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बच्चों से लेकर बूढ़ों तक को दो दशक से ज्ञान का प्रकाश दे रहा दंपती

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 16 May 2022 01:57 AM IST
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Life is morning, keep rising from the sun...
पानीपत। हो के मायूस न यूं शाम से ढलते रहिए, जिंदगी भोर है सूरज से निकलते रहिए...। कवि कुंवर बेचैन की इन पंक्तियों को कमला आर्य और उनके कवि एवं साहित्यकार पति दीपचंद निर्मोही ने महिलाओं एवं बच्चों का जीवन संवारने में सही साबित कर दिया। दंपती दो दशक से बच्चों और महिलाओं को ज्ञान का प्रकाश दे रहा है। नतीजतन बच्चे इंजीनियर-डॉक्टर और महिलाएं आत्मनिर्भर बनीं।
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इनकी कक्षाएं किसी फैक्टरी, घर के आंगन या कहीं शेड के नीचे चलती हैं। अपने संगठन चेतना परिवार के सदस्यों के साथ जिले में 100 स्थानों पर स्कूल संचालित कर रहे हैं। जहां गरीबी की वजह से बालश्रम करने को मजबूर बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। इन स्कूलों से ज्ञान ग्रहण करने की शुरुआत बच्चों को आज कामयाबी की बुलंदी पर लेकर आई है। वर्तमान में 2500 से अधिक बच्चे और महिलाएं चेतना परिवार से जुड़कर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। चेतना परिवार अन्य राज्यों में भी ज्ञान की रोशनी फैलाने की दिशा में अग्रसर है।
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पति से महज सौ रुपये लेकर की थी शुरुआत
चेतना परिवार के स्कूल की शुरुआत करने वाली 75 वर्षीय कमला आर्य ने बताया कि वह कम पढ़ी-लिखी हैं लेकिन ज्ञान की जरूरत से अनजान नहीं हैं। वर्ष 2002 में घर से किसी काम के लिए निकली थीं और रास्ते में कूड़ा बीनने वाले बच्चों को देखा। उनसे बात की और उनके जीवन एवं भविष्य को बेहतर करने की इच्छा जगी। मानो जीवन का मकसद मिल गया। फिर पति दीपचंद्र निर्मोही से महज सौ रुपये लेकर शुरुआत कर दी। बाजार से किताबें, स्लेट, चाक आदि खरीदकर शिक्षा देना शुरू किया। इसमें पति ने भी पूरी मदद की। धीरे-धीरे परिवार बढ़ता गया। फिर लगा एक जगह पर स्कूल खोलना काफी नहीं है। इसके बाद कई कॉलोनियों और गांवों में इसकी शुरुआत की। उन्होंने बताया कि आज चेतना परिवार के कई राज्यों में सौ से भी ज्यादा स्कूल और प्रशिक्षण केंद्र हैं।
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महिलाओं को बनाते हैं आत्मनिर्भर
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए सिलाई, कढ़ाई, ब्यूटी पार्लर आदि की ट्रेनिंग दी जाती है। पढ़ाई और प्रशिक्षण पूरी तरह निशुल्क है। इन विधाओं को सीखकर महिलाएं अपना रोजगार शुरू कर सकती हैं। उन्हें किसी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है।
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