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कुछ ऐसे हैं नीरज चोपड़ा के गांव के हालात, ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट नीरज चोपड़ा का गांव प्यासा, ग्रामीण खेतों से भरकर लाते हैं पीने का पानी
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ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट नीरज चोपड़ा के घर के पास पानी की समस्या पर विचार विमर्श करते गांव के लोग।
- फोटो : Panipat
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ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले नीरज चोपड़ा के गांव के हालात बदतर हैं। यहां ग्रामीणों को पीने का पानी तक नसीब नहीं होता। उन्हें खेतों से पीने का पानी भरकर लाना पड़ता है। इनमें नीरज चोपड़ा का परिवार भी शामिल है। वे भी खेतों से पानी लाते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि गांव के पानी में क्षार एवं नमक की मात्रा बहुत ज्यादा है। ये पानी पीने लायक ही नहीं है। इस पानी की वजह से गांव के सभी बुजुर्गों के घुटनों में दर्द रहने लगा है।
हैरानी की बात यह है कि गांव में दो साल पहले एक ट्यूबवेल लगाया गया था, जो आज तक चालू नहीं हो पाया है। वहीं गांव वासियों का आरोप है कि नीरज की जीत पर जब गृह मंत्री अनिल विज गांव पहुंचे तो ट्यूबवेल में पाइप लगा दिया गया, जिससे ये लगे कि ट्यूबवेल चालू है। ग्रामीणों में पीने के पानी को लेकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ खासा रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में करीब साढ़े तीन हजार लोगों की आबादी है, लेकिन सरकार और प्रशासन ने आज तक इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया है।
पीना तो दूर चाय बनाने के लायक भी नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव का पानी से चाय तक नहीं बनाई जा सकती। अगर इस पानी की चाय बना दी जाए तो ज्यादा क्षार होने की वजह से वह फट जाती है। पानी से कपड़े भी धोते हैं तो उन कपड़ों का रंग उड़ जाता है। इस पानी को उनके पशु तक नहीं पीते। गर्मी के मौसम में लोगों व पशुओं के लिए भी खेतों के पानी का सहारा लेना पड़ता है। इसके अलावा घर के अन्य किसी भी काम में इस पानी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
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एक हजार से ज्यादा टीडीएस, हर घर में लगा आरओ
ग्रामीणों ने बताया कि गांव के पानी में टीडीएस की मात्रा एक हजार प्वाइंट से भी ज्यादा है। गांव में तकरीबन हर घर में वाटर प्यूरिफायर और आरओ सिस्टम लगवाने पड़े हैं। इससे पानी तो शुद्ध नहीं हो पाया, लेकिन आरओ सिस्टम खराब जरूर हो गए।
नीरज के स्वर्ण जीतने के बाद जुटा प्रशासन
जब नीरज चोपड़ा ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता तो नीरज के घर प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर नेताओं का आना जाना शुरू हो गया। जिस पर जिला प्रशासन को पहले से ज्ञात पीने के पानी के संकट की चिंता सताने लगी। लोगों ने भी पीने के पानी के लिए आवाज उठाई। इसके बाद से ही जनस्वास्थ्य विभाग दो साल से बंद पड़े ट्यूबवेल को चालू करवाने के काम पर जुट गया है।
खरीद कर पीना पड़ता है पानी, सिर पर मटका रख लाती हैं पानी
ग्रामीण महिलाओं ने बताया कि उन्हें पीने का पानी लाने के लिए सिर पर मटका रखकर खेतों से पानी लाना पड़ता है। वहीं, ग्रामीण ट्रैक्टरों पर पानी भरकर लाते हैं। जो खेतों से पानी नहीं ला सकते, उन्हें घरों में पानी खरीदकर लाना पड़ता है। इसके लिए काफी ग्रामीणों ने कैंपर तक लगवाए हैं।
विभाग की योजना भी फेल
ग्रामीणों ने बताया कि जनस्वास्थ्य विभाग ने जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाई, कुछ घरों को पानी के कनेक्शन भी दिए, लेकिन विभाग की इस पाइपलाइन में पानी आज तक नहीं आ सका। जिस ट्यूबवेल से पानी आना था, जब वही चालू नहीं हुआ तो पानी कहां से आएगा।
