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Rewari News: खरखड़ा गांव को धारूहेड़ा से हटाने पर रोष, निर्णय वापसी की मांग तेज

Sat, 23 May 2026 06:19 PM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी
संवाद न्यूज एजेंसी, रेवाड़ी Updated Sat, 23 May 2026 06:19 PM IST
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Anger over removal of Kharkhara village from Dharuhera, demand for withdrawal of decision intensified
धारूहेड़ा बिजली सब डिविजन। स्रोत : ग्रामीण
संवाद न्यूज एजेंसी
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धारूहेड़ा। रेवेन्यू सीमा से सटे खरखड़ा गांव को वर्तमान धारूहेड़ा बिजली सब डिविजन से हटाकर नवगठित जड़थल सब डिविजन में जोड़ने की सूचना के बाद ग्रामीणों में रोष है। मामले को लेकर हरियाणा के बिजली मंत्री, मुख्यमंत्री, एसीएस बिजली विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों को पत्र भेजकर निर्णय पर रोक लगाने की मांग की है।
लोगों का कहना है कि खरखड़ा गांव भौगोलिक, सामाजिक और प्रशासनिक रूप से वर्षों से धारूहेड़ा क्षेत्र से जुड़ा है। गांव से धारूहेड़ा बिजली सब डिविजन कार्यालय की दूरी मात्र करीब डेढ़ किलोमीटर है जिससे ग्रामीणों को बिजली संबंधी शिकायत, बिल संशोधन, नए कनेक्शन, ट्रांसफॉर्मर खराबी और अन्य कार्यों के लिए आसानी से सुविधा मिल जाती है।
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धारूहेड़ा क्षेत्र पहले से ही प्रमुख औद्योगिक एवं व्यावसायिक केंद्र के रूप में विकसित है जहां परिवहन, बाजार, सरकारी कार्यालय और अन्य आवश्यक सेवाएं नजदीक उपलब्ध हैं। गांव खरखड़ा के अधिकांश लोगों का दैनिक आवागमन और प्रशासनिक कार्य भी धारूहेड़ा से ही जुड़े हुए हैं। ऐसे में गांव को अचानक 11 किलोमीटर दूर स्थित जड़थल सब डिविजन में जोड़ना ग्रामीणों पर अनावश्यक बोझ डालने जैसा है।
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लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि खरखड़ा गांव को पूर्ववत धारूहेड़ा बिजली सब डिविजन में ही बनाए रखा जाए ताकि ग्रामीणों को भविष्य में अनावश्यक परेशानियों का सामना न करना पड़े।

इंसेट
समस्याओं के समाधान के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी
खरखड़ा गांव निवासी सामाजिक कार्यकर्ता प्रकाश यादव ने पत्र में यह उल्लेख किया है कि खरखड़ा गांव पंचायत द्वारा पूर्व में 33 केवी पावर हाउस के लिए विभाग को भूमि उपलब्ध कराई गई थी और वर्तमान में पावर हाउस संचालित भी है। इसके बावजूद गांव की सुविधाओं और भौगोलिक वास्तविकता को नजरअंदाज कर दूरस्थ सब डिविजन में जोड़ने का प्रयास समझ से परे है। प्रकाश यादव ने कहा कि जड़थल की दूरी अधिक होने के कारण किसानों, बुजुर्गों, मजदूरों और आम उपभोक्ताओं को छोटी-छोटी समस्याओं के समाधान के लिए भी लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी। इससे समय और आर्थिक नुकसान दोनों बढ़ेंगे। ग्रामीणों का मानना है कि यह फैसला जनसुविधा के बजाय केवल कागजी प्रक्रिया को प्राथमिकता देकर लिया जा रहा है।
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