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पाबंदी के बावजूद काटे जा रहे खैर के पेड़
Panchkula
Updated Tue, 26 Feb 2013 05:30 AM IST
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मोरनी। पिंजौर वन रेंज के थापली इलाके में पाबंदी के बावजूद वन विभाग परमिट जारी कर धड़ल्ले से हरे खैर के पेड़ कटवाने में जुटा है। वहीं, प्रदेश सरकार ने बीते माह भूस्खलन रोकने के उद्देश्य से कुछ तहसीलों के अंदर हरे पेड़ों के कटान पर पूर्णत: पाबंदी लगा दी थी, जिसमें पंचकूला और कालका तहसील भी शामिल है। स्थानीय लोगों और पर्यावरण प्रेमियों का आरोप है कि परमिट की आड़ में बडे़ पैमाने पर हरे खैर के पेड़ काटे जा रहे हैं। दुखद है कि खैर काटने वाले जंगलों और नौतोड़ से पेड़ काट कर हरियाली का सफाया करने में जुटे हैं। दूसरी ओर, वन विभाग कटान को जायज बताकर हरियाली को बचाने में कोई रुचि नहीं ले रहा है। चौंकाने वाली बात यह है कि यहां पर एक जगह तो खैर कटान ऐसी जमीनों से हो रहा है, जिसके संबंध में अदालत में मामला चल रहा है।
स्थानीय निवासी बलदेव का कहना है कि उनके यहां पर ऐसी जमीन से वन विभाग ने पेड़ों को काटने की अनुमति जारी कर दी, जहां की निशानदेही तक नहीं हुई कि वह जमीन किसकी है। इस जमीन के साथ लगती प्रदेश सरकार की जमीनों से बडे़ पैमाने पर खैर का कटान हुआ है। उन्होंने मांग की कि इसकी जांच करवाई जाए। एक अन्य युवक का आरोप है कि वन विभाग ने विवादित जगह की चुपचाप निशानदेही करवा ली और इसकी किसी को भनक तक नहीं लगी।
थापली और मोरनी क्षेत्र के किसानों बलविन्द्र, रामजी लाल, महेंद्र राणा, तेज पाल आदि ने बताया कि थापली में बडे़ पैमाने पर खैर के हरे पेड़ों को जंगलों और नौतोड़ जमीनों से काटा जो रहा है। हरा भरा पर्यावरण संस्था के प्रदेश प्रमुख जीवन शर्मा ने कहा कि सरकार ने भूस्खलन रोकने के लिए हरे पेड़ों के कटान पर पाबंदी लगा रखी है, जबकि वन मंडल मोरनी-पिंजौर में वन मंडल अधिकारी सरकार के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हरे पेड़ों के कटान की परमिशन दे रहे हैं।
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उधर, वन राजिक अधिकारी परवीन यादव का कहना है कि जंगलों में दौरे के दौरान उन्हें कोई ऐसा अवैध कटान नहीं मिला। विवादित स्थान पर कटान की परमिशन जारी करने से पहले वन विभाग ने निशानदेही करवाई थी। जब उनसे पूछा गया कि निशानदेही लिखित में हुई तो उन्होंने कहा कि जैसा विभाग का नियम है, उसी के हिसाब से करवाया गया है। पंचकूला और कालका तहसील में हरे पेड़ों के कटान की पाबंदी के बावजूद खैर काटने की परमिशन जारी करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस बारे में परमिशन जारी करने वाले अधिकारी ही कुछ कह सकते हैं।
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स्थानीय निवासी बलदेव का कहना है कि उनके यहां पर ऐसी जमीन से वन विभाग ने पेड़ों को काटने की अनुमति जारी कर दी, जहां की निशानदेही तक नहीं हुई कि वह जमीन किसकी है। इस जमीन के साथ लगती प्रदेश सरकार की जमीनों से बडे़ पैमाने पर खैर का कटान हुआ है। उन्होंने मांग की कि इसकी जांच करवाई जाए। एक अन्य युवक का आरोप है कि वन विभाग ने विवादित जगह की चुपचाप निशानदेही करवा ली और इसकी किसी को भनक तक नहीं लगी।
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थापली और मोरनी क्षेत्र के किसानों बलविन्द्र, रामजी लाल, महेंद्र राणा, तेज पाल आदि ने बताया कि थापली में बडे़ पैमाने पर खैर के हरे पेड़ों को जंगलों और नौतोड़ जमीनों से काटा जो रहा है। हरा भरा पर्यावरण संस्था के प्रदेश प्रमुख जीवन शर्मा ने कहा कि सरकार ने भूस्खलन रोकने के लिए हरे पेड़ों के कटान पर पाबंदी लगा रखी है, जबकि वन मंडल मोरनी-पिंजौर में वन मंडल अधिकारी सरकार के आदेशों की धज्जियां उड़ाते हरे पेड़ों के कटान की परमिशन दे रहे हैं।
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उधर, वन राजिक अधिकारी परवीन यादव का कहना है कि जंगलों में दौरे के दौरान उन्हें कोई ऐसा अवैध कटान नहीं मिला। विवादित स्थान पर कटान की परमिशन जारी करने से पहले वन विभाग ने निशानदेही करवाई थी। जब उनसे पूछा गया कि निशानदेही लिखित में हुई तो उन्होंने कहा कि जैसा विभाग का नियम है, उसी के हिसाब से करवाया गया है। पंचकूला और कालका तहसील में हरे पेड़ों के कटान की पाबंदी के बावजूद खैर काटने की परमिशन जारी करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि इस बारे में परमिशन जारी करने वाले अधिकारी ही कुछ कह सकते हैं।