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17 साल की वर्कचार्ज सेवा जोड़े बिना विधवा की पेंशन रोकना गलत: हाईकोर्ट

Sun, 10 May 2026 01:53 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Sun, 10 May 2026 01:53 AM IST
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Withholding widow's pension without adding 17 years of work charge service is wrong: High Court
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) को बड़ा झटका देते हुए स्पष्ट किया है कि किसी कर्मचारी की लंबी वर्कचार्ज सेवा को नजरअंदाज कर उसे पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता। जब वर्कचार्ज अवधि को नियमितीकरण के लिए मान्यता दी जाती है तो उसे पेंशन निर्धारण में बाहर रखना मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 के विपरीत है।
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जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ा ने सोमा देवी की याचिका स्वीकार करते हुए पीएसपीसीएल के 25 अक्तूबर 2016 और 11 सितंबर 2017 के आदेश रद्द कर दिए। इन आदेशों के जरिये उनके दिवंगत पति पूर्ण सिंह को 10 वर्ष की योग्यता सेवा पूरी न होने का हवाला देकर पेंशन और अन्य सेवानिवृत्ति लाभ देने से इन्कार कर दिया गया था।
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हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि पूर्ण सिंह की नियुक्ति तिथि 25 मई 1987 मानी जाए और उनकी पूरी वर्कचार्ज सेवा को पेंशन योग्य सेवा में शामिल किया जाए। अदालत ने कहा कि उन्हें 1 जनवरी 2004 से पहले नियुक्त कर्मचारी मानते हुए पुरानी पेंशन योजना का लाभ दिया जाए। साथ ही अदालत ने संबंधित अधिकारियों को दो महीने के भीतर संशोधित आदेश जारी करने और तीन महीने में विधवा को पेंशन, अन्य सेवानिवृत्ति लाभ तथा याचिका दायर करने की तारीख से भुगतान तक छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित राशि जारी करने के निर्देश दिए।
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पूर्ण सिंह को 22 मई 1987 को वर्कचार्ज आधार पर नियुक्त किया गया था। करीब 17 वर्ष चार माह सेवा देने के बाद 30 सितंबर 2004 को उन्हें असिस्टेंट लाइनमैन के पद पर नियमित किया गया। इसके बाद उन्होंने 9 अक्तूबर 2010 को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। पीएसपीसीएल ने यह कहते हुए पेंशन देने से इन्कार किया था कि नियमित सेवा केवल छह वर्ष 10 माह रही और 1 जनवरी 2004 के बाद नियमित होने के कारण वे नई पेंशन योजना के दायरे में आते हैं।

हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए केसर चंद बनाम पंजाब राज्य तथा हरबंस लाल मामलों में दिए गए फैसलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि वास्तविक सेवा को केवल तकनीकी आधार पर नकार कर कर्मचारी के वैधानिक अधिकार नहीं छीने जा सकते। पूर्ण सिंह और उनके निधन के बाद उनकी पत्नी लगातार विभाग के समक्ष अपने अधिकारों के लिए प्रयासरत रहे। ऐसे में देरी का दोष याचिकाकर्ता पर नहीं डाला जा सकता।


अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि नई पेंशन योजना के तहत पहले कोई राशि दी गई हो तो विभाग उचित नोटिस देकर उसका समायोजन कर सकता है लेकिन इससे विधवा के वैधानिक पेंशन अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।
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