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अपने अधिकार के लिए पूरी ताकत के लड़ेगा पंजाब - सुखबीर
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शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) के सदस्यों की नियुक्ति के लिए मानदंडों को बदलने के केंद्र के फैसले को ‘पंजाब के लिए एक ऐसा निर्णय बताया, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।’ शनिवार दोपहर प्रेस बयान में सुखबीर बादल ने कहा कि इस मामले की सच्चाई यह है कि सतलुज-ब्यास के हेड वर्क्स का नियंत्रण विशेष रूप से एक रिपेरियन राज्य के रूप में पंजाब के अंतर्गत आता है।
लेकिन पहले केंद्र ने असंवैधानिक रूप से उस नियंत्रण को हमसे छीन लिया और अब वे पंजाब को पूरी तरह से बीबीएमबी से बाहर कर रहे हैं। यह हमारे खिलाफ अन्याय की चरमसीमा है। यह संघीय सिद्धांत के उल्लंघन का उदाहरण है, जिसे केंद्र में सरकारों द्वारा बार-बार किया गया है। हम अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी ताकत के साथ लड़ेंगें। शिअद अध्यक्ष ने राज्य के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने में सभी राजनीतिक दलों सहित हर पंजाबी से साथ आने की अपील की।
उन्होंने कहा कि यह फैसला पंजाबियों और विशेष रूप से सिखों के खिलाफ राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक भेदभाव की लंबी और दर्दनाक श्रंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है। हर पंजाबी की तरह मैं भी इस निर्णय से बेहद हैरान हुआ हूं। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की थी कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत रिपेरियन सिद्धांत पर नदी के पानी के सवाल का समाधान किया जाए, लेकिन केंद्र जो कर रहा है, वह रिपेरियन राज्य पंजाब के खिलाफ शोषण को जारी रखना है, ताकि गैर-रिपेरियन हरियाणा और राजस्थान का पक्ष लिया जा सके।
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केंद्र को नदी जल के मुद्दों पर फैसले का हक नहीं
सुखबीर बादल ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 78 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस मामले में कोई समझौता नहीं किया जाएगा और अकाली इसके लिए डटकर खड़ा रहा है। केंद्र को नदी जल मुददों पर निर्णय लेने का कोई अधिकार नही है। उन्होंने केंद्र को चेतावनी दी कि उनकी पार्टी इस भेदभाव को मूकदर्शक बनकर नहीं देखेगी। सुखबीर बादल ने कहा ‘गुरु साहिबान, संतों और ऋषियों की धरती पर एक भयावह संकट मंडरा रहा है। हम पंजाब को रेगिस्तान में बदलने से बचाने के लिए इस खतरे से लड़ेंगे, ताकि हमारे बच्चों को भुखमरी का सामना न करना पड़े या जिंदा रहने के लिए अपने घरों को छोड़कर कहीं और न जाना पड़े।
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लेकिन पहले केंद्र ने असंवैधानिक रूप से उस नियंत्रण को हमसे छीन लिया और अब वे पंजाब को पूरी तरह से बीबीएमबी से बाहर कर रहे हैं। यह हमारे खिलाफ अन्याय की चरमसीमा है। यह संघीय सिद्धांत के उल्लंघन का उदाहरण है, जिसे केंद्र में सरकारों द्वारा बार-बार किया गया है। हम अपने अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी ताकत के साथ लड़ेंगें। शिअद अध्यक्ष ने राज्य के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने में सभी राजनीतिक दलों सहित हर पंजाबी से साथ आने की अपील की।
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उन्होंने कहा कि यह फैसला पंजाबियों और विशेष रूप से सिखों के खिलाफ राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक भेदभाव की लंबी और दर्दनाक श्रंखला में एक और कड़ी के रूप में जुड़ गया है। हर पंजाबी की तरह मैं भी इस निर्णय से बेहद हैरान हुआ हूं। उन्होंने कहा कि जरूरत इस बात की थी कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत रिपेरियन सिद्धांत पर नदी के पानी के सवाल का समाधान किया जाए, लेकिन केंद्र जो कर रहा है, वह रिपेरियन राज्य पंजाब के खिलाफ शोषण को जारी रखना है, ताकि गैर-रिपेरियन हरियाणा और राजस्थान का पक्ष लिया जा सके।
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केंद्र को नदी जल के मुद्दों पर फैसले का हक नहीं
सुखबीर बादल ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने पंजाब पुनर्गठन अधिनियम 1966 की धारा 78 को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। इस मामले में कोई समझौता नहीं किया जाएगा और अकाली इसके लिए डटकर खड़ा रहा है। केंद्र को नदी जल मुददों पर निर्णय लेने का कोई अधिकार नही है। उन्होंने केंद्र को चेतावनी दी कि उनकी पार्टी इस भेदभाव को मूकदर्शक बनकर नहीं देखेगी। सुखबीर बादल ने कहा ‘गुरु साहिबान, संतों और ऋषियों की धरती पर एक भयावह संकट मंडरा रहा है। हम पंजाब को रेगिस्तान में बदलने से बचाने के लिए इस खतरे से लड़ेंगे, ताकि हमारे बच्चों को भुखमरी का सामना न करना पड़े या जिंदा रहने के लिए अपने घरों को छोड़कर कहीं और न जाना पड़े।