गांव में नया ट्यूबवेल लगाया गया था। इसे जल्द ही चालू कराया जा रहा है। हालांकि गांव खंडरा से पीने के पानी को लेकर लिखित या ऑनलाइन शिकायत अभी तक नहीं मिली है।
-राजेश कौशिक, एक्सईएन, जनस्वास्थ्य विभाग
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हैरानी की बात यह है कि गांव में दो साल पहले एक ट्यूबवेल लगाया गया था, जो आज तक चालू नहीं हो पाया है। वहीं गांव वासियों का आरोप है कि नीरज की जीत पर जब गृह मंत्री अनिल विज गांव पहुंचे तो ट्यूबवेल में पाइप लगा दिया गया, जिससे ये लगे कि ट्यूबवेल चालू है। ग्रामीणों में पीने के पानी को लेकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ खासा रोष है। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में करीब साढ़े तीन हजार लोगों की आबादी है, लेकिन सरकार और प्रशासन ने आज तक इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया है।
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पीना तो दूर चाय बनाने के लायक भी नहीं
ग्रामीणों ने बताया कि उनके गांव का पानी से चाय तक नहीं बनाई जा सकती। अगर इस पानी की चाय बना दी जाए तो ज्यादा क्षार होने की वजह से वह फट जाती है। पानी से कपड़े भी धोते हैं तो उन कपड़ों का रंग उड़ जाता है। इस पानी को उनके पशु तक नहीं पीते। गर्मी के मौसम में लोगों व पशुओं के लिए भी खेतों के पानी का सहारा लेना पड़ता है। इसके अलावा घर के अन्य किसी भी काम में इस पानी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
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एक हजार से ज्यादा टीडीएस, हर घर में लगा आरओ
ग्रामीणों ने बताया कि गांव के पानी में टीडीएस की मात्रा एक हजार प्वाइंट से भी ज्यादा है। गांव में तकरीबन हर घर में वाटर प्यूरिफायर और आरओ सिस्टम लगवाने पड़े हैं। इससे पानी तो शुद्ध नहीं हो पाया, लेकिन आरओ सिस्टम खराब जरूर हो गए।
नीरज के स्वर्ण जीतने के बाद जुटा प्रशासन
जब नीरज चोपड़ा ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता तो नीरज के घर प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर नेताओं का आना जाना शुरू हो गया। जिस पर जिला प्रशासन को पहले से ज्ञात पीने के पानी के संकट की चिंता सताने लगी। लोगों ने भी पीने के पानी के लिए आवाज उठाई। इसके बाद से ही जनस्वास्थ्य विभाग दो साल से बंद पड़े ट्यूबवेल को चालू करवाने के काम पर जुट गया है।
खरीद कर पीना पड़ता है पानी, सिर पर मटका रख लाती हैं पानी
ग्रामीण महिलाओं ने बताया कि उन्हें पीने का पानी लाने के लिए सिर पर मटका रखकर खेतों से पानी लाना पड़ता है। वहीं, ग्रामीण ट्रैक्टरों पर पानी भरकर लाते हैं। जो खेतों से पानी नहीं ला सकते, उन्हें घरों में पानी खरीदकर लाना पड़ता है। इसके लिए काफी ग्रामीणों ने कैंपर तक लगवाए हैं।
विभाग की योजना भी फेल
ग्रामीणों ने बताया कि जनस्वास्थ्य विभाग ने जल जीवन मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाई, कुछ घरों को पानी के कनेक्शन भी दिए, लेकिन विभाग की इस पाइपलाइन में पानी आज तक नहीं आ सका। जिस ट्यूबवेल से पानी आना था, जब वही चालू नहीं हुआ तो पानी कहां से आएगा।
गांव में नया ट्यूबवेल लगाया गया था। इसे जल्द ही चालू कराया जा रहा है। हालांकि गांव खंडरा से पीने के पानी को लेकर लिखित या ऑनलाइन शिकायत अभी तक नहीं मिली है।
-राजेश कौशिक, एक्सईएन, जनस्वास्थ्य विभाग

खंडरा गांव के खेत से पीने का पानी भरते हुए गांव के अमन, प्रवीन, राहुल और गौरव।- फोटो : Panipat

गांव खंडरा में ओलंपियन नीरज चोपड़ा के घर के सामने की गली, जो सालों से टूटी है।- फोटो : Panipat