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Panipat News: दिल्ली के किसान ने हरियाणा में आकर पराली प्रबंधन काे अपनाया
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कुलदीप राठी
समालखा। दिल्ली के लिए पर्यावरण प्रदूषण बड़ी समस्या बनी हुई है। इसी दिल्ली के खेड़ा खुर्द गांव के किसान ब्रह्मप्रकाश मान हरियाणा के पानीपत जिला के समालखा में फसल प्रबंधन कर मिसाल बने हुए हैं।
ब्रह्मप्रकाश ने लाखों रुपये की लागत से फसल अवशेष प्रबंधन की मशीन जोड़ी हैं। इसके लिए अपनी एक टीम खड़ी की। मान ने इस साल 35 से 40 हजार क्विंटल पराली की गांठ बनाने का फैसला लिया है। इसके अच्छे परिणाम मिलने पर अगले साल एक लाख क्विंटल पराली के प्रबंधन का लक्ष्य रखा है।
ब्रह्मप्रकाश मान ने बताया कि वे मूल रूप से खेड़ा खुर्द दिल्ली निवासी हैं। दिल्ली में पर्यावरण प्रदूषण बड़ी समस्या है। इस समय तो सांस लेने में भी परेशानी होती है। उनका समालखा के चुलकाना रोड पर फार्म हाउस है।
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वह यहां गेहूं और धान के साथ दूसरी फसलों की भी खेती करते हैं। वह 1995 से फसल अवशेष का प्रबंधन कर रहे हैं। पिछले कई वर्षों में पर्यावरण प्रदूषण बढ़ गया।
उन्होंने आगे आकर इस समस्या को समाधान में बदलने का फैसला लिया। यहां लाखों रुपये की लागत से मशीन जोड़ी और एक टीम बनाई। वह समालखा में 300 एकड़ में धान की खेती करते हैं। पहले पराली को जुताई कर खेत में दबा देते थे। इससे पराली को खत्म करने में समय लगता था। अब आधुनिकीकरण के दौर में मशीनों से गांठ बनाना शुरू कर दी।
पराली को स्टोर कर मांग पर बेचते हैं
ब्रह्मप्रकाश मान ने बताया कि वह हर साल पराली और अवशेष की गांठ बनाकर स्टोर कर लेते हैं। इसकी मांग होने पर उचित रेट में बेचते हैं। उन्होंने खेती के साथ इसको बिजनेस में बदल लिया है। वह पराली को एथनोल या फिर गत्ता बनाने के लिए फैक्ट्री में देते हैं। इस बार 35 से 40 हजार क्विंटल पराली को स्टोर करने का लक्ष्य है।
इसके लिए पूरी टीम काम कर रही है। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन के कृषि उपकरणों पर सरकार सब्सिडी देती है। कई उपकरणों पर 50 प्रतिशत तक है। सरकार को यह सब्सिडी किसान की बजाय सीधे उपकरण बेचने वाले डीलर को देनी चाहिए।
किसान के पास इनके बिल पास कराने और फिर सब्सिडी लेने के लिए समय नहीं होता है। इनको कार्यालयों के भी चक्कर काटने पड़ते हैं। पानीपत में रिफाइनरी के अलावा अदानी के गोदाम समेत कई अन्य स्थानों पर पराली और धान के अवशेषों की मांग है। किसान को इनका प्रबंधन करने पर सरकार की ओर से एक हजार रुपये प्रति एकड़ रुपये भी दिया जाता है। इसके अलावा उनकी जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है।
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समालखा। दिल्ली के लिए पर्यावरण प्रदूषण बड़ी समस्या बनी हुई है। इसी दिल्ली के खेड़ा खुर्द गांव के किसान ब्रह्मप्रकाश मान हरियाणा के पानीपत जिला के समालखा में फसल प्रबंधन कर मिसाल बने हुए हैं।
ब्रह्मप्रकाश ने लाखों रुपये की लागत से फसल अवशेष प्रबंधन की मशीन जोड़ी हैं। इसके लिए अपनी एक टीम खड़ी की। मान ने इस साल 35 से 40 हजार क्विंटल पराली की गांठ बनाने का फैसला लिया है। इसके अच्छे परिणाम मिलने पर अगले साल एक लाख क्विंटल पराली के प्रबंधन का लक्ष्य रखा है।
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ब्रह्मप्रकाश मान ने बताया कि वे मूल रूप से खेड़ा खुर्द दिल्ली निवासी हैं। दिल्ली में पर्यावरण प्रदूषण बड़ी समस्या है। इस समय तो सांस लेने में भी परेशानी होती है। उनका समालखा के चुलकाना रोड पर फार्म हाउस है।
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वह यहां गेहूं और धान के साथ दूसरी फसलों की भी खेती करते हैं। वह 1995 से फसल अवशेष का प्रबंधन कर रहे हैं। पिछले कई वर्षों में पर्यावरण प्रदूषण बढ़ गया।
उन्होंने आगे आकर इस समस्या को समाधान में बदलने का फैसला लिया। यहां लाखों रुपये की लागत से मशीन जोड़ी और एक टीम बनाई। वह समालखा में 300 एकड़ में धान की खेती करते हैं। पहले पराली को जुताई कर खेत में दबा देते थे। इससे पराली को खत्म करने में समय लगता था। अब आधुनिकीकरण के दौर में मशीनों से गांठ बनाना शुरू कर दी।
पराली को स्टोर कर मांग पर बेचते हैं
ब्रह्मप्रकाश मान ने बताया कि वह हर साल पराली और अवशेष की गांठ बनाकर स्टोर कर लेते हैं। इसकी मांग होने पर उचित रेट में बेचते हैं। उन्होंने खेती के साथ इसको बिजनेस में बदल लिया है। वह पराली को एथनोल या फिर गत्ता बनाने के लिए फैक्ट्री में देते हैं। इस बार 35 से 40 हजार क्विंटल पराली को स्टोर करने का लक्ष्य है।
इसके लिए पूरी टीम काम कर रही है। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष प्रबंधन के कृषि उपकरणों पर सरकार सब्सिडी देती है। कई उपकरणों पर 50 प्रतिशत तक है। सरकार को यह सब्सिडी किसान की बजाय सीधे उपकरण बेचने वाले डीलर को देनी चाहिए।
किसान के पास इनके बिल पास कराने और फिर सब्सिडी लेने के लिए समय नहीं होता है। इनको कार्यालयों के भी चक्कर काटने पड़ते हैं। पानीपत में रिफाइनरी के अलावा अदानी के गोदाम समेत कई अन्य स्थानों पर पराली और धान के अवशेषों की मांग है। किसान को इनका प्रबंधन करने पर सरकार की ओर से एक हजार रुपये प्रति एकड़ रुपये भी दिया जाता है। इसके अलावा उनकी जमीन की उर्वरा शक्ति बनी रहती है।