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नोटिस से निगम और किलावासियों में हड़कंप
अमर उजाला/ब्यूरो, पानीपत
Updated Tue, 29 Jul 2014 11:43 PM IST
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पानीपत। हाईकोर्ट से मेयर और सदन समेत 26 लोगों को नोटिस आने के बाद किला विस्थापित 241 परिवारों समेत शहर की सरकार में हंगामा मच गया है और राहत देने को उठाया कदम गलत पड़ने पर लोगों को अपने आशियाना बचाने के लाले पड़ते दिखाई दे रहे हैं।
नगर निगम को किले के मामले में 13 साल में दूसरी बार मुंह की खानी पड़ी है। इससे पहले 2001 में पास प्रस्ताव को वापस भेज दिया था। वहीं मेयर लोगों के हक के लिए लड़ने के दावे कर रहे हैं। किलावासी भी इसको लेकर एकजुट होेने की कह रहे हैं।
गौरतलब है कि किले की करीब 54 हजार वर्ग गज जमीन में 45 हजार गज जमीन पर कब्जा है। इस 45 हजार में से 15 हजार गज पर केवल आठ लोगों और संस्थाओं का कब्जा है। समान नागरिक संहिता अभियान के संयोजक नेमचंद इसको लेकर कोर्ट में चले गए और यह मामला हाईकोर्ट में चला गया।
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हाईकोर्ट ने छह जुलाई 2012 को नगर निगम को आदेश कर किले की जमीन को कब्जा मुक्त कराने और इसकी रिपोर्ट देने की बात कही। नगर निगम के संयुक्त सचिव की कोर्ट ने इनको नोटिस जारी कर दिए और उनकी कोर्ट में सुनवाई की गई। इसी बीच नगर निगम के हाउस की दो जून को हुई बैठक में किलावासियों को राहत देते हुए मंजूर कर दिया।
इसके तहत 1996-97 के कलेक्टर रेट 310 रुपये प्रति गज के हिसाब से रजिस्ट्री करानी थी। निगम हाउस की बैठक की कार्यवाही अभी सिरे नहीं चढ़ी थी कि हाईकोर्ट ने मेयर भूपेंद्र सिंह, सीनियर डिप्टी मेयर काजल बठला, डिप्टी मेयर सीमा पाहवा, नगर निगम के संयुक्त सचिव आरएस वर्मा, ईओ सुरेंद्र समेत सभी 24 पार्षदों को अवमानना नोटिस जारी कर दिया। इसके बाद नगर निगम और किले में हंगामा खड़ा हो गया। ं
हाईकोर्ट खारिज कर चुका है वन-10 एप्लीकेशन
हाईकोर्ट इससे पहले किलावासियों की वन-10 एप्लीकेशन को खारिज कर चुका है। किलावासियों की माने तो उन्होंने हाईकोर्ट में वन-10 एप्लीकेशन लगाई थी। वन-10 में किसी मामले को लेकर दो पक्षों के बीच चल रहे विवाद में तीसरा पक्ष बीच में आ जाए। इस पक्ष के आने के बाद कोर्ट में चल रहा विवाद काफी हद तक सुलझ सकता है, लेकिन किलावासियों के पास यह रास्ता भी नहीं बचा है।
2001 में भी किया था पास
किलावासियों को राहत देने का प्रयाय 2001 में भी किया गया था। उस वक्त मुकेश टुटेजा नगर परिषद के चेयरमैन थे। सदन द्वारा प्रस्ताव पास करने के बाद किलावासियों को राहत की सांस मिली थी, लेकिन इसके बाद प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। लोगों की राहत की उम्मीद टूट गई थी।
किले की राजनीति के मायने भी हैं
किलावासियों को राहत मिलने के बजाय उल्टे सदन को नोटिस मिलना राजनीति में मायने रखता है। ऐसा माना जा रहा है कि शहरी विधानसभा को लेकर किलेवासियों की अहम भूमिका है। कांग्रेसी विधायक बलबीर पाल शाह भी उनको राहत देना चाहते थे और उनके प्रयासों से ही नगर निगम के सदन में किलेवासियों को राहत देने के मुद्दे को शामिल किया गया था।
वर्जन
किलावासी अपने आशियाना बचाने के लिए एकजुट हैं और प्रयास कर रहे हैं। उनको नगर निगम के सदन पर उम्मीद थी और उन्होंने इसको पास भी कर दिया था। आरोपकर्ता ने इसमें वकील के मार्फत नोटिस भिजवाया है। वे सब मेयर, हाउस और निगम अधिकारियों के साथ हैं।
दीपक छाबड़ा, प्रधान, किला संघर्ष समिति पानीपत
वर्जन
