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Panipat News: शिवमहापुराण कथा में सुनाया माता सती प्रसंग
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कुरुक्षेत्र। जय मां दुर्गा-जय श्री महाकाल ट्रस्ट द्वारा श्रावण माह के उपलक्ष्य में जनकल्याणार्थ शिव शक्ति महायज्ञ एवं शिवमहापुराण कथा के चौथे दिन कथावाचक पंडित विकास कौशिक ने माता सती प्रसंग विस्तार से सुनाया।
कालेश्वर महादेव मंदिर के समीप मां बाला सुंदरी त्रिपुरेश्वरी श्री दुर्गा देवी यज्ञशाला मंदिर में शिव शक्ति महायज्ञ में मुख्य यजमान पीठाधीश पंडित राजेश मौदगिल सहित गोपाल शास्त्री,सर्वेश कुमार पांडे,शिव प्रकाश सैनी,मनजीत सैनी,कृत सैनी,भीम सिंह,मनोज गुप्ता,रवि राणा,रक्षित और हर्षित आदि ने आहुतियां दी।
कालेश्वर महादेव मंदिर सभागार में शिवमहापुराण कथा के दौरान माता सती प्रसंग विस्तार से बताते हुए कथावाचक पंडित कौशिक ने बताया कि भगवान शिव और देवी सती के प्रेम,विवाह और सती का त्याग है।
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यह प्रसंग शिव-पार्वती विवाह और शक्तिपीठों की स्थापना के पीछे की महत्वपूर्ण घटना है। प्रजापति दक्ष ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन शिव और सती को निमंत्रण नहीं दिया। सती बिना बुलाए यज्ञ में पहुंची और दक्ष द्वारा शिव का अपमान सहन न कर सकीं, जिसके कारण उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
सती की मृत्यु से दुखी होकर शिव ने तांडव नृत्य किया और सती के शरीर को कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमते रहे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए, जो पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे और शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
यह प्रसंग भक्ति, त्याग और बलिदान का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कैसे देवी सती ने अपने पति के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और प्रेम के कारण अपना जीवन त्याग दिया।
यह प्रसंग शक्तिपीठों की स्थापना के पीछे की कहानी भी बताता है, जो आज भी भक्तों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं। शिवमहापुराण कथा की आरती में सभी श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।
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कालेश्वर महादेव मंदिर के समीप मां बाला सुंदरी त्रिपुरेश्वरी श्री दुर्गा देवी यज्ञशाला मंदिर में शिव शक्ति महायज्ञ में मुख्य यजमान पीठाधीश पंडित राजेश मौदगिल सहित गोपाल शास्त्री,सर्वेश कुमार पांडे,शिव प्रकाश सैनी,मनजीत सैनी,कृत सैनी,भीम सिंह,मनोज गुप्ता,रवि राणा,रक्षित और हर्षित आदि ने आहुतियां दी।
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कालेश्वर महादेव मंदिर सभागार में शिवमहापुराण कथा के दौरान माता सती प्रसंग विस्तार से बताते हुए कथावाचक पंडित कौशिक ने बताया कि भगवान शिव और देवी सती के प्रेम,विवाह और सती का त्याग है।
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यह प्रसंग शिव-पार्वती विवाह और शक्तिपीठों की स्थापना के पीछे की महत्वपूर्ण घटना है। प्रजापति दक्ष ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया, लेकिन शिव और सती को निमंत्रण नहीं दिया। सती बिना बुलाए यज्ञ में पहुंची और दक्ष द्वारा शिव का अपमान सहन न कर सकीं, जिसके कारण उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर आत्मदाह कर लिया।
सती की मृत्यु से दुखी होकर शिव ने तांडव नृत्य किया और सती के शरीर को कंधे पर उठाकर पूरे ब्रह्मांड में घूमते रहे। भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए, जो पृथ्वी पर विभिन्न स्थानों पर गिरे और शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
यह प्रसंग भक्ति, त्याग और बलिदान का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि कैसे देवी सती ने अपने पति के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा और प्रेम के कारण अपना जीवन त्याग दिया।
यह प्रसंग शक्तिपीठों की स्थापना के पीछे की कहानी भी बताता है, जो आज भी भक्तों के लिए महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल हैं। शिवमहापुराण कथा की आरती में सभी श्रद्धालुओं ने हिस्सा लिया।