{"_id":"5e3b014b8ebc3ee5ca394cbf","slug":"cyber-crime-rewari-news-rtk5408019164","type":"story","status":"publish","title_hn":"आधी अधूरी तैयारियों के साथ साइबर ठगी के केस सुलझाने में पुलिस हो रही फेल","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
आधी अधूरी तैयारियों के साथ साइबर ठगी के केस सुलझाने में पुलिस हो रही फेल
विज्ञापन
फेसबुक से लेकर एटीएम बंद होने व खाते की जानकारी के बहाने साइबर ठगी के मामले आम हो चुके हैं। जिले में आम आदमी से लेकर एसडीएम तक तक इस तरह की ठगी के शिकार हो चुके हैं। जिले के 14 थानों की बात करें तो 6 माह में 80 अधिक साइबर ठगी के मुकदमे दर्ज हो चुके हैं, लेकिन पुलिस महज 16 मामलों का ही खुलासा कर पाई है।
बताया जा रहा है कि इसका एक बड़ा कारण साइबर एक्सपर्ट की कमी व लोगों में जागरूकता का अभाव है। आंकड़ों के अनुसार 30 मामले फेसबुक आईडी हैक कर बीमारी का बाहना बताकर ठगी करने, 10 मामले साइबर साइट पर वाहन बेचने के नाम पर, 20 मामले एटीएम कार्ड बदलकर ठगी करने, 7 मामले स्वास्थ्य विभाग का अधिकारी बन गर्भवती महिलाओं खाते की जानकारी लेकर ठगी करने और इसके अलावा आम लोगों से एटीएम बंद होने नाम पर खातों की जानकारी लेकर ठगी करने के मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
साइबर सेल के नाम पर महज 9 कर्मचारी
तकनीक का फायदा होने के साथ लोगों को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। आधुनिक युग में डिजिटल वॉलेट के माध्यम से कार्य हो रहे हैं। साइबर ठगी के मामले में पुलिस के संसाधन हैकर के सामने कमजोर नजर आते हैं। लघु सचिवालय में एक कमरे में बनाए साइबर सेल में तैनात 9 पुलिसकर्मियों में से कोई भी बीटेक या एमटेक नहीं है। उन्हें कंप्यूटर की ट्रेनिंग देकर साइबर एक्सपर्ट बनाया गया है।
विज्ञापन
कार्रवाई के नाम पर चक्कर काटने को मजबूर हैं पीड़ित
पुलिस की कार्यशैली की बात करें तो पहले शिकायत पर सुनवाई होने में महीनों लग जाते हैं। अगर पीड़ित का नंबर आ गया तो फॉड पर पुलिस अपना वर्क आउट करती है। अगर फ्रॉड सोशल साइट पर हुआ है तो साइबर सेल आईपी ट्रेसिंग पर काम करती है। जैसे ही आईपी ट्रेस हुआ, उसके बाद ही पुलिस की कार्रवाई ढीली होने लगती है। क्योंकि आरोपी अपनी लोकेशन बदल लेता है। ऐसे में पुलिस केस को ट्रेस करने में रुचि ही नहीं दिखाती। नतीजतन मामले पेंडिंग पड़ते जाते हैं।
मनी फ्रॉड के मामले ट्रेस करना मुश्किल
पुलिस अधिकारी खुद मानते हैं कि सोशल साइट पर होने वाले क्राइम को तो ट्रेस कर लिया जाता है। लेकिन मनी फ्रॉड को ट्रेस कर पाना मुश्किल है। क्योंकि अकसर वो मामले पेंडिंग ही रहते हैं। इसका कारण है कि पुलिस के पास ऐसा सिस्टम नहीं की वो आरोपियों को ट्रेस कर पाए। पुलिस के पास अभी भी मनी व बैंकिंग फ्रॉड के अधिकांश मामले पेंडिंग हैं।
जांच बीच में छोड़ रहे कर्मी
उक्त सारे फ्रॉड के मामलों में पुलिस अंत में सर्विस प्रोवाइडर तक सीमित रह जाती है। कॉल ट्रेसिंग, आईडी ट्रेसिंग और वेबसाइट ट्रेसिंग, इन सब मामलों में पुलिस को संबंधित कंपनी से डिटेल लेनी पड़ती है। इसमें सबसे ज्यादा टाइम लगता है। वहीं पुलिस भी उन पर निर्भर हो जाती है और अपनी पड़ताल को बीच में ही छोड़ देते हैं। साइबर सेल में कर्मचारियों की योग्यता की स्थिति
आरटीआई द्वारा मांगी गई जानकारी के मुताबिक साइबर सेल में कुल 9 कर्मचारी है। इनमें एक ईएसआई स्तर का अधिकारी है। इसके अलावा शेष 8 कर्मचारी सिपाही स्तर के हैं। इनमें एक कर्मचारी की योग्यता बीएससी है। दो एमए पास, दो बीए-बीएएड व चार बारहवीं पास की योग्यता रखते हैं।
