बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़: पंचकूला में मेटाबॉलिक डिसआर्डर स्क्रीनिंग बंद, डॉक्टर अनजान
नवंबर और दिसंबर 2014 में करीब 400 बच्चों के ब्लड सैंपल जीएमसीएच स्क्रीनिंग के लिए भेजे थे, जिनमें चार की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। दरअसल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन हरियाणा की तरफ से जनरल अस्पताल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत मेटाबॉलिक डिसआर्डर टेस्ट की शुरुआत की गई थी।
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नवजात बच्चों को छह प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिए मेटाबॉलिक डिसआर्डर स्क्रीनिंग सेक्टर-6 नागरिक अस्पताल में बंद हो गई है। जन्म के समय ही बच्चों में गंभीर बीमारियों का पता लगाने लिए होने वाले टेस्ट अचानक क्यों बंद हो गए, यह रहस्य बना हुआ है। नागरिक अस्पताल के शिशु विशेषज्ञ डॉ. रोहित का कहना है कि 2014 के दौरान बच्चों के सैंपल लेकर जीएमसीएच भेजा जाता था, बाद में यह सिलसिला बंद हो गया।
यह मामला एनएचएम से जुड़ा है। एनएचएम के एमडी डॉ. प्रभजोत सिंह का कहना है कि यह मामला उनकी जानकारी में नहीं है। विभागों की इस निष्क्रियता से नवजात बच्चों में होने वाली गंभीर बीमारियों का समय रहते पता नहीं चल पा रहा है। इस मामले में लोगों का कहना है कि नागरिक अस्पताल में यह टेस्ट अचानक क्यों बंद हो गए, यह जांच का विषय है।
यहां आने वाले ज्यादातर अभिभावक जागरुक नहीं होते हैं। यहां 60 फीसदी से ज्यादा गरीब महिलाओं की डिलीवरी होती है। इनमें कई ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े परिवार ऐसे होते हैं, जिन्हें मेटाबॉलिक डिसआर्डर स्क्रीनिंग की जानकारी भी नहीं होती, ताकि वे जीएमसीएच और पीजीआई में अपने बच्चों की स्क्रीनिंग करा सकें। बता दें कि यदि नवजात शिशुओं की जन्म के पश्चात मेटाबॉलिक डिसआर्डर जानने के लिए तुरंत मेडिकल स्क्रीनिंग कर ली जाए, तो कई गंभीर बीमारियों का इलाज संभव है। इन बीमारियों में जन्म के समय हृदय रोग, कैंसर, बहरापन, किडनी संबंधी बीमारियां भी संभव हैं।
2014 में 400 का कराया स्क्रीनिंग, चार की रिपोर्ट पॉजिटिव
जन्म के बाद बच्चों में होने वाली बीमारियों की जांच के लिए सेक्टर-6 के जनरल अस्पताल में मेडिकल स्क्रीनिंग शुरू की गई थी। इसके तहत जन्म के 24 से 48 घंटे के भीतर बच्चों का ब्लड सैंपल लेकर स्क्रीनिंग टेस्ट के लिए जीएमसीएच भेजा जाता था। पहले चरण में तीन तरह के टेस्टों के लिए सैंपल भेजे गए थे। बाद में छह तरह के मेटाबॉलिक डिसआर्डर स्क्रीनिंग की योजना थी।
नवंबर और दिसंबर 2014 में करीब 400 बच्चों के ब्लड सैंपल जीएमसीएच स्क्रीनिंग के लिए भेजे थे, जिनमें चार की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। दरअसल, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन हरियाणा की तरफ से जनरल अस्पताल में पायलट प्रोजेक्ट के तहत मेटाबॉलिक डिसआर्डर टेस्ट की शुरुआत की गई थी। इसके सफल होने के बाद एक माह के अंदर कालका और रायपुररानी के सीएचसी में भी यह सुविधा मुहैया कराई जानी थी। ताकि ज्यादा बच्चों को इसका लाभ मिल सके।
छह तरह के मेटाबॉलिक डिसआर्डर की स्क्रीनिंग
- कंजेनाइटल हाइपोथाइरिज्म
- कंजेनाइटल एडरनल हाइपोथाइरिज्म
- जी सिक्स पीडी
- पीकेयू
- गॉल्ट
- बायोटेंडेज
एड़ी से लिए जाते हैं ब्लड सैंपल
बच्चे के जन्म के 24 से 48 घंटे के भीतर एड़ी से ब्लड का एक बूंद फिल्टर पेपर पर लिया जाता है। उसे सुखाने के बाद सैंपल को जीएमसीएच भेजा जाता था।
कंजेनाइटल हाइपोथाइरिज्म
इस बीमारी से पीड़ित बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास संभव नहीं है। इसमें पीलिया की भी शिकायत आती है। बच्चों के जन्म के समय ही बीमारी को डायग्नोज कर लिया जाए तो उपचार से बच्चा नार्मल हो सकता है। अगर सही समय पर पता नहीं चला तो बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हो सकता है।
जी सिक्स पीडी
शरीर में बहुत सारे एंजाइम होते हैं, जो हार्मोनल और एंजाइमेटिक को कंट्रोल करती है। शरीर में इस एंजाइम की कमी होने पर कुछ खाद्य पदार्थ और दवाएं मरीज को नहीं दी जाती है। अगर इस बीमारी के बारे में जन्म के एक सप्ताह के अंदर पता नहीं लग पाया तो बच्चे की जान भी जा सकती है और आगे बच्चा सेक्सुअल एबनार्मल भी हो सकता है।
कंजेनाइटल एडरनल हाइपोथाइरिज्म
इस बीमारी से पीड़ित बच्चों का भी शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है।