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Panchkula News: केवल आशंका के आधार पर नहीं किया जा सकता कैदी को पैरोल से इन्कार
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व्यक्ति के नशे की बिक्री में शामिल होने या शांति भंग करने की जताई गई थी आशंका
याचिकाकर्ता को आठ सप्ताह की पैरोल पर छोड़ने का हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को दिया आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पैरोल से जुड़े एक मामले में यह स्पष्ट कर दिया कि आवेदन को केवल इस आशंका पर खारिज नहीं कर सकते कि आरोपी नशे की बिक्री में शामिल हो सकता है या शांति भंग कर सकता है।
आठ सप्ताह की पैरोल पर रिहाई के लिए मुक्तसर निवासी अवधेश कुमार ने पंजाब सरकार को आवेदन किया था। इसके बाद सरकार ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि पैरोल पर रिहा होने पर वह नशीले पदार्थ बेचने की गतिविधियों में शामिल हो सकता है, जिससे शांति भंग होने की आशंका के अलावा युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
याचिकाकर्ता को 2019 में एनडीपीएस अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था और 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। 2021 में याचिकाकर्ता ने अपने परिवार के सदस्यों से मिलने और अपने घरेलू मामलों के चलते आठ सप्ताह की पैरोल के लिए आवेदन किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करने का एकमात्र आधार यह था कि अगर उसे पैरोल पर रिहा किया जाता है तो वह ड्रग्स बेचने की गतिविधियों में शामिल हो सकता है जो युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव डाल सकता है और शांति भंग होने की भी आशंका है।
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इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक दोषी को पैरोल पर रिहा होने का निर्बाध अधिकार नहीं है लेकिन यह केवल शर्तों को पूरा करने की स्थिति में ही है। अस्थायी रिहाई के लिए याचिकाकर्ता के दावे को
अधिनियम की धारा 6 (2) के तहत गिनाए गए दो आधार में से किसी एक पर खारिज किया जा सकता था। सक्षम प्राधिकारी द्वारा दर्ज की गई संतुष्टि पर कि दोषी की रिहाई से राज्य की सुरक्षा के खतरे की संभावना है। अदालत ने कहा कि जिस आधार पर याचिकाकर्ता का आवेदन खारिज किया गया वह अस्थिर है और केवल अनुमानों और धारणाओं पर आधारित है। उक्त संतुष्टि पर पहुंचने के लिए कोई सामग्री न होने पर, हमारा मानना है कि विवादित आदेश कानूनी रूप से अस्थिर है और इसे रद्द किया जा सकता है। ऐसे में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को आठ सप्ताह की पैरोल की रियायत का हकदार माना है।
हाईकोर्ट ने पैरोल को अस्वीकृत करने के आदेश को रद्द कर दिया और सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को आठ सप्ताह के लिए पैरोल पर रिहाई के लिए दो सप्ताह के भीतर आवश्यक आदेश पारित करें। पैरोल की अवधि के दौरान याची शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखें और अवधि समाप्त होने के बाद जेल में आत्मसमर्पण करें।
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याचिकाकर्ता को आठ सप्ताह की पैरोल पर छोड़ने का हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को दिया आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पैरोल से जुड़े एक मामले में यह स्पष्ट कर दिया कि आवेदन को केवल इस आशंका पर खारिज नहीं कर सकते कि आरोपी नशे की बिक्री में शामिल हो सकता है या शांति भंग कर सकता है।
आठ सप्ताह की पैरोल पर रिहाई के लिए मुक्तसर निवासी अवधेश कुमार ने पंजाब सरकार को आवेदन किया था। इसके बाद सरकार ने इसे यह कहते हुए खारिज कर दिया गया कि पैरोल पर रिहा होने पर वह नशीले पदार्थ बेचने की गतिविधियों में शामिल हो सकता है, जिससे शांति भंग होने की आशंका के अलावा युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।
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याचिकाकर्ता को 2019 में एनडीपीएस अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था और 14 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। 2021 में याचिकाकर्ता ने अपने परिवार के सदस्यों से मिलने और अपने घरेलू मामलों के चलते आठ सप्ताह की पैरोल के लिए आवेदन किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता के दावे को खारिज करने का एकमात्र आधार यह था कि अगर उसे पैरोल पर रिहा किया जाता है तो वह ड्रग्स बेचने की गतिविधियों में शामिल हो सकता है जो युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव डाल सकता है और शांति भंग होने की भी आशंका है।
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इसमें कोई संदेह नहीं है कि एक दोषी को पैरोल पर रिहा होने का निर्बाध अधिकार नहीं है लेकिन यह केवल शर्तों को पूरा करने की स्थिति में ही है। अस्थायी रिहाई के लिए याचिकाकर्ता के दावे को
अधिनियम की धारा 6 (2) के तहत गिनाए गए दो आधार में से किसी एक पर खारिज किया जा सकता था। सक्षम प्राधिकारी द्वारा दर्ज की गई संतुष्टि पर कि दोषी की रिहाई से राज्य की सुरक्षा के खतरे की संभावना है। अदालत ने कहा कि जिस आधार पर याचिकाकर्ता का आवेदन खारिज किया गया वह अस्थिर है और केवल अनुमानों और धारणाओं पर आधारित है। उक्त संतुष्टि पर पहुंचने के लिए कोई सामग्री न होने पर, हमारा मानना है कि विवादित आदेश कानूनी रूप से अस्थिर है और इसे रद्द किया जा सकता है। ऐसे में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को आठ सप्ताह की पैरोल की रियायत का हकदार माना है।
हाईकोर्ट ने पैरोल को अस्वीकृत करने के आदेश को रद्द कर दिया और सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को आठ सप्ताह के लिए पैरोल पर रिहाई के लिए दो सप्ताह के भीतर आवश्यक आदेश पारित करें। पैरोल की अवधि के दौरान याची शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखें और अवधि समाप्त होने के बाद जेल में आत्मसमर्पण करें।