बिना एक्सपर्ट कैसे सुलझेंगे मामले : साकेत
आरटीआई एक्टिविस्ट साकेत ढिंगड़ा ने बताया कि आरटीआई से मांगी गई जानकारी में खुलासा हुआ कि साइबर सेल में विशेषज्ञ ही नहीं है। ऐसे में साइबर अपराधों की जांच कैसे संभव हो पाएगी। कर्मचारियों का आईटी एक्सपर्ट होने चाहिए।
विज्ञापन
बताया जा रहा है कि इसका एक बड़ा कारण साइबर एक्सपर्ट की कमी व लोगों में जागरूकता का अभाव है। आंकड़ों के अनुसार 30 मामले फेसबुक आईडी हैक कर बीमारी का बाहना बताकर ठगी करने, 10 मामले साइबर साइट पर वाहन बेचने के नाम पर, 20 मामले एटीएम कार्ड बदलकर ठगी करने, 7 मामले स्वास्थ्य विभाग का अधिकारी बन गर्भवती महिलाओं खाते की जानकारी लेकर ठगी करने और इसके अलावा आम लोगों से एटीएम बंद होने नाम पर खातों की जानकारी लेकर ठगी करने के मुकदमे दर्ज किए गए हैं।
विज्ञापन
साइबर सेल के नाम पर महज 9 कर्मचारी
तकनीक का फायदा होने के साथ लोगों को नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। आधुनिक युग में डिजिटल वॉलेट के माध्यम से कार्य हो रहे हैं। साइबर ठगी के मामले में पुलिस के संसाधन हैकर के सामने कमजोर नजर आते हैं। लघु सचिवालय में एक कमरे में बनाए साइबर सेल में तैनात 9 पुलिसकर्मियों में से कोई भी बीटेक या एमटेक नहीं है। उन्हें कंप्यूटर की ट्रेनिंग देकर साइबर एक्सपर्ट बनाया गया है।
विज्ञापन
कार्रवाई के नाम पर चक्कर काटने को मजबूर हैं पीड़ित
पुलिस की कार्यशैली की बात करें तो पहले शिकायत पर सुनवाई होने में महीनों लग जाते हैं। अगर पीड़ित का नंबर आ गया तो फॉड पर पुलिस अपना वर्क आउट करती है। अगर फ्रॉड सोशल साइट पर हुआ है तो साइबर सेल आईपी ट्रेसिंग पर काम करती है। जैसे ही आईपी ट्रेस हुआ, उसके बाद ही पुलिस की कार्रवाई ढीली होने लगती है। क्योंकि आरोपी अपनी लोकेशन बदल लेता है। ऐसे में पुलिस केस को ट्रेस करने में रुचि ही नहीं दिखाती। नतीजतन मामले पेंडिंग पड़ते जाते हैं।
मनी फ्रॉड के मामले ट्रेस करना मुश्किल
पुलिस अधिकारी खुद मानते हैं कि सोशल साइट पर होने वाले क्राइम को तो ट्रेस कर लिया जाता है। लेकिन मनी फ्रॉड को ट्रेस कर पाना मुश्किल है। क्योंकि अकसर वो मामले पेंडिंग ही रहते हैं। इसका कारण है कि पुलिस के पास ऐसा सिस्टम नहीं की वो आरोपियों को ट्रेस कर पाए। पुलिस के पास अभी भी मनी व बैंकिंग फ्रॉड के अधिकांश मामले पेंडिंग हैं।
जांच बीच में छोड़ रहे कर्मी
उक्त सारे फ्रॉड के मामलों में पुलिस अंत में सर्विस प्रोवाइडर तक सीमित रह जाती है। कॉल ट्रेसिंग, आईडी ट्रेसिंग और वेबसाइट ट्रेसिंग, इन सब मामलों में पुलिस को संबंधित कंपनी से डिटेल लेनी पड़ती है। इसमें सबसे ज्यादा टाइम लगता है। वहीं पुलिस भी उन पर निर्भर हो जाती है और अपनी पड़ताल को बीच में ही छोड़ देते हैं। साइबर सेल में कर्मचारियों की योग्यता की स्थिति
आरटीआई द्वारा मांगी गई जानकारी के मुताबिक साइबर सेल में कुल 9 कर्मचारी है। इनमें एक ईएसआई स्तर का अधिकारी है। इसके अलावा शेष 8 कर्मचारी सिपाही स्तर के हैं। इनमें एक कर्मचारी की योग्यता बीएससी है। दो एमए पास, दो बीए-बीएएड व चार बारहवीं पास की योग्यता रखते हैं।
बिना एक्सपर्ट कैसे सुलझेंगे मामले : साकेत
आरटीआई एक्टिविस्ट साकेत ढिंगड़ा ने बताया कि आरटीआई से मांगी गई जानकारी में खुलासा हुआ कि साइबर सेल में विशेषज्ञ ही नहीं है। ऐसे में साइबर अपराधों की जांच कैसे संभव हो पाएगी। कर्मचारियों का आईटी एक्सपर्ट होने चाहिए।