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हालात : गांव तूरों सुखावास का भविष्य पथरीले रास्तों और अस्पताल के गेट पर खोलता है आंखें

Thu, 07 Apr 2022 12:55 AM IST
Panchkula Bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Thu, 07 Apr 2022 12:55 AM IST
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Situation: The future of village Tooron Sukhawas opens its eyes on the rocky roads and the gate of the hospital
पंचकूला। प्रदेश की राजधानी और जिला मुख्यालय से महज 50-55 किलोमीटर दूर गांव तूरों सुखावास में स्वास्थ्य सेवाएं पथरीली और संकरे रास्तों पर दम तोड़ रही है। बीमार और तीमारदारों को रायपुररानी अस्पताल तक पहुंचने में करीब तीन से चार किलोमीटर तक पैदल चलना पड़ता है। इस सफर में सर्वाधिक परेशानी गर्भवती महिलाओं को होती है। अधिकांश महिलाओं की डिलीवरी पथरीले रास्तों पर हो जाती है। कई की एंबुलेंस तो कई की अस्पताल के गेट तक पहुंचते-पहुंचते डिलीवरी हो जाती है। यहां के लोगों का कहना है कि गांव तूरों सुखावास का भविष्य पथरीले रास्तों और अस्पताल के गेट पर आंखें खोलता है।
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अमर उजाला की टीम ने गांव का दौरा किया तो ग्रामीणों ने बताया है कि राजधानी के समीप स्वास्थ्य सेवाओं का यह हाल है तो प्रदेश के अन्य जिलों का क्या हाल होगा। हालात इस कदर दयनीय हैं कि मदद के लिए मोबाइल फोन भी नेटवर्क नहीं होने की वजह से साथ नहीं देता। अस्पताल के आधे रास्ते में मोबाइल फोन में सिग्नल आता है, तब तक हालात बिगड़ चुके होते हैं। महिलाओं की परेशानी यहीं पर समाप्त नहीं होती। गांव में आंगनबाड़ी केंद्र नहीं होने के कारण बच्चों का टीकाकरण करवाने के लिए तीन से चार किलोमीटर दूर दूसरे गांव तक पैदल ही जाती हैं। हिमाचल बार्डर से सटे पंचकूला जिले के आखिरी गांव तूरों सुखावास में दिव्यांग और बुजुर्ग भी आवागमन की वजह से परेशान हैं। इस गांव में करीब 600 लोग रहते हैं। गांव के लोग सड़क, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर हैं। उन्हें हर छोटी बड़ी रोजमर्रा की चीजों के लिए परेशान होना पड़ता है।
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केस नंबर एक
प्रसव से तड़ती महिला ने अस्पताल के गेट के बाहर बच्चे को दिया जन्म
करीब 20 दिन पहले सुबह करीब सात बजे प्रसव पीड़ा शुरू हुई। परिवार के चार सदस्य उसे पैदल लेकर ही निकल पड़े। आधे घंटे बाद करीब साढ़े सात बजे पीड़ा अचानक बढ़ गई। मैं बीच रास्ते में ही दर्द से कराहने लगी और एक पत्थर पर बैठ गई। मुझे दर्द से चिल्लाते देख पति दहशत में थे कि कहीं अस्पताल पहुंचने से पहले कोई अनहोनी न हो जाए। मैं थोड़ी देर चलती फिर पथरीले रास्तों पर लेट जाती। आधे घंटे का पैदल सफर करीब डेढ़ घंटे में पूरा किया। अपने गांव से तीन से चार किलोमीटर दूर तरली तूरों तक पहुंचने के बाद एंबुलेंस को कॉल किया गया, एंबुलेंस 15 मिनट में पहुंची। प्रसव पीढ़ा इतनी बढ़ गई कि अस्पताल के गेट पर ही बच्चे को जन्म दे दिया। अभी भी तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन बच्चे के टीकाकरण के लिए भी उसे पैदल तीन से चार किलोमीटर चलना पड़ता है, अगर गांव की सड़क शहर से कनेक्ट हो जाए और यहां आंगनबाड़ी केंद्र बन जाए, तो उसके जैसी तमाम महिलाओं को राहत मिलेगी। - आरती, गांव तूरों सुखावास
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केस नंबर दो
तीन साल पहले पथरीले रास्तों पर हुआ बच्चे का जन्म
तीन साल पहले का असहनीय दर्द जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगी। अगर गांव की दाई विमला साथ नहीं होती तो मुझे और मेरे बच्चे को बचाना मुश्किल था। दोपहर के वक्त अचानक प्रसव पीड़ा होने लगी। इसके बाद परिवार के सदस्यों ने एंबुलेंस बुलाने के लिए कॉल मिलाना शुरू किया, लेकिन नेटवर्क की समस्या के चलते फोन नहीं लगा। इसके बाद बिना देरी किए दाई और आसपास के लोगों को लेकर अस्पताल की तरफ निकल पड़े। अभी घर से आधा किलोमीटर दूर पहुंचे थे, तभी प्रसव पीड़ा इतना बढ़ गई कि मैं घबरा गई। इस दौरान दाई ने मुझे संभाला और बीच रास्ते में ही बच्चे को जन्म दे दिया। इस तरह की समस्या से गांव की हर महिला को गुजरना पड़ता है। गांव की करीब 90 फीसदी महिलाओं ने बीच रास्ते में ही बच्चे को जन्म दिया है। - अमिता, निवासी, तूरों सुखावास
केस नंबर तीन : 24 साल से दिव्यांग बैसाखी पर निर्भर
अमर उजाला की टीम गांव जाने के लिए निकली तो बीच रास्ते में तूरों सुखावास निवासी राजकुमार मिला, जो बैसाखी के सहारे पथरीले रास्तों से दूसरे गांव किसी काम से जा रहा था। उसने बताया कि उसके गांव में सड़क नहीं है, जिसके चलते वह 24 साल से बैसाखी के सहारे पथरीले रास्तों से अपना इलाज कराने शहर जाना पड़ता है। गैंगरीन की वजह से 1998 में उसका पैर काटना पड़ा था। तब से वह परेशान है। उसे महीने में दो बार अस्पताल जाना पड़ता है, अगर रास्ता बन जाता तो उसको और गांव के बुजुर्गों को राहत मिल जाती।
केस नंबर चार : हमारे गांव में भी हो आंगनबाड़ी केंद्र
10 माह की बेटी साक्षी को गोद में लेकर टीकाकरण के लिए करीब चार किलोमीटर दूर पैदल गांव उपरली तूरों जाना पड़ता है। हमारे गांव में न तो रास्ता है ना ही आंगनबाड़ी केंद्र। उपरली और निचली तूरों में आंगनबाड़ी केंद्र की सुविधा है, तो हमारे गांव में यह सुविधा क्यों नहीं है। हमारे गांव में भी आंगनबाड़ी केंद्र स्थापित की जाए। - इंद्रा देवी, तूरों सुखावास
तूरों सुखावास गांव में सड़क की सुविधा को लेकर इंजीनियरिंग विंग के अधिकारियों से जानकारी ली जाएगी। मौके की जांच के बाद अगर विभागीय स्तर पर समस्या का समाधान हुआ तो उसे प्राथमिकता के आधार पर करवाया जाएगा। - गौरव जैन, एक्सईएन पीडब्ल्यूडी पंचकूला।

गांव में रास्ता और आंगनबाड़ी केंद्र नहीं है तो यह बड़ी समस्या है। ग्रामीण प्रशासन के समक्ष अपनी समस्याएं रखेंगे तो उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा। - महावीर कौशिक, उपायुक्त, पंचकूला
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