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Panipat News: उत्तम धर्म त्याग के रूप में मनाया दसलक्षण पर्व का आठवां दिन
Fri, 05 Sep 2025 12:18 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
संवाद न्यूज एजेंसी, पानीपत
Updated Fri, 05 Sep 2025 12:18 AM IST
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मंदिर दुंदीवालान में शांतिधारा करते श्रद्धालु। स्रोत : समिति
संवाद न्यूज एजेंसी
पानीपत। दिगंबर जैन मंदिरों में दसलक्षण पर्व का वीरवार को आठवां दिन मनाया। सुबह मंदिर में अभिषेक व पूजा की गई। आठवां दिन उत्तम त्याग धर्म के रूप में मनाया। मंदिर में कर्म दहन विधान का आयोजन किया। मुकेश जैन ने बताया कि दिगंबर जैन पार्श्वनाथ मंदिर दुंदीवालान में पर्व मना जा रहा है। मंदिर में भगवान का अभिषेक दूध के माध्यम से किया गया।
मंदिर लगभग 250 से 300 साल प्राचीन है। इसका निर्माण सेठ दुंदीमल जैन के द्वारा किया गया था। मंदिर में जो प्रतिमाएं विराजमान हैं उन पर अंकित संवत् अनुसार उनमें कुछ 400 वर्ष तो कुछ 900 वर्ष प्राचीन हैं। वर्षों से मंदिर की परंपराओं को उसी तरह निभाया जा रहा है जैसी चल आ रही है। वर्ष में दसलक्षण पर्व में भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को भगवान का दुग्धाभिषेक होता है। परंपरा के अनुसार वीरवार को भगवान की मस्तकाभिषेक और शांतिधारा सम्पन्न हुई। उत्तम त्याग धर्म का भाव है कि जीवन को संतुष्ट बना कर अपनी इच्छाओं को वश में करना है। यह न सिर्फ अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है बल्कि बुरे कर्मों का नाश भी करता है। छोड़ने की भावना जैन धर्म में सबसे अधिक है क्योंकि जैन संत सिर्फ घर बार नहीं यहां तक कि अपने कपडे़ भी त्याग देते है और पूरा जीवन दिगंबर मुद्रा धारण करके व्यतीत करते हैं। इंसान की शक्ति इससे नहीं परखी जाती की उसके पास कितनी धन दौलत है बल्कि इससे परखी जाती है कि उसने कितना छोड़ा कितना त्याग किया है। उत्तम त्याग धर्म हमें यही सिखाता है कि मन को संतोषी बना के ही इच्छाओं और भावनाओं का त्याग करना मुमकिन है। त्याग की भावना भीतरी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही होती है। संध्या में पारस ज्ञान संघ द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम और आरती की गई।
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पानीपत। दिगंबर जैन मंदिरों में दसलक्षण पर्व का वीरवार को आठवां दिन मनाया। सुबह मंदिर में अभिषेक व पूजा की गई। आठवां दिन उत्तम त्याग धर्म के रूप में मनाया। मंदिर में कर्म दहन विधान का आयोजन किया। मुकेश जैन ने बताया कि दिगंबर जैन पार्श्वनाथ मंदिर दुंदीवालान में पर्व मना जा रहा है। मंदिर में भगवान का अभिषेक दूध के माध्यम से किया गया।
मंदिर लगभग 250 से 300 साल प्राचीन है। इसका निर्माण सेठ दुंदीमल जैन के द्वारा किया गया था। मंदिर में जो प्रतिमाएं विराजमान हैं उन पर अंकित संवत् अनुसार उनमें कुछ 400 वर्ष तो कुछ 900 वर्ष प्राचीन हैं। वर्षों से मंदिर की परंपराओं को उसी तरह निभाया जा रहा है जैसी चल आ रही है। वर्ष में दसलक्षण पर्व में भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को भगवान का दुग्धाभिषेक होता है। परंपरा के अनुसार वीरवार को भगवान की मस्तकाभिषेक और शांतिधारा सम्पन्न हुई। उत्तम त्याग धर्म का भाव है कि जीवन को संतुष्ट बना कर अपनी इच्छाओं को वश में करना है। यह न सिर्फ अच्छे गुणवान कर्मों में वृद्धि करता है बल्कि बुरे कर्मों का नाश भी करता है। छोड़ने की भावना जैन धर्म में सबसे अधिक है क्योंकि जैन संत सिर्फ घर बार नहीं यहां तक कि अपने कपडे़ भी त्याग देते है और पूरा जीवन दिगंबर मुद्रा धारण करके व्यतीत करते हैं। इंसान की शक्ति इससे नहीं परखी जाती की उसके पास कितनी धन दौलत है बल्कि इससे परखी जाती है कि उसने कितना छोड़ा कितना त्याग किया है। उत्तम त्याग धर्म हमें यही सिखाता है कि मन को संतोषी बना के ही इच्छाओं और भावनाओं का त्याग करना मुमकिन है। त्याग की भावना भीतरी आत्मा को शुद्ध बनाकर ही होती है। संध्या में पारस ज्ञान संघ द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम और आरती की गई।
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