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गोल्डन ब्वॉय निज्जू का दस साल में 25 से 87.58 मीटर तक भाला फेंकने का सफर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Sun, 08 Aug 2021 01:41 AM IST
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Golden boy Nijju's journey of throwing javelin from 25 to 87.58 meters in ten years
तीन महान युद्धों की गवाह पानीपत की धरती पर जन्में नीरज चोपड़ा के भाला फेंकने की पूरी दुनिया कायल हो गई है। भारतीय थल सेना के सूबेदार नीरज चोपड़ा ने टोक्यो ओलंपिक में 87.58 मीटर दूर भाला फेंका, जो देेश के लिए गोल्ड मेडल की सौगात लेकर आया। दस साल पहले नीरज ने 25 मीटर दूर भाला फेंका था। उस समय गांव बिंझौल निवासी जैवलिन थ्रोअर जयवीर सिंह, पानीपत के शिवाजी स्टेडियम में अभ्यास करते थे। उन्होंने ही सबसे पहले नीरज को जैवलिन के लिए पानीपत से बाहर खेलने की सलाह दी थी। नीरज ने पहली ही बार में 25 मीटर दूर भाला फेंका तो जयवीर को नीरज भा गया। इसके बाद शुरू हुआ नीरज का टोक्यो ओलंपिक तक का सफर। नीरज का भी जैवलिन थ्रो में मन रम गया और उन्होंने बहाने छोड़कर कठोर परिश्रम शुरू कर दिया। पानीपत के बाद नीरज को अभ्यास के लिए पहली बार यमुनानगर और इसके बाद पंचकूला भेज दिया गया। इसके बाद नीरज एक के बाद एक मेडल लाने लगा। सभी अभ्यास और भाला फेंकने की तकनीक में नीरज ने हर बार कोच जयवीर का जिक्र किया है। दस साल पहले 25 मीटर से शुरू हुआ सफर टोक्यो ओलंपिक में 87.58 मीटर पर पहुंचा और भारत की झोली में स्वर्ण डाल दिया।
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जिले के गांव खंडरा में सतीश और सरोज के घर जन्में पहले बच्चे नीरज के घर का नाम निज्जू है। परिवार और गांव के लोग उसे प्यार से निज्जू ही बुलाते हैं। नीरज को बचपन से ही दूध दही का खाना, लंबे बाल रखना, हर्ले डेविडसन बाइक की सवारी और पंजाबी गानों का शौक है। कोच के कहने पर उन्होंने अपने बालों का आकार कुछ कम किया था। वहीं पिछले एक साल से नीरज टोक्यो ओलंपिक की तैयारी में जुट गया था, एक साल से तो उसका मोबाइल फोन भी बंद था, परिजन भी कोच के माध्यम से नीरज से कुछ देर ही बात करते थे।
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80 किलो पहुंच गया था वजन
नीरज की बचपन से ही ज्यादा खुराक थी। उसे ज्यादा घी और दूध पीने की आदत थी। जिससे बचपन में ही उसका वजन 80 किलोग्राम तक पहुंच गया। नीरज के बढ़ते वजन को कम करने के लिए चाचा सुरेंद्र उसे जिम लेकर गए, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद उन्होंने नीरज को पानीपत के शिवाजी स्टेडियम में भेजा और फिटनेस ट्रेनर व जैवलिन थ्रोअर के कोच जितेंद्र जागलान को सौंप दिया। कोच जितेंद्र ने नीरज की जमकर कसरत करवाई। नीरज बहाने बनाता, लेकिन नीरज के बहानों पर कोच जितेंद्र और अधिक सख्त हो जाते। जितेंद्र ने नीरज का वजन कम कराया और उसे एथलीट बनने की सलाह देते हुए पहली बार भाला थमाया।
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परिवार ने झेली हर मुश्किल
नीरज के परिवार पर सिर्फ गुजारे लायक ही भूमि है। वहीं नीरज के पिता सतीश, चाचा भीम सिंह व चाचा सुरेंद्र का 19 सदस्यों का संयुक्त परिवार है। तीनों भाई कठोर परिश्रम कर जैसे तैसे अपना व परिवार का पेट पालते थे। वहीं नीरज के खेल की दुनिया में कदम रखते ही खर्च बढ़ने लगा। तीनों भाइयों ने आर्थिक कमजोरी का अहसास कभी नीरज को नहीं होने दिया और नीरज को सफल बनाने में उसका हर संभव सहयोग किया। नीरज की खेल संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए कई बार परिवार को त्याग भी करने पड़े।

जमीन से जुड़े नीरज
जैवलिन थ्रो में एक के बाद एक सफलता मिलने के बाद भी नीरज आज भी जमीनी व्यक्तित्व हैं। नीरज जब भी अपने घर आता तो परिवार के साथ गांव वालों से भी मिलता और पिता सतीश के साथ जाकर अपने खेत खलियान भी देख कर आता। अपने बचपन के दोस्तों से भी नीरज दिल खोल कर मिलता। पड़ोसियों का भी हाल चाल जानता।
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