किले की जमीन का मुद्दा हाउस में जनहित को देखते हुए पास किया है। सदन में चयनित पार्षदों ने इसका समर्थन दिया था। उन्होंने इसको कार्यवाही के लिए भेज दिया था। हाईकोर्ट ने इसको अवमानना माना है और नोटिस भेजा है। वे इसका जवाब देंगे और शहरवासियों के हक की लड़ाई लड़ते रहेंगे।
भूपेंद्र सिंह, मेयर, नगर निगम
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नगर निगम को किले के मामले में 13 साल में दूसरी बार मुंह की खानी पड़ी है। इससे पहले 2001 में पास प्रस्ताव को वापस भेज दिया था। वहीं मेयर लोगों के हक के लिए लड़ने के दावे कर रहे हैं। किलावासी भी इसको लेकर एकजुट होेने की कह रहे हैं।
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गौरतलब है कि किले की करीब 54 हजार वर्ग गज जमीन में 45 हजार गज जमीन पर कब्जा है। इस 45 हजार में से 15 हजार गज पर केवल आठ लोगों और संस्थाओं का कब्जा है। समान नागरिक संहिता अभियान के संयोजक नेमचंद इसको लेकर कोर्ट में चले गए और यह मामला हाईकोर्ट में चला गया।
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हाईकोर्ट ने छह जुलाई 2012 को नगर निगम को आदेश कर किले की जमीन को कब्जा मुक्त कराने और इसकी रिपोर्ट देने की बात कही। नगर निगम के संयुक्त सचिव की कोर्ट ने इनको नोटिस जारी कर दिए और उनकी कोर्ट में सुनवाई की गई। इसी बीच नगर निगम के हाउस की दो जून को हुई बैठक में किलावासियों को राहत देते हुए मंजूर कर दिया।
इसके तहत 1996-97 के कलेक्टर रेट 310 रुपये प्रति गज के हिसाब से रजिस्ट्री करानी थी। निगम हाउस की बैठक की कार्यवाही अभी सिरे नहीं चढ़ी थी कि हाईकोर्ट ने मेयर भूपेंद्र सिंह, सीनियर डिप्टी मेयर काजल बठला, डिप्टी मेयर सीमा पाहवा, नगर निगम के संयुक्त सचिव आरएस वर्मा, ईओ सुरेंद्र समेत सभी 24 पार्षदों को अवमानना नोटिस जारी कर दिया। इसके बाद नगर निगम और किले में हंगामा खड़ा हो गया। ं
हाईकोर्ट खारिज कर चुका है वन-10 एप्लीकेशन
हाईकोर्ट इससे पहले किलावासियों की वन-10 एप्लीकेशन को खारिज कर चुका है। किलावासियों की माने तो उन्होंने हाईकोर्ट में वन-10 एप्लीकेशन लगाई थी। वन-10 में किसी मामले को लेकर दो पक्षों के बीच चल रहे विवाद में तीसरा पक्ष बीच में आ जाए। इस पक्ष के आने के बाद कोर्ट में चल रहा विवाद काफी हद तक सुलझ सकता है, लेकिन किलावासियों के पास यह रास्ता भी नहीं बचा है।
2001 में भी किया था पास
किलावासियों को राहत देने का प्रयाय 2001 में भी किया गया था। उस वक्त मुकेश टुटेजा नगर परिषद के चेयरमैन थे। सदन द्वारा प्रस्ताव पास करने के बाद किलावासियों को राहत की सांस मिली थी, लेकिन इसके बाद प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। लोगों की राहत की उम्मीद टूट गई थी।
किले की राजनीति के मायने भी हैं
किलावासियों को राहत मिलने के बजाय उल्टे सदन को नोटिस मिलना राजनीति में मायने रखता है। ऐसा माना जा रहा है कि शहरी विधानसभा को लेकर किलेवासियों की अहम भूमिका है। कांग्रेसी विधायक बलबीर पाल शाह भी उनको राहत देना चाहते थे और उनके प्रयासों से ही नगर निगम के सदन में किलेवासियों को राहत देने के मुद्दे को शामिल किया गया था।
वर्जन
किलावासी अपने आशियाना बचाने के लिए एकजुट हैं और प्रयास कर रहे हैं। उनको नगर निगम के सदन पर उम्मीद थी और उन्होंने इसको पास भी कर दिया था। आरोपकर्ता ने इसमें वकील के मार्फत नोटिस भिजवाया है। वे सब मेयर, हाउस और निगम अधिकारियों के साथ हैं।
दीपक छाबड़ा, प्रधान, किला संघर्ष समिति पानीपत
वर्जन
किले की जमीन का मुद्दा हाउस में जनहित को देखते हुए पास किया है। सदन में चयनित पार्षदों ने इसका समर्थन दिया था। उन्होंने इसको कार्यवाही के लिए भेज दिया था। हाईकोर्ट ने इसको अवमानना माना है और नोटिस भेजा है। वे इसका जवाब देंगे और शहरवासियों के हक की लड़ाई लड़ते रहेंगे।
भूपेंद्र सिंह, मेयर, नगर निगम