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Panipat News: शिव महापुराण कथा में गूंजा शिव भक्ति का संदेश
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देवी मंदिर में शिव महापुराण कथा करते आचार्य लालमणि पांडेय। स्रोत : समिति
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। प्राचीन सिद्ध देवी मंदिर में मंगलवार को साप्ताहिक श्री शिव महापुराण कथामृत का दूसरा दिन रहा। कथा व्यासपीठ से मंदिर के आचार्य लालमणि पांडेय ने शिव भक्ति, अहंकार त्याग और नौ प्रकार की भक्ति का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि शिव महापुराण का श्रवण करने मात्र से मनुष्य को नौ प्रकार की भक्ति का फल प्राप्त होता है।
कथा मुरथल से स्वामी दयानंद सरस्वती महाराज, हरिद्वार से महामंडलेश्वर स्वामी अरुण दास महाराज और प्रेम मंदिर से कांता देवी महाराज के सानिध्य में हुई। कार्यक्रम में मुख्य यजमान नरेश सिंगला और सुशील सिंगला रहे। आचार्य लालमणि पांडेय ने नारद प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि एक बार नारद मुनि उस स्थान पर तपस्या कर रहे थे, जहां भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था। तपस्या के दौरान नारद को अहंकार हो गया कि उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली है। इसी अहंकार के कारण वे स्वयं को भगवान शिव से भी बड़ा समझने लगे।
नारद ने भगवान विष्णु को अपनी विजय के बारे में बताया। भगवान विष्णु ने नारद के भीतर छिपे अहंकार को दूर करने के लिए अपनी माया रची। इसके प्रभाव से नारद एक मोहिनी स्त्री पर मोहित हो गए और उसे पाने के लिए अनेक प्रयास करने लगे। इस दौरान नारद ने भगवान विष्णु को श्राप भी दे दिया। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब भगवान विष्णु की माया का परिणाम था।
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नारद को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी। भगवान विष्णु ने उन्हें भगवान शिव के नाम का जप करने की सलाह दी। नारद ने भगवान शिव के नाम का जप किया और अंततः शांति प्राप्त की। आचार्य ने कहा कि यह प्रसंग मनुष्य को अहंकार से बचने और भगवान की भक्ति में मन लगाने की प्रेरणा देता है। आगे की कथा में भगवान शिव और माता सती के विवाह का प्रसंग सुनाया गया। माता सती ने भगवान शिव से नौ प्रकार की भक्ति के बारे में पूछा। भगवान शिव ने उन्हें भक्ति के विभिन्न स्वरूपों के बारे में बताया, जिनमें श्रवण, कीर्तन और स्मरण प्रमुख हैं। आचार्य ने कहा कि शिव महापुराण का श्रवण करने और भगवान शिव की भक्ति करने से मनुष्य के जीवन में शांति आती है।
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पानीपत। प्राचीन सिद्ध देवी मंदिर में मंगलवार को साप्ताहिक श्री शिव महापुराण कथामृत का दूसरा दिन रहा। कथा व्यासपीठ से मंदिर के आचार्य लालमणि पांडेय ने शिव भक्ति, अहंकार त्याग और नौ प्रकार की भक्ति का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि शिव महापुराण का श्रवण करने मात्र से मनुष्य को नौ प्रकार की भक्ति का फल प्राप्त होता है।
कथा मुरथल से स्वामी दयानंद सरस्वती महाराज, हरिद्वार से महामंडलेश्वर स्वामी अरुण दास महाराज और प्रेम मंदिर से कांता देवी महाराज के सानिध्य में हुई। कार्यक्रम में मुख्य यजमान नरेश सिंगला और सुशील सिंगला रहे। आचार्य लालमणि पांडेय ने नारद प्रसंग का वर्णन करते हुए बताया कि एक बार नारद मुनि उस स्थान पर तपस्या कर रहे थे, जहां भगवान शिव ने कामदेव को भस्म किया था। तपस्या के दौरान नारद को अहंकार हो गया कि उन्होंने कामदेव पर विजय प्राप्त कर ली है। इसी अहंकार के कारण वे स्वयं को भगवान शिव से भी बड़ा समझने लगे।
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नारद ने भगवान विष्णु को अपनी विजय के बारे में बताया। भगवान विष्णु ने नारद के भीतर छिपे अहंकार को दूर करने के लिए अपनी माया रची। इसके प्रभाव से नारद एक मोहिनी स्त्री पर मोहित हो गए और उसे पाने के लिए अनेक प्रयास करने लगे। इस दौरान नारद ने भगवान विष्णु को श्राप भी दे दिया। बाद में उन्हें ज्ञात हुआ कि यह सब भगवान विष्णु की माया का परिणाम था।
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नारद को अपनी भूल का अहसास हुआ और उन्होंने भगवान विष्णु से क्षमा मांगी। भगवान विष्णु ने उन्हें भगवान शिव के नाम का जप करने की सलाह दी। नारद ने भगवान शिव के नाम का जप किया और अंततः शांति प्राप्त की। आचार्य ने कहा कि यह प्रसंग मनुष्य को अहंकार से बचने और भगवान की भक्ति में मन लगाने की प्रेरणा देता है। आगे की कथा में भगवान शिव और माता सती के विवाह का प्रसंग सुनाया गया। माता सती ने भगवान शिव से नौ प्रकार की भक्ति के बारे में पूछा। भगवान शिव ने उन्हें भक्ति के विभिन्न स्वरूपों के बारे में बताया, जिनमें श्रवण, कीर्तन और स्मरण प्रमुख हैं। आचार्य ने कहा कि शिव महापुराण का श्रवण करने और भगवान शिव की भक्ति करने से मनुष्य के जीवन में शांति आती है।

देवी मंदिर में शिव महापुराण कथा करते आचार्य लालमणि पांडेय। स्रोत : समिति