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पानीपत संग्रहालय में धूमिल हो रहीं 495 साल पुरानी इतिहास की यादें

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 12 Mar 2021 02:19 AM IST
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memorry of 495 year become foggy due to  careless ness of department
गोहाना रोड से लगते दिल्ली पैरलल नहर के बाईपास पर सिंचाई विभाग के दफ्तर के साथ बना पानीपत संग्रहालय इतिहास के 495 सालों की दास्तां संजोए हुए है पर लोग यहां जाने में कम ही रुचि नहीं ले रहे हैं। पहले यहां रोज स्कूल, कॉलेज या बाहर से करीब 200 लोग आते थे। अब यहां दिन में पांच पर्यटक भी नहीं आ रहे हैं। यहां पर पुरातत्व विभाग का एक केयर टेकर और सफाई के लिए एक कर्मचारी तैनात हैं। कई बार विभाग के अधिकारी ही यहां का निरीक्षण करने आते हैं।
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हरियाणा राज्य सरकार की ओर से राज्यपाल की अध्यक्षता में गठित द बैटल ऑफ पानीपत मेमोरियल सोसायटी ने पानीपत में संग्रहालय स्थापित किया था। जिसका मुख्य उद्देश्य प्रदेश के पुरातत्व, इतिहास, कला और शिल्प के प्रति लोगों को जागरूक करना था। यहां प्राचीन शिलालेख, मूर्तियां, हथियार और आर्मर के साथ मिट्टी के बर्तनों, मूल्यवान दस्तावेजों, आभूषण, कला और शिल्प वस्तुएं देखने को मिलती हैं। ये संग्रहालय पुराने समय के वीर और देशभक्ति योद्धाओं की बहादुरी को जहन में ताजा रखे हुए है। यहां पर कुछ लघुचित्रों की तस्वीरों का विस्तार किया गया है। जोकि बबरुलामा और अकबरनामा से ली गईं हैं। इन्हें नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय, ब्रिटिश लाइब्रेरी और विक्टोरिया और लंदन के अल्बर्ट संग्रहालय से लाया गया है। पहले इस संग्रहालय को निशुल्क देखा जा सकता था। कुछ दिन पहले ही पुरातत्व और संग्रहालय विभाग हरियाणा ने यहां टिकट सिस्टम लागू कर दिया है। अब स्कूली बच्चों के लिए 10, व्यस्क के लिए 25 और विदेशी पर्यटक के लिए 75 रुपये की टिकट निर्धारित की गई है।
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काला आंब के पेड़ से बनाई गई है चौखट, इस पेड़ के नीचे सैनिकों ने वीरगति प्राप्त की थी
संग्रहालय में पानीपत के विश्व विख्यात तीनों युद्धों से जुड़ी जानकारियां मौजूद हैं। यहां प्राचीन अस्त्र शस्त्र और ढाल, मूर्तिकला, प्राचीन कृषि यंत्र, आभूषण, वाद्य यंत्र, तोप, पालम बावड़ी का अभिलेख, प्राचीन पेंटिंग और मिट्टी के बर्तनों के साथ पुराने समय में लोगों की वेशभूषा तक संरक्षित करके रखी गई है। इसके अलावा योद्धाओं के हथियार व उनकी वेशभूषा को पेश करते हुए मीम भी हैं। यहां करनाल के विक्टोरिया मेमोरियल हाल से लाई गई 100 वर्ष पुरानी लकड़ी की चौखट भी है। बताया जाता है कि इस लकड़ी की चौखट को काला आंब के विश्व विख्यात पेड़ से काटकर बनाया गया था, जिसके नीचे लाखों सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए थे। पुराने समय के सिक्के व मुद्राओं समेत यहां कृषि व खानपान के प्रयोग किए जाने वाले बर्तन भी आकर्षण का केंद्र हैं।
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युद्धों की याद दिलाने वाली कुछ तस्वीरें भी संग्रहालय की प्रदर्शनी में हैं
यहां पानीपत की धरती पर हुए तीनों युद्धों की खास जानकारी भी है। जिसमें पहली लड़ाई 1526 में काबुल के तैमूरी शासक जहीर उद्दीन मोहम्मद बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोधी के बीच हुई थी। इसमें बाबर की जीत हुई थी। यह उन पहली लड़ाइयों मे से एक थी जिसमें बारूद, आग्नेयास्त्र और मैदानी तोपखाने को लड़ाई में शामिल किया गया था। दूसरा युद्ध 5 नवंबर 1556 को उत्तर भारत के हिंदू शासक सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य उर्फ हेमू और अकबर की सेना के बीच लड़ा गया था। अकबर के सेनापति खान जमान और बैरम खान के लिए यह एक निर्णायक जीत थी, इसमें हेमू की हार हुई थी। तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को पानीपत के मैदान में हुआ। इसमें मराठों की हार हुई थी। ये युद्ध सबसे बड़ा युद्ध माना गया था। इन युद्धों की याद दिलाने वाली कुछ तस्वीरें इस संग्रहालय की प्रदर्शनी में हैं, जो आकर्षण का केंद्र हैं।
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