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पनीपत: गांव की पाती : जिस संजौली में पूरी होती हैं सबकी मुराद, उसकी ही झोली खाली
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बापौली। मैं संजौली हूं। मेरे जंगल में सिद्ध बाबा बरखंडी ने कई वर्षों तक अपनी कुटिया बनाकर बिना भोजन एवं जल ग्रहण किए तपस्या की। आज भी बाबा की कुटिया में आने वालों की मुराद पूरी होती है, लेकिन मेरी और मेरी सीमा रेखा के अंदर आबाद ग्रामीणों की मूलभूत समस्याओं से छुटकारा पाने की मुराद पूरी आज तक पूरी नहीं हो पाई।
पानीपत शहर से लगभग 19 किलोमीटर दूर 2150 लोगों की आबादी के साथ मैं बापौली हलके का हिस्सा हूं। मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि मैं आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हूं। मेरे पास सबसे ज्यादा गोचरन की भूमि है, लेकिन गोवंशों की स्थिति देखकर दुख होता है। सरकार से गायों की सेवा के लिए उचित सहयोग नहीं मिलता। एक गोशाला हैं, जिसमें क्षमता से अधिक 200 गोवंश हैं। पशु डॉक्टर तक नहीं है। कई बार मेरे गोवंशों की इलाज के अभाव में मौत हो जाती है। जल निकासी न होने से ग्रामीणों का आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। गलियों का गंदा पानी ग्रामीणों के घरों में चला जाता है। फाइव पौंड योजना के तहत मेरी सीमा में दो तालाब भी बनाए गए, लेकिन उनमें पानी ही नहीं पहुंचता। नालियों में बह जाता है।
इन समस्याओं का दर्द भी झेल रहा हूं मैं
- मेरी डेहरी तक रोडवेज बस की पहुंच नहीं हो पाई। मेरे बाशिंदों को शहर जाने में भारी परेशानी होती है। बेटियों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है।
- कोई सरकारी अस्पताल भी मुझे नहीं दिया गया। मेरे ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ झोलाछाप खिलवाड़ करते हैं।
- मेरे यहां पांचवीं कक्षा के बाद सरकारी विद्यालय नहीं है। आगे पढ़ने के लिए बेटे-बेटियां पांच किलोमीटर दूसरे गांव गोयला खुर्द जाते हैं
- मेरे ग्रामीणों के लिए रोजगार की कमी है, महज 20 ही लोग हैं, जो सरकारी नौकरियों में सेवा दे रहे हैं
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पानीपत शहर से लगभग 19 किलोमीटर दूर 2150 लोगों की आबादी के साथ मैं बापौली हलके का हिस्सा हूं। मेरी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि मैं आज भी बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हूं। मेरे पास सबसे ज्यादा गोचरन की भूमि है, लेकिन गोवंशों की स्थिति देखकर दुख होता है। सरकार से गायों की सेवा के लिए उचित सहयोग नहीं मिलता। एक गोशाला हैं, जिसमें क्षमता से अधिक 200 गोवंश हैं। पशु डॉक्टर तक नहीं है। कई बार मेरे गोवंशों की इलाज के अभाव में मौत हो जाती है। जल निकासी न होने से ग्रामीणों का आवागमन बेहद कठिन हो जाता है। गलियों का गंदा पानी ग्रामीणों के घरों में चला जाता है। फाइव पौंड योजना के तहत मेरी सीमा में दो तालाब भी बनाए गए, लेकिन उनमें पानी ही नहीं पहुंचता। नालियों में बह जाता है।
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इन समस्याओं का दर्द भी झेल रहा हूं मैं
- मेरी डेहरी तक रोडवेज बस की पहुंच नहीं हो पाई। मेरे बाशिंदों को शहर जाने में भारी परेशानी होती है। बेटियों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है।
- कोई सरकारी अस्पताल भी मुझे नहीं दिया गया। मेरे ग्रामीणों के स्वास्थ्य के साथ झोलाछाप खिलवाड़ करते हैं।
- मेरे यहां पांचवीं कक्षा के बाद सरकारी विद्यालय नहीं है। आगे पढ़ने के लिए बेटे-बेटियां पांच किलोमीटर दूसरे गांव गोयला खुर्द जाते हैं
- मेरे ग्रामीणों के लिए रोजगार की कमी है, महज 20 ही लोग हैं, जो सरकारी नौकरियों में सेवा दे रहे हैं