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Panchkula News: शिअद व संयुक्त अकाली दल में गठजोड़ के आसार बढ़े, ढींडसा बन सकते हैं कार्यकारी अध्यक्ष
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चंडीगढ़। पंजाब में बादल परिवार के प्रभाव वाले शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और वरिष्ठ टकसाली नेता सुखदेव सिंह ढींडसा के संयुक्त अकाली दल में फिर गठजोड़ हो सकता है। दोनों पक्षों के बीच सुलह की जो कोशिशें शुरू हुई हैं, उससे माना जा रहा है कि सुखबीर बादल के नेतृत्व वाले शिअद में ढींडसा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है। इस कदम से जहां शिअद के भाजपा के साथ फिर से गठबंधन की संभावनाएं बढ़ेंगी, वहीं दिवंगत प्रकाश सिंह बादल के बाद पार्टी में पहला अवसर आएगा, जब पुराने टकसालियों को तरजीह मिलेगी और बादल परिवार का एकछत्र वर्चस्व कम होगा।
सुखबीर बादल की ओर से हाल ही में पिछली गलतियों के लिए श्री अकाल तख्त पर माफी मांगे जाने के बाद उनके पक्ष में पहली प्रतिक्रिया सुखदेव सिंह ढींडसा की ही रही। अब ढींडसा ने शिअद (बादल) के साथ विलय पर चर्चा के लिए 23 दिसंबर को अपनी पार्टी की बैठक बुला ली है। गौरतलब है कि सुखदेव ढींडसा के बादल परिवार से प्रगाढ़ निजी व सियासी संबंध रहे हैं। उन्होंने अपनी अनदेखी और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर सुखबीर बादल को सर्वेसर्वा बनाए जाने के विरोध में शिअद से किनारा कर लिया था। इस मामले में ढींडसा ने प्रकाश सिंह बादल को पत्र लिखकर पार्टी में विभाजन रोकने के लिए सुखबीर बादल के अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग की थी, लेकिन बादल ने अपने बेटे का ही साथ दिया था। केवल सुखदेव ढींडसा ही नहीं, सुखबीर बादल को अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग अन्य सीनियर टकसाली नेता- प्रेम सिंह चंदूमाजरा, सिकंदर सिंह मलूका और मनप्रीत सिंह अयाली, रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, सेवा सिंह सेखवां, बीबी जागीर कौर ने भी उठाई थी। इनमें से कई नेता इसी मुद्दे पर शिअद से अलग हो चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी हैं ढींडसा
माना जा रहा है कि मौजूदा हालात में सुखबीर बादल के लिए सुखदेव सिंह ढींडसा जैसे व्यक्तित्व को निर्णायक भूमिका निभाने वाले के रूप में स्वीकार करना मजबूरी बन चुका है, क्योंकि बेअदबी, परिवारवाद, निजी व्यावसायिक हितों के लिए सत्ता का इस्तेमाल, बरगाड़ी-कोटकपूरा फायरिंग केस और डेरामुखी की माफी जैसे मुद्दों ने सिख समुदाय को शिअद के खिलाफ कर दिया है। ढींडसा के शिअद में लौटने और निर्णायक भूमिका निभाने से शिअद को भाजपा से गठबंधन का फिर से मौका मिल सकता है, जिसे किसान आंदोलन के चलते तोड़ना पड़ा था। ढींडसा का संयुक्त अकाली दल इस समय भाजपा के साथ है और ढींडसा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। अकाली दल की तरह भाजपा को भी यह पता है कि दोनों दल अकेले चुनाव लड़कर पंजाब में सरकार नहीं बना सकते। फिलहाल सुखबीर बादल अपने स्तर पर भाजपा से नजदीकी बढ़ाने का प्रयास करते रहे हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका है।
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सुखबीर बादल की ओर से हाल ही में पिछली गलतियों के लिए श्री अकाल तख्त पर माफी मांगे जाने के बाद उनके पक्ष में पहली प्रतिक्रिया सुखदेव सिंह ढींडसा की ही रही। अब ढींडसा ने शिअद (बादल) के साथ विलय पर चर्चा के लिए 23 दिसंबर को अपनी पार्टी की बैठक बुला ली है। गौरतलब है कि सुखदेव ढींडसा के बादल परिवार से प्रगाढ़ निजी व सियासी संबंध रहे हैं। उन्होंने अपनी अनदेखी और वरिष्ठता को नजरअंदाज कर सुखबीर बादल को सर्वेसर्वा बनाए जाने के विरोध में शिअद से किनारा कर लिया था। इस मामले में ढींडसा ने प्रकाश सिंह बादल को पत्र लिखकर पार्टी में विभाजन रोकने के लिए सुखबीर बादल के अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग की थी, लेकिन बादल ने अपने बेटे का ही साथ दिया था। केवल सुखदेव ढींडसा ही नहीं, सुखबीर बादल को अध्यक्ष पद से इस्तीफे की मांग अन्य सीनियर टकसाली नेता- प्रेम सिंह चंदूमाजरा, सिकंदर सिंह मलूका और मनप्रीत सिंह अयाली, रणजीत सिंह ब्रह्मपुरा, सेवा सिंह सेखवां, बीबी जागीर कौर ने भी उठाई थी। इनमें से कई नेता इसी मुद्दे पर शिअद से अलग हो चुके हैं।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी हैं ढींडसा
माना जा रहा है कि मौजूदा हालात में सुखबीर बादल के लिए सुखदेव सिंह ढींडसा जैसे व्यक्तित्व को निर्णायक भूमिका निभाने वाले के रूप में स्वीकार करना मजबूरी बन चुका है, क्योंकि बेअदबी, परिवारवाद, निजी व्यावसायिक हितों के लिए सत्ता का इस्तेमाल, बरगाड़ी-कोटकपूरा फायरिंग केस और डेरामुखी की माफी जैसे मुद्दों ने सिख समुदाय को शिअद के खिलाफ कर दिया है। ढींडसा के शिअद में लौटने और निर्णायक भूमिका निभाने से शिअद को भाजपा से गठबंधन का फिर से मौका मिल सकता है, जिसे किसान आंदोलन के चलते तोड़ना पड़ा था। ढींडसा का संयुक्त अकाली दल इस समय भाजपा के साथ है और ढींडसा को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का करीबी माना जाता है। अकाली दल की तरह भाजपा को भी यह पता है कि दोनों दल अकेले चुनाव लड़कर पंजाब में सरकार नहीं बना सकते। फिलहाल सुखबीर बादल अपने स्तर पर भाजपा से नजदीकी बढ़ाने का प्रयास करते रहे हैं, लेकिन उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका है।
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