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कर्म किसी के भी सगे नहीं : आशीष मुनि
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पानीपत। उत्तर भारतीय प्रवर्तक राष्ट्र संत आशीष मुनि महाराज ने कहा कि कर्म किसी के भी सगे नहीं होते। बड़े से बड़े राजा-महाराजा, श्रेष्ठि, सेनापति, विद्वान और ज्ञानी भी इन कर्मों की मार से बच नहीं पाए।
पाप जन्य क्रिया से आत्मा के योग मलीन हो जाते हैं। मलीन योगी में क्रोध, मान माया, लोभ रूपी कषाय का समिश्रण होने से कर्म बंध हो जाते हैं।
उन्होंने उक्त विचार अग्रवाल मंडी जैन स्थानक में सत्संग में कहे। उनके साथ उत्तम मुनि महाराज, विराग मुनि जी महाराज, बालचंद महाराज ठाणे-4 शामिल रहे। इससे पहले महासचिव राजेंद्र जैन ने अग्रवाल मंडी में पर प्रवर्तक महाराज व अन्य संतों का मंगल स्वागत किया। संत आशीष मुनि महाराज ने पाप के बारे में विस्तार से अपने विचार रखे।
उन्हाेंने कहा कि जो करने में आसान हो लेकिन भोगने में कठिन हो वह पाप होता है। हिंसा, झूठ, चोरी, दुराचार, आसक्ति, लड़ाई, झगड़ा सभी दुष्प्रवृति पाप के अंतर्गत आती हैं।
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यदि आपको जीवन सुख, शांति आनंद चाहिए तो उपरोक्त पाप जन्य क्रिया को त्याग कर दया, करुणा, सेवा, सत्य, संतोष, शील, सदाचार को अपनाना चाहिए।
इन्हें ही पुण्य या धर्माचरण कहा जाता है। यही शुभ आचरण जीवन में सुख देता है और दुख से बचाता है। उत्तम मुनि महाराज ने कहा कि संसार में चार गति में अनंत जीव हैं। इनमें मानव जीवन सर्वश्रेष्ठ है लेकिन मिलना अति दुष्कर है। इसमें भी स्वस्थ शरीर, सत्संग और यहां सीखे गए ज्ञान को आचरण में लाना तो और भी कठिन है।
हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमें सम्यक देव, गुरु और धर्म की प्राप्ति हुई है। हमें अपने जीवन को सार्थक बनाना है। इस अवसर पर भगत महावीर प्रसाद जैन, डॉ. एपी जैन, सुभाष जैन, रामफल जैन, राजपाल जैन, जगदीश जैन, डॉ. ईश्वर जैन, वीरेंद्र जैन, रामकिशन जैन, विजय जैन, सीमा जैन व कविता जैन उपस्थित रही।
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पाप जन्य क्रिया से आत्मा के योग मलीन हो जाते हैं। मलीन योगी में क्रोध, मान माया, लोभ रूपी कषाय का समिश्रण होने से कर्म बंध हो जाते हैं।
उन्होंने उक्त विचार अग्रवाल मंडी जैन स्थानक में सत्संग में कहे। उनके साथ उत्तम मुनि महाराज, विराग मुनि जी महाराज, बालचंद महाराज ठाणे-4 शामिल रहे। इससे पहले महासचिव राजेंद्र जैन ने अग्रवाल मंडी में पर प्रवर्तक महाराज व अन्य संतों का मंगल स्वागत किया। संत आशीष मुनि महाराज ने पाप के बारे में विस्तार से अपने विचार रखे।
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उन्हाेंने कहा कि जो करने में आसान हो लेकिन भोगने में कठिन हो वह पाप होता है। हिंसा, झूठ, चोरी, दुराचार, आसक्ति, लड़ाई, झगड़ा सभी दुष्प्रवृति पाप के अंतर्गत आती हैं।
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यदि आपको जीवन सुख, शांति आनंद चाहिए तो उपरोक्त पाप जन्य क्रिया को त्याग कर दया, करुणा, सेवा, सत्य, संतोष, शील, सदाचार को अपनाना चाहिए।
इन्हें ही पुण्य या धर्माचरण कहा जाता है। यही शुभ आचरण जीवन में सुख देता है और दुख से बचाता है। उत्तम मुनि महाराज ने कहा कि संसार में चार गति में अनंत जीव हैं। इनमें मानव जीवन सर्वश्रेष्ठ है लेकिन मिलना अति दुष्कर है। इसमें भी स्वस्थ शरीर, सत्संग और यहां सीखे गए ज्ञान को आचरण में लाना तो और भी कठिन है।
हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमें सम्यक देव, गुरु और धर्म की प्राप्ति हुई है। हमें अपने जीवन को सार्थक बनाना है। इस अवसर पर भगत महावीर प्रसाद जैन, डॉ. एपी जैन, सुभाष जैन, रामफल जैन, राजपाल जैन, जगदीश जैन, डॉ. ईश्वर जैन, वीरेंद्र जैन, रामकिशन जैन, विजय जैन, सीमा जैन व कविता जैन उपस्थित रही।