दसवीं के बाद टॉपरों का रुख चंडीगढ़ की ओर

Panchkula Updated Mon, 30 Jul 2012 12:00 PM IST
पंचकूला। दसवीं पास आउट होते ही पंचकूला के टॉपर चंडीगढ़ की ओर चले जाते हैं। उनके अभिभावकों को मालूम है कि अच्छे मार्क्स के बावजूद उन्हें पीयू यूनिवर्सिटी में दाखिला नहीं मिलने वाला। एडमिशन के लिए विद्यार्थी और अभिभावक दसवीं से ही जद्दोजहद में जुट जाते हैं। एडमिशन मिल जाता है तो अभिभावकों को अपने बच्चों को लाने और ले जाने की चिंता बढ़ जाती है। खर्च तो बढ़ता है, साथ ही दो से तीन घंटे का समय भी बरबाद होता है। इससे विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए समय भी कम मिलता है। हर साल दसवीं के बाद करीब 500 बच्चे पंचकूला से चंडीगढ़ की ओर पलायन कर जाते हैं। अमर उजाला ने ऐसे ही अभिभावकों और विद्यार्थियों से बातचीत कर उन्हें आने वाली समस्याओं को जानने की कोशिश की।
पेक जैसी यूनिवर्सिटी होती तो क्यों जाते चंडीगढ़
सेक्टर-16 में रहने वाली पूनम मोदगिल के बेटे सुनंदन मोदगिल ने इसी साल हंसराज पब्लिक स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की है। सुनंदन को आगे एडमिशन में दिक्कत न आए इसलिए उसने चंडीगढ़ के न्यू इंडिया स्कूल में 11वीं क्लास में एडमिशन ले लिया, लेकिन इस दौरान उन्हें काफी दिक्कत का सामना करना पड़ा। चंडीगढ़ आने-जाने में दो से तीन घंटे बरबाद हो जाते हैं। घर पहुंचने में थोड़ी भी देरी हो जाती तो पूनम के माथे पर चिंता की लकीरें साफ देखी जा सकती हैं। पूनम का कहना है कि यदि पंचकूला में पेक जैसी यूनिवर्सिटी तो शायद उनके बेटे को रोजाना 15 किलोमीटर का सफर तय नहीं करना पड़ता।
ब्ल्यू बर्ड का टॉपर भी गया चंडीगढ़
पहली क्लास से लेकर दसवीं तक ब्लू बर्ड में टॉपर प्रबल ने भी ग्यारहवीं में एडमिशन मनीमाजरा के स्कूल में ले लिया है। फिलहाल वह इस समय दिल्ली में हैं। उनके पिता गगनदीप और मां अनुराधा ने बताया कि यहां पर यूनिवर्सिटी और बेहतर व्यवस्था नहीं होने के कारण ऐसा कदम उठाया है। यदि पंचकूला में ही यूनिवर्सिटी और इंजीनियरिंग कालेज हों तो बच्चों को वहां न भेजना पड़े। जब तक बच्चे घर वापस नहीं आते तब तक चिंता लगी रहती है।
आने-जाने में ही थक जाते हैं बच्चे
माडल संस्कृति से इसी साल दसवीं की परीक्षा पास करने के बाद नेहा धीमान ने भी चंडीगढ़ के डीएवी में एडमिशन ले लिया है। उनके पिता किशोर कुमार ने बताया कि उनकी बेटी को चंडीगढ़ जाने में बहुत तकलीफों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को पहले मनीमाजरा जाना पड़ता है, फिर उसके बाद बस से चंडीगढ़ जाना पड़ता है। बस में इतनी भीड़ होती है एक लड़की को चढ़ पाना कितना मुश्किल होता है कि उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकते। इसके अलावा सीटीयू बस चालक बहुत ही बदतमीजी से बात करते हैं। किशोर कुमार कहते हैं कि यदि यूनिवर्सिटी यहां होती तो बच्चों को इतनी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता।

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