फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chandigarh ›   Panchkula News ›   Online gaming addiction turning into mental and social crisis

ऑनलाइन गेम्स की लत: पढ़ाई छूटी, कारोबार डूबा... मानसिक और सामाजिक संकट का रूप ले रहा एडिक्शन

Thu, 05 Feb 2026 11:22 AM IST
निवेदिता वर्मा दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला
दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला Published by: निवेदिता वर्मा Updated Thu, 05 Feb 2026 11:22 AM IST
सार

ऑनलाइन गेम्स की लत 13 साल के बच्चों से लेकर 20-25 साल के युवाओं तक तेजी से फैल रही है। रात भर जागकर गेम खेलना, पढ़ाई और काम से दूरी, चिड़चिड़ापन, गुस्सा और आत्मघाती विचार इसके प्रमुख लक्षण बनते जा रहे हैं।

विज्ञापन
Online gaming addiction turning into mental and social crisis
ऑनलाइन गेम - फोटो : अमर उजाला डिजिटल

विस्तार

मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स की लत अब सिर्फ समय की बर्बादी नहीं बल्कि परिवारों के लिए गंभीर मानसिक और सामाजिक संकट बनती जा रही है। 

विज्ञापन


पंचकूला सेक्टर-6 के सिविल अस्पताल के मनोरोग विभाग में सामने आ रहे मामलों ने हालात की गंभीरता उजागर कर दी है। डॉक्टरों के मुताबिक रोजाना औसतन तीन से चार मरीज गेमिंग एडिक्शन की समस्या लेकर इलाज के लिए पहुंच रहे हैं जबकि हर महीने आत्महत्या के प्रयास से जुड़े कई मामले भी इसी लत से जुड़े पाए जा रहे हैं।
विज्ञापन


मनोरोग चिकित्सक डॉ. एमपी शर्मा ने कहा कि ऑनलाइन गेम्स की लत से जूझ रहे बच्चों को डांटें नहीं, उनकी बात धैर्य से सुनें। जिस गेम से बच्चा जुड़ा है, उसके सकारात्मक और सुरक्षित विकल्प तलाशें ताकि उसका ध्यान धीरे-धीरे भटके और वह मानसिक रूप से सुरक्षित रह सके। 
विज्ञापन
विज्ञापन


वहीं, मोहाली सिविल अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. गुरमुख सिंह ने कहा कि बच्चों में मोबाइल और गेम्स पर बढ़ती निर्भरता चिंता का विषय है। अभिभावकों को बच्चों के व्यवहार में होने वाले छोटे बदलावों पर नजर रखनी चाहिए। समय पर संवाद, वैकल्पिक गतिविधियां और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लेकर इस लत को गंभीर बनने से रोका जा सकता है।

केस 1- ऑस्ट्रेलिया छोड़ भारत लौट आया परिवार
13 वर्षीय एक बच्चे को रोब्लॉक्स गेम की लत लग गई। पूरी रात जागकर गेम खेलने लगा। मना करने पर आत्महत्या की धमकी देने लगा। बच्चे की हालत से घबराकर परिवार ने ऑस्ट्रेलिया छोड़ पंचकूला लौटने का फैसला किया ताकि उसे नियंत्रित माहौल मिल सके। बावजूद इसके हालात नहीं सुधरे। बच्चा स्कूल जाना बंद कर चुका था और वीकेंड पर पूरी रात गेम खेलता रहा। अंततः उसे सिविल अस्पताल के मनोरोग विभाग में इलाज के लिए लाया गया, जहां अब काउंसलिंग और उपचार चल रहा है।

केस 2-इंजीनियरिंग की पढ़ाई छूट गई
19 वर्षीय युवक चंडीगढ़ के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहा था। कॉलेज जाने के बहाने वह पार्कों में बैठकर ऑनलाइन गेम खेलता रहा। सेमेस्टर के खराब नतीजों के बाद सच्चाई सामने आई। परिवार के विरोध पर युवक ने आत्महत्या का प्रयास किया। फिलहाल उसका इलाज चल रहा है।

