त भूमि को कृषि के लिए पट्टे पर दिया गया था।
उपरोक्त गवाहों ने मुकदमे वाली संपत्ति को अन्य सह-ग्रामीणों को एक वर्ष के कार्यकाल के लिए पट्टे पर देने को दर्शाने वाले दस्तावेज भी दाखिल किए हैं। इस संबंध में पट्टा रजिस्टर डी1 की प्रति से पता चलता है कि प्लॉट नंबर 6 वाली संपत्ति को 1993-1994 में सदा राम को पट्टे पर दिया गया था।