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हकों के लिए संघर्ष करते रहे मजदूर, मिल प्रबंधन उधार में बांटता रहा शराब
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पानीपत। एक तरफ शुगर मिल की डिस्टलरी से निकाले गए कर्मचारी अपने हकों की लड़ाई पिछले 24 साल से लड़ते आ रहे हैं। उन्हें अब तक उनका 44 लाख रुपये का देयलाभ तक नहीं मिला है, वहीं दूसरी तरफ शुगर मिल डिस्टलरी प्रबंधन नियमों को ताक पर रखकर उधार में शराब बांटता रहा। प्रबंधन करीब 42 लाख रुपये की अवैध तरीके से उधार में शराब बेच चुका है। जिसकी रिकवरी सालों बाद तक नहीं हो पाई है। इसके लिए अब मिल प्रबंधन ने कोर्ट में केस डाल रखा है।
वहीं इस प्रकरण की जांच सालों से चल रही है। जो अब तक पूरी नहीं हो पाई है। उपायुक्त को दी गई शिकायतों में भी रिमाइंडर का दौर चलता गया। इन सालों में न तो मजदूरों को उनका हक मिल सका और न ही डिस्टलरी का बकाया पैसा वापस हो सका। इस बारे में कर्मचारी नेताओं का मानना है कि यह पूरा प्रकरण डिस्टलरी प्रबंधन की मिलीभगत के चलते हुआ है। इस प्रकार का कोई नियम ही नहीं है, जिसमें उधार के तौर पर डिस्टलरी शराब बेच सके। मिल प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारियों का भी मानना है कि इस प्रकार का कोई नियम नहीं है। इस मामले की जांच चल रही है। विभागीय कार्रवाई के रिमाइंडर चल रहे हैं। जबकि उधार वसूली के लिए मिल प्रबंधन की तरफ से बकायेदारों पर केस किया जा चुका है।
यह है मामला : डिस्टलरी कर्मचारी यूनियन के महासचिव महाबीर शर्मा ने बताया कि उनके पास 2016-17 तक के रिकार्ड हैं, जिनमें डिस्टलरी ने करीब 50 लाख रुपये की उधार में शराब बेच दी। यह खरीद फरोख्त डिस्टलरी प्रबंधन की मिलीभगत से हुई है। इसकी शिकायत उन्होंने कई बार डिस्टलरी मैनेजर, शुगर मिल प्रबंधक समेत कई अन्य अधिकारियों को भी की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो पाई। इस बारे वे कई राजनेताओं से भी मिल चुके हैं, लेकिन हर बार उनकी आवाज को दबा दिया गया।
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सालों से चल रहा खेल : महाबीर शर्मा ने बताया कि ऐसा नहीं है कि ये खेल कोई नया हो। डिस्टलरी सालों से इस गोरखधंधे को चलाए हुए है। प्रबंधन द्वारा कानून की खिलाफत की गई है। इसकी इनक्वायरी तो हुई लेकिन कागजों में ही कहीं दफन की जा चुकी है।
ऐसा प्रोविजन नहीं है कि उधार में माल बेचा जा सके। इसके लिए विभागीय कार्रवाई चलाई गई थी, जो अभी लंबित पड़ी हैं। डिस्टलरी से करीब 42 लाख रुपये का माल उधार में अटका है, बकायेदारों से पैसे निकलवाने के लिए कोर्ट में केस डाला गया है।
- संजीव शर्मा, पीए प्रबंधक, श्रम कल्याण अधिकारी।
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वहीं इस प्रकरण की जांच सालों से चल रही है। जो अब तक पूरी नहीं हो पाई है। उपायुक्त को दी गई शिकायतों में भी रिमाइंडर का दौर चलता गया। इन सालों में न तो मजदूरों को उनका हक मिल सका और न ही डिस्टलरी का बकाया पैसा वापस हो सका। इस बारे में कर्मचारी नेताओं का मानना है कि यह पूरा प्रकरण डिस्टलरी प्रबंधन की मिलीभगत के चलते हुआ है। इस प्रकार का कोई नियम ही नहीं है, जिसमें उधार के तौर पर डिस्टलरी शराब बेच सके। मिल प्रबंधन के वरिष्ठ अधिकारियों का भी मानना है कि इस प्रकार का कोई नियम नहीं है। इस मामले की जांच चल रही है। विभागीय कार्रवाई के रिमाइंडर चल रहे हैं। जबकि उधार वसूली के लिए मिल प्रबंधन की तरफ से बकायेदारों पर केस किया जा चुका है।
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यह है मामला : डिस्टलरी कर्मचारी यूनियन के महासचिव महाबीर शर्मा ने बताया कि उनके पास 2016-17 तक के रिकार्ड हैं, जिनमें डिस्टलरी ने करीब 50 लाख रुपये की उधार में शराब बेच दी। यह खरीद फरोख्त डिस्टलरी प्रबंधन की मिलीभगत से हुई है। इसकी शिकायत उन्होंने कई बार डिस्टलरी मैनेजर, शुगर मिल प्रबंधक समेत कई अन्य अधिकारियों को भी की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो पाई। इस बारे वे कई राजनेताओं से भी मिल चुके हैं, लेकिन हर बार उनकी आवाज को दबा दिया गया।
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सालों से चल रहा खेल : महाबीर शर्मा ने बताया कि ऐसा नहीं है कि ये खेल कोई नया हो। डिस्टलरी सालों से इस गोरखधंधे को चलाए हुए है। प्रबंधन द्वारा कानून की खिलाफत की गई है। इसकी इनक्वायरी तो हुई लेकिन कागजों में ही कहीं दफन की जा चुकी है।
ऐसा प्रोविजन नहीं है कि उधार में माल बेचा जा सके। इसके लिए विभागीय कार्रवाई चलाई गई थी, जो अभी लंबित पड़ी हैं। डिस्टलरी से करीब 42 लाख रुपये का माल उधार में अटका है, बकायेदारों से पैसे निकलवाने के लिए कोर्ट में केस डाला गया है।
- संजीव शर्मा, पीए प्रबंधक, श्रम कल्याण अधिकारी।