केस-3- कारोबार बंद, परिवार से रिश्ते खराब
23 वर्षीय युवक ने परिवार के सहारे के लिए करियाना दुकान खोली थी लेकिन ऑनलाइन गेम्स की लत के कारण दुकान पर ध्यान देना छोड़ दिया। घाटा बढ़ा और दुकान बंद करनी पड़ी। गुस्सा और झगड़े बढ़ने लगे। पड़ोसियों की सलाह पर उसे इलाज के लिए सिविल अस्पताल लाया गया जहां पिछले छह माह से इलाज चल रहा है।

बच्चे चुप हैं… खतरा भीतर ही भीतर बढ़ रहा है

गाजियाबाद में एक ही परिवार की तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या महज एक खबर नहीं बल्कि हर उस परिवार के लिए चेतावनी है जहां बच्चे चुप हैं और बड़ों को लगता है कि सब कुछ सामान्य है।

पीजीआई के मनोचिकित्सा विभाग की चाइल्ड साइकेट्रिस्ट डॉ. निधि चौहान ने कहा कि आज बच्चों की समस्याएं केवल पढ़ाई या करिअर तक सीमित नहीं रहीं। मोबाइल में उलझे बच्चे बाहर से व्यस्त दिखते हैं, लेकिन भीतर से अकेलेपन और दबाव से जूझ रहे होते हैं।

डॉ. निधि ने बताया कि मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों को परिवार से दूर कर रहा है। ऑनलाइन दुनिया में बेहतर दिखने का दबाव, लगातार तुलना और नकारात्मक कंटेंट बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर करता है। कई बार बच्चे ऐसा कंटेंट देख लेते हैं जो उनकी उम्र और मानसिक स्थिति के लिए नुकसानदेह होता है लेकिन परिवार को इसका अंदाजा तक नहीं लग पाता। बदलती सामाजिक संरचना भी चिंता बढ़ा रही है। संयुक्त परिवारों के टूटने से वह भावनात्मक सहारा खत्म हो रहा है, जहां बच्चे बिना झिझक अपनी बात कह पाते थे। 

न्यूक्लियर फैमिली में बच्चा अक्सर खुद को अकेला महसूस करता है। वर्किंग माता-पिता की मजबूरी भी दूरी बढ़ाती है। समय की कमी में बच्चों की चुप्पी को सामान्य समझ लिया जाता है। किशोरावस्था में दोस्तों और संगत का असर गहरा होता है। गलत संगत या आत्मघाती सोच से जुड़ा कंटेंट बच्चों को गलत दिशा में ले जा सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों और रिहायशी सोसायटियों में काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य पर खुली बातचीत से ही ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। समय रहते संवाद कई जिंदगियां बचा सकता है।

बच्चों को ऐसे दें स्मार्ट प्रोटेक्शन 

  • हर दिन बच्चे से सिर्फ यह पूछा जाए-आज क्या अच्छा लगा और क्या परेशान कर गया। सलाह नहीं, पहले सिर्फ सुनना जरूरी है। 
  • मोबाइल छीनने के बजाय बच्चों के साथ बैठकर कंटेंट देखें और समझाएं। हफ्ते में एक दिन नो-स्क्रीन फैमिली टाइम तय करें।
  • परिवार या स्कूल में कोई ऐसा बड़ा व्यक्ति हो जिससे बच्चा बिना डर अपनी बात कह सके।
  • अंकों और रैंक से ज्यादा बच्चे की मेहनत और ईमानदार प्रयास को सराहें।
  • दोस्ती पर संवेदनशील नजर रखें, अचानक चिड़चिड़ापन, अकेलापन, डर या पैसे की मांग-गलत संगत के संकेत हो सकते हैं।
  • बच्चों को यह बताएं कि गुस्सा, डर, उदासी या शर्म क्या होती है ताकि वे महसूस करने के बजाय बोल सकें।
  • बच्चे को सिखाएं कि मन बहुत भारी लगे तो किसे फोन करना है, कहां जाना है और कैसे मदद मांगनी है।
  • टीचर, कोच और सोसाइटी स्टाफ को बच्चों के व्यवहार में बदलाव पहचानने के लिए जागरूक किया जाए।
  • सब ठीक हो जाएगा कहने से बचें। पहले बच्चे की परेशानी को समझें और स्वीकारें, फिर समाधान की बात करें।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed