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बच्चों को आर्टिकल-21 में सुरक्षा तो माता-पिता काे समाज में इज्जत का अधिकार : न्यायमूर्ति

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Mon, 02 Dec 2024 02:32 AM IST
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Children have protection under Article 21 and parents have the right to respect in the society: Justice
पानीपत। घर से गए बच्चों को संविधान में सुरक्षा का अधिकार है। यह आर्टिकल 21 में दिया गया है। अधिवक्ता भी उनकी बातों को प्रमुखता से रखते हैं। इस संबंध में न्यायालय ने समय-समय पर अपनी राय दी है। अगर घर से गए बच्चों को सुरक्षा का अधिकार है तो उनको जन्म देने वाले माता-माता को भी इज्जत का अधिकार है।
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ये बात पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति संदीप मुदगिल ने कही। वे रविवार को पानीपत के आर्य पीजी कॉलेज में हरियाणा अधिवक्ता परिषद द्वारा आयोजित प्रांतीय अधिवेशन में बतौर मुख्यातिथि बोल रहे थे। अधिवेशन का विषय संविधान के 75 वर्षों की यात्रा व भारतीय न्याय व्यवस्था प्राचीन एवं नवीन रहा। अध्यक्षता इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति कृष्ण पहल ने की। विशिष्ट अतिथि महाधिवक्ता हरियाणा बलदेवराज महाजन, क्षेत्रीय संगठनमंत्री हरि बोरिकर, हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग के सदस्य मुकेश गर्ग, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सत्यप्रकाश, राष्ट्रीय मंत्री पदम कांत और केंद्रीय कार्यालय मंत्री संतोष कुमार रहे।
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न्यायमूर्ति संदीप मुदगिल ने कहा कि न्याय व्यवस्था राजा और महाराजा के समय भी थी। उस समय न्याय करते समय धर्म को ऊपर रखा जाता था। अब संविधान को ऊपर रखा जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नैतिकता को संविधान से अलग नहीं रखा जा सकता। इसी पर संविधान की संरचना की गई है। भारतीय संविधान में 448 अनुच्छेद और 25 अनुभाग हैं। यह ड्राफ्ट कमेटी ही नहीं बल्कि सभी ने मिलकर बनाया है।
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उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था किसी भी देश के लिए जरूरी है। ऐसा नहीं हुआ तो बंगलादेश जैसे हालात हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि संविधान में 18 जून 1951 को पहला बदलाव हुआ। अब तक 106 बदलाव हो चुके हैं। हर संशोधन का अपना महत्व होता है। एक न्यायाधीश और अधिवक्ता की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह आजीविका के साथ किसी जरूरतमंद को न्याय दिलाने के लिए कानून की लड़ाई लड़ें। उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल बहुत छोटा नजर आता है। इसको इतना ही समझा जाता है कि बच्चे घर से चले जाते हैं तो उनको सुरक्षा मुहैया कराना है। कुछ युवा अधिवक्ता अपनी दलील प्रमुखता के साथ रखते हैं। जबकि उनको संविधान का पूरा ज्ञान नहीं होता। इसमें प्रतिष्ठा व सम्मान भी मुख्य हैं। अगर युवा को साथ रहने का अधिकार है तो उनके माता-पिता को भी इज्जत के साथ रहने का अधिकार है।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति न्यायाधीश कृष्ण पहल ने कई कहानियों के माध्यम संविधान और वकालत को समझाया। उन्होंने एक कहानी के माध्यम से कहा कि एक अधिवक्ता को केवल अपनी मेहनत की फीस लेनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बार काउंसिल और बार एसोसिएशन का असली उद्देश्य अधिवक्ताओं के लिए कार्यशाला और कार्यक्रम आयोजन के लिए होती हैं। लेकिन यहां सबकुछ बदला हुआ है। हड़ताल से अधिक अधिवक्ताओं के वेलफेयर पर काम करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सबसे अधिक शोध भारतीय संविधान पर हुए हैं। उन्होंने कहा कि न्याय प्रक्रिया में विलंब नहीं होना चाहिए। उन्होंने इसको लेकर एक किस्सा सुनाते हुए कहा कि उनके पास एक वकील आए और बोले साहब केस को निपटा दो इस केस पर काम करते-करते बाल सफेद हो गए हैं। उन्होंने कहा कि हमको अब समरसता के साथ स्वाध्याय को भी अपनाना होगा। इस मौके पर जिला व सत्र न्यायाधीश पानीपत सुदेश कुमार शर्मा भी मौजूद रहे। मंच का संचालन अधिवक्ता परिषद हरियाणा के अध्यक्ष चंद्रपाल चौहान और अधिवक्ता परिषद पानीपत के जिलाध्यक्ष राजेश शर्मा ने सबका धन्यवाद किया।
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