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Rewari News: 52 बंगलों की पहचान है कोसली, 900 वर्ष पुराना इतिहास आज भी जीवंत

Tue, 26 May 2026 01:05 AM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Tue, 26 May 2026 01:05 AM IST
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Kosli is known for its 52 bungalows, and its 900-year-old history is still alive.
गांव में स्थित कोसली मठ। संवाद
जगदीश यादव
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कोसली। अहीरवाल क्षेत्र का कोसली गांव केवल एक सामान्य गांव नहीं, बल्कि वीरता, सामाजिक प्रतिष्ठा और ऐतिहासिक विरासत की पहचान माना जाता है। 52 बंगला कोसली, बांके कई हजार, घर-घर में चौधरी और गली-गली सरदार कहावत गांव की समृद्ध परंपरा को दर्शाती है। करीब 900 वर्ष पुराने इस गांव की पहचान आज भी उसके ऐतिहासिक 52 बंगलों, सैन्य परंपरा और धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है।
पंच राजीव यादव ने बताया कि गांव की स्थापना करीब 900 वर्ष पहले हुई थी। मान्यता है कि गांव के बीड़ क्षेत्र में बाबा मुक्तेश्वरपुरी तपस्या करते थे। उसी दौरान शेखावटी के राजा कोसल सिंह यहां से गुजर रहे थे। रात होने पर उन्होंने यहां विश्राम किया। बाबा ने उन्हें यहीं बसने का आशीर्वाद देते हुए कहा था कि इस स्थान को कोई पराजित नहीं कर सकेगा। इसके बाद राजा कोसल सिंह ने यहां गांव बसाया। माना जाता है कि उनके नाम पर ही कोसल गोत्र की पहचान बनी।
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सरपंच रामकिशन जांगड़ा ने बताया कि इतिहास में दर्ज है कि गांव पर कई बार बाहरी आक्रमण हुए। पठानों, फिरोजपुर झिरका के नवाबों और जाटों ने गांव को जीतने का प्रयास किया, लेकिन हर बार ग्रामीणों ने बहादुरी से मुकाबला करते हुए दुश्मनों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। उस समय गांव के चारों ओर गहरी खाई बनाई गई थी, जिससे यह किसी मजबूत किले जैसा दिखाई देता था। समय के साथ अब उस खाई के निशान लगभग समाप्त हो चुके हैं।
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सेना में योगदान से मिली अलग पहचान
पूर्व ब्लॉक समिति सदस्य अरुण कुमार ने बताया कि कोसली गांव की सबसे बड़ी पहचान सेना में उसके योगदान को लेकर रही है। गांव के लोग लंबे समय से भारतीय सेना में सेवाएं देते आ रहे हैं और वर्तमान में भी 100 से अधिक अधिकारी सेना में कार्यरत हैं।
उन्होंने बताया कि प्रथम विश्व युद्ध में गांव के नौ जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। वहीं द्वितीय विश्व युद्ध में गांव के 247 लोगों ने हिस्सा लिया, जिनमें छह सैनिक शहीद हुए। गांव की वीरता और देशभक्ति से प्रभावित होकर अंग्रेजों ने यहां आठवीं तक का विद्यालय बनवाया था। इसके लिए ग्रामीणों ने करीब सवा सौ बीघा भूमि दान दी थी। वर्तमान में यहां वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय और महाविद्यालय संचालित हैं।
शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्र में भी बनाई पहचान
पंच सतबीर यादव ने बताया गांव ने शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्र में भी अपनी अलग पहचान बनाई है। हरियाणा के पहले इंजीनियर महासिंह इसी गांव से थे। वहीं राव रामनारायण वर्ष 1977 में विधायक बने और बाद में मंत्री पद तक पहुंचे।
लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 1978 में कोसली को उपमंडल का दर्जा मिला। ग्रामीणों का कहना है कि गांव को अब तक वह विकास नहीं मिल पाया, जिसका वह हकदार है। क्षेत्र आज भी कई मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है।

कोसली मठ आस्था का प्रमुख केंद्र
पंच सारदा ने बताया कि गांव का कोसली मठ आज भी लोगों की गहरी आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह मठ केवल कोसलिया गोत्र ही नहीं, बल्कि सभी समाजों के लोगों की श्रद्धा का स्थान है। देश-विदेश में बसे कोसलिया गोत्र के लोग विवाह, संतान जन्म, नौकरी लगने और अन्य शुभ अवसरों पर यहां मत्था टेकने पहुंचते हैं। हर वर्ष यहां विशाल भंडारों और धार्मिक आयोजनों का आयोजन किया जाता है, जिनमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। गांव आज भी अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है।

गांव में स्थित कोसली मठ। संवाद

गांव में स्थित कोसली मठ। संवाद

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