Kargil vijay diwas: 21 साल बाद भी घोषणाएं अधूरी, शहीद की फोटो लेकर चक्कर काटने को मजबूर पिता
कारगिल युद्ध में 21 साल पहले मां भारती के सपूत ने मात्र 25 वर्ष की उम्र में देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी थी। तब एचएमटी पिंजौर निवासी फ्लाइंग ऑफिसर गुरसिमरत सिंह ढींढसा की शहादत पर प्रशासन ने आनन-फानन में कई घोषणाएं की थीं। इनमें पिंजौर के सरकारी स्कूल का नाम बदलकर फ्लाइंग ऑफिसर गुरसिमरत सिंह ढींढसा करना भी शामिल था।
सरकार और प्रशासन द्वारा शहीद के सम्मान में की गई घोषणा 21 साल बाद भी आधी-अधूरी है। दुख इस बात का है कि शहीद के पिता सरकार और प्रशासन के इस अधूरे काम को पूरा करने के लिए शहीद की फोटो लेकर कई बार सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगा चुके हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई है।
ऐसे में लोगों का कहना है कि क्या वतन पर मरने वालों का यही निशां रहेगा? स्कूल के मेन गेट पर तो शहीद का नाम लिख दिया गया है लेकिन शहादत के 21 साल बाद भी स्कूल के कागजों में शहीद का नाम नहीं चढ़ सका है। इसी तरह क्षेत्र में जिस सड़क का नाम शहीद के नाम पर लिखा गया है, उसकी हालत भी दयनीय है।
अमर उजाला की टीम ने जब इस अनदेखी से आहत परिजनों का दर्द समझने की कोशिश की तो लाचार पिता के आंखों में केवल आंसू थे। वर्तमान में शहीद गुरसिमरत सिंह ढींढसा के पिता सरदार गुरबख्श सिंह ढींढसा मोहाली में रहते हैं। उन्होंने बताया कि बेटे की शहादत के बाद सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल का नाम बदलकर फ्लाइंग ऑफिसर गुरसिमरत सिंह ढींढसा करने का फैसला लिया।
यह बदलाव सिर्फ स्कूल के बाहरी बोर्ड तक ही सीमित रहा। स्कूल के रिकॉर्ड में 21 साल बाद भी सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल ही चल रहा है। भरी आंखों से पिता बोले, मैं कई साल तक शहीद बेटे की तस्वीर लेकर स्कूल और प्रशासन के पास चक्कर लगाता रहा हूं लेकिन कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला।
अमर उजाला की टीम जब स्कूल पहुंची तो ड्यूटी पर मौजूद स्टाफ से पता चला कि करीब चार साल पहले एक फ्लैक्स बोर्ड पर शहीद की तस्वीर चस्पा कर प्रांगण में लगाई है। लेकिन स्कूल का तमाम रिकॉर्ड अभी भी पुराने नाम से ही मुद्रित हो रहे हैं। मौजूदा प्रिंसिपल से जब फोन पर बात की गई तो जवाब मिला कि प्रशासन को लिखा गया है लेकिन जब पूछा गया कि क्या लिखकर भेजा गया है तो बताने में असमर्थता जताई। प्रशासन के इस रवैये से शहीद के परिजनों में रोष है। एचएमटी परिसर में प्रवेश सड़क का नाम भी फ्लाइंग ऑफिसर शहीद गुरसिमरत के नाम पर है लेकिन उस सड़क को चिह्नित करने वाले साइन बोर्ड की हालत भी दयनीय है।