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एनएमसी बनाने के विरोध में बंद रहीं 136 निजी अस्पतालों की ओपीडी, भटकते रहे 12 हजार मरीज
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पानीपत। सरकारी छुटी हाने के सुचना ना मीलने पर सीवील अस्पताल के बाहर लगी मरीजों की भीड़ ।
- फोटो : panipat
नेशनल मेडिकल काउंसिल (एनएमसी) के खिलाफ संघर्ष कर रहे निजी डॉक्टर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के आह्वान पर बुधवार को जिले के 136 निजी अस्पतालों में ओपीडी बंद रही। वहीं दूसरी ओर शहीद उद्यम सिंह जयंती की सरकारी छुट्टी होने के कारण सरकारी अस्पताल में भी मरीजों को इलाज नहीं मिला। आपातकालीन सेवाएं ही मरीजों को मिल पाई। ऐसे में जिले के 12 हजार मरीज सड़कों पर भटकते रहे।
आईएमए की जिलाध्यक्ष ने बताया कि सरकार डॉक्टरों के हितों का हनन कर रही है। सरकार एनएमसी में राजनेताओं, आईएएस ऑफिसरों व अन्य लोगों को शामिल कर रही है। जोकि डॉक्टरों के हितों का ख्याल नहीं रख सकते। यदि सरकार ने एनएमसी में संशोधन नहीं किया तो वो आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष के आदेशों पर सभी प्रकार की सेवाएं बंद कर देंगे। इस एक्ट के अनुसार फार्मासिस्ट, नर्सें, आशा वर्कर व बीएमएस डॉक्टर तीन साल का एक कोर्स कर मरीजों को इलाज दे सकेंगे। जोकि मरीजों के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। एक्ट आयुर्वेदिक डॉक्टरों को भी एलोपैथिक इलाज करने की परमिशन दे रहा है। जबकि जो डॉक्टर जिस विषय का विशेषज्ञ होता है उसको उसी क्षेत्र में काम करने की परमिशन होनी चाहिए।
निजी अस्पतालों में होती है हर रोज 12 हजार मरीजों की ओपीडी
जिले के 136 निजी अस्पतालों में हर रोज 12 हजार मरीजों की ओपीडी होती है। शनिवार को मरीजों को सिविल अस्पताल में भी इलाज नहीं मिल पाया। सुबह से धक्के खाने के बाद ये मायूस अपने घर लौट गए। मरीजों का कहना था कि जब निजी अस्पताल हड़ताल पर थे तो सरकार को सरकारी अस्पतालों में कोई व्यवस्था जरूर करनी चाहिए थी।
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निजी डॉक्टरों ने पहले ही हड़ताल का ऐलान कर दिया था तो सरकार की जिम्मेदारी बनती थी कि कोई प्रबंध करें। मैं भी शुगर का मरीज हूं और 70 साल उसकी उम्र है। ईलाज निजी अस्पताल में गया था, लेकिन ओपीडी बंद होने के उसको सिविल अस्पताल में आना पड़ा। यहां भी छुट्टी मिली। वो 35 किलोमीटर दूर से यहां इलाज के लिए आया था। सरकार मरीजों को लेकर गंभीर नहीं है।
-रमेश निवासी गांव जालपाड़
निजी अस्पतालों में हड़ताल थी। कई अस्पतालों में गया, लेकिन कहीं भी ओपीडी नहीं हो रही थी। वह काफी दिनों से माइग्रेन की समस्या के कारण परेशान है। वह इलाज के लिए सिविल अस्पताल में आया तो पता चला कि यहां तो फिजीशियन ही नहीं है। दूसरे डॉक्टरों ने दवा दी है। मरीजों को हड़ताल के कारण काफी धक्के खाने पड़ रहे हैं।
-संदीप कुमार, शहरवासी
शनिवार को सभी निजी डॉक्टर हड़ताल पर रहे। इस कारण शहर के मरीज इलाज के लिए इधर से उधर भटकते रहे। वो कांवड़ लेने गया था गौमुख के पास पत्थर गिरने से वो घायल हो गया। उसके पैरों व हाथों में चोट है। सिविल अस्पताल में भी इलाज नहीं मिला। डॉक्टराको भगवान का दूसरा रूप कहते हैं तो डॉक्टरों को अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखनी चाहिए।
- नरेंद्र वधवा, शहरवासी
कुत्ते ने काट लिया था, सिर्फ पट्टी हुई इंजेक्शन के पैसे नहीं थे- छोटे लाल
वो पेशे से मजदूर है। मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसके पास रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं है। काम करने के बाद वो फ्लाईओवर के नीचे ही सो जाता है। रात को सोते वक्त कुत्ते ने उसे काट लिया। अस्पताल में आया तो पट्टी कर दी। इंजेक्शन लगवाने के लिए 100 रुपये नहीं थे। इसलिए इंजेक्शन नहीं लगा।
-छोटे लाल, प्रवासी मजदूर
क्या है एनएमसी बिल
अब तक मेडिकल शिक्षा, मेडिकल संस्थानों और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन से संबंधित काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी थी, लेकिन बिल पास होने के बाद एनएमसी विधेयक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह लेगा। बिल के तहत 3.5 लाख नॉन मेडिकल लोगों को लाइसेंस देकर सभी प्रकार की दवाइयां लिखने और इलाज करने का कानूनी अधिकार दिया जा रहा है, जिसका डॉक्टर विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा एमसीआई का नेतृत्व डॉक्टर रहे थे। अब इसकी जगह एनएमसी को दे दी गई है। इसमें डॉक्टरों के साथ साथ नेता, आईपीएस ऑफिसर व समाजसेवा रहेंगे। डॉक्टर इसका भी विरोध कर रहे हैं।
सरकार डॉक्टरों के हितों का हनन कर रही है। सरकार जबरदस्ती उन पर नेशनल मेडिकल काउंसिल थोप रही है। एनएमसी पूर्ण रूप से डॉक्टरों के विरोध में है। वो कई साल से सरकार से मांग कर रहे हैं कि एनएमसी को या तो भंग किया जाए या इसमें संशोधन किया जाए।
डॉ. अंजलि, जिलाध्यक्ष, आईएमए
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आईएमए की जिलाध्यक्ष ने बताया कि सरकार डॉक्टरों के हितों का हनन कर रही है। सरकार एनएमसी में राजनेताओं, आईएएस ऑफिसरों व अन्य लोगों को शामिल कर रही है। जोकि डॉक्टरों के हितों का ख्याल नहीं रख सकते। यदि सरकार ने एनएमसी में संशोधन नहीं किया तो वो आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष के आदेशों पर सभी प्रकार की सेवाएं बंद कर देंगे। इस एक्ट के अनुसार फार्मासिस्ट, नर्सें, आशा वर्कर व बीएमएस डॉक्टर तीन साल का एक कोर्स कर मरीजों को इलाज दे सकेंगे। जोकि मरीजों के लिए बहुत खतरनाक साबित हो सकता है। एक्ट आयुर्वेदिक डॉक्टरों को भी एलोपैथिक इलाज करने की परमिशन दे रहा है। जबकि जो डॉक्टर जिस विषय का विशेषज्ञ होता है उसको उसी क्षेत्र में काम करने की परमिशन होनी चाहिए।
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निजी अस्पतालों में होती है हर रोज 12 हजार मरीजों की ओपीडी
जिले के 136 निजी अस्पतालों में हर रोज 12 हजार मरीजों की ओपीडी होती है। शनिवार को मरीजों को सिविल अस्पताल में भी इलाज नहीं मिल पाया। सुबह से धक्के खाने के बाद ये मायूस अपने घर लौट गए। मरीजों का कहना था कि जब निजी अस्पताल हड़ताल पर थे तो सरकार को सरकारी अस्पतालों में कोई व्यवस्था जरूर करनी चाहिए थी।
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निजी डॉक्टरों ने पहले ही हड़ताल का ऐलान कर दिया था तो सरकार की जिम्मेदारी बनती थी कि कोई प्रबंध करें। मैं भी शुगर का मरीज हूं और 70 साल उसकी उम्र है। ईलाज निजी अस्पताल में गया था, लेकिन ओपीडी बंद होने के उसको सिविल अस्पताल में आना पड़ा। यहां भी छुट्टी मिली। वो 35 किलोमीटर दूर से यहां इलाज के लिए आया था। सरकार मरीजों को लेकर गंभीर नहीं है।
-रमेश निवासी गांव जालपाड़
निजी अस्पतालों में हड़ताल थी। कई अस्पतालों में गया, लेकिन कहीं भी ओपीडी नहीं हो रही थी। वह काफी दिनों से माइग्रेन की समस्या के कारण परेशान है। वह इलाज के लिए सिविल अस्पताल में आया तो पता चला कि यहां तो फिजीशियन ही नहीं है। दूसरे डॉक्टरों ने दवा दी है। मरीजों को हड़ताल के कारण काफी धक्के खाने पड़ रहे हैं।
-संदीप कुमार, शहरवासी
शनिवार को सभी निजी डॉक्टर हड़ताल पर रहे। इस कारण शहर के मरीज इलाज के लिए इधर से उधर भटकते रहे। वो कांवड़ लेने गया था गौमुख के पास पत्थर गिरने से वो घायल हो गया। उसके पैरों व हाथों में चोट है। सिविल अस्पताल में भी इलाज नहीं मिला। डॉक्टराको भगवान का दूसरा रूप कहते हैं तो डॉक्टरों को अपनी प्रतिष्ठा बचाए रखनी चाहिए।
- नरेंद्र वधवा, शहरवासी
कुत्ते ने काट लिया था, सिर्फ पट्टी हुई इंजेक्शन के पैसे नहीं थे- छोटे लाल
वो पेशे से मजदूर है। मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसके पास रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं है। काम करने के बाद वो फ्लाईओवर के नीचे ही सो जाता है। रात को सोते वक्त कुत्ते ने उसे काट लिया। अस्पताल में आया तो पट्टी कर दी। इंजेक्शन लगवाने के लिए 100 रुपये नहीं थे। इसलिए इंजेक्शन नहीं लगा।
-छोटे लाल, प्रवासी मजदूर
क्या है एनएमसी बिल
अब तक मेडिकल शिक्षा, मेडिकल संस्थानों और डॉक्टरों के रजिस्ट्रेशन से संबंधित काम मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी थी, लेकिन बिल पास होने के बाद एनएमसी विधेयक मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की जगह लेगा। बिल के तहत 3.5 लाख नॉन मेडिकल लोगों को लाइसेंस देकर सभी प्रकार की दवाइयां लिखने और इलाज करने का कानूनी अधिकार दिया जा रहा है, जिसका डॉक्टर विरोध कर रहे हैं। इसके अलावा एमसीआई का नेतृत्व डॉक्टर रहे थे। अब इसकी जगह एनएमसी को दे दी गई है। इसमें डॉक्टरों के साथ साथ नेता, आईपीएस ऑफिसर व समाजसेवा रहेंगे। डॉक्टर इसका भी विरोध कर रहे हैं।
सरकार डॉक्टरों के हितों का हनन कर रही है। सरकार जबरदस्ती उन पर नेशनल मेडिकल काउंसिल थोप रही है। एनएमसी पूर्ण रूप से डॉक्टरों के विरोध में है। वो कई साल से सरकार से मांग कर रहे हैं कि एनएमसी को या तो भंग किया जाए या इसमें संशोधन किया जाए।
डॉ. अंजलि, जिलाध्यक्ष, आईएमए