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महिला
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इंसान ठान ले तो कोई काम मुश्किल नहीं : निशा सिंगला
चंडीगढ़। एक वक्त ऐसा था कि औरत का घर की चौखट से बाहर निकलना मुश्किल था लेकिन आज महिलाओं ने खुद को इतना सशक्त बना लिया है कि वह घर से न निकलें तो बड़े-बड़े काम रुक जाएं। ऐसी ही एक महिला हैं, बिजनेस वुमन निशा सिंगला। निशा ने अपनी शादी के बाद कई बंदिशें देखीं पर कभी उन बंदिशों को न तो तोड़ने की कोशिश की न ही पति के आदेश का उल्लंघन किया। बस इंतजार किया सही वक्त का। पति संदीप सिंगला ने जब मॉल खोला तो उनके लिए मुश्किल थी कि कोई ऐसा साथी हो, जो आत्मविश्वास से भरा हो। पत्नी निशा सिंगला से बात की तो निशा ने कहा इस काम में उनसे बेहतर साथी उन्हें नहीं मिल सकता। निशा सिंगला ने बताया कि पति को उनकी बात जम गई हालांकि कुछ दिन बाद जब वह मॉल में पहुंचीं तो उनको एक कठिन जिम्मेदारी दे दी गई लेकिन उन्होंने खुद को साबित कर दिया। निशा सिंगला ने बताया कि मॉल की सारी परचेजिंग उनको ही करनी होती है। एक हजार ब्रांड्स में से किसे खरीदना है और किसे नहीं यह तय करना भी उन्हीं का काम होता है। निशा ने कहा कि उनके बच्चे छोटे थे तो भी वह घर में बच्चों की केयर करने के बाद सीधे मॉल पहुंचती थीं। निशा सिंगला ने कहा कि यदि इंसान ठान ले तो कोई काम कठिन नहीं है।
समाजसेवा के लिए पहनी पुलिस की वर्दी : डीएसपी रश्मि यादव
चंडीगढ़। ‘कभी माता-पिता के साथ घर के बाहर घूमने जाती तो अक्सर पुलिस वाले दिखाई देते थे। कुछ रिश्तेदार भी पुलिस में थे। कभी-कभी पुलिस की वर्दी में महिलाएं भी दिखती थीं, तब लगता था कि मैं भी एक दिन वर्दी पहनूंगी और लोगों की सेवा करूंगी। बचपन का यह ख्वाब बड़ा होकर कैसे हकीकत में बदलेगा, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था लेकिन आखिरकार ख्वाब पूरा हो ही गया। यह कहना है डीएसपी रश्मि यादव का। तेजतर्रार और हर मोर्चे पर डटी रहने वाली रश्मि यादव ने बताया कि उन्होंने सात वर्ष की उम्र में पुलिस अफसर बनने का सपना देखा था। सपना देखना एक बात होती है और पूरा करना दूसरी। उन्होंने कहा कि घरवाले चाहते थे कि वह एक डाक्टर बनें पर उन्होंने ठान लिया था कि वह पुलिस अधिकारी ही बनेंगी। हालांकि घरवालों ने उनको कुछ समय के लिए मेडिकल की पढ़ाई करने अमृतसर भेज दिया था। चंडीगढ़ की रहने वाली रश्मि यादव ने कहा कि किस्मत उनके साथ रही। उन्होंने परीक्षाएं तो कई दीं पर उनका सेलेक्शन हुआ वर्ष 2009 में दानिप्स कैडर में। उस समय उनकी पोस्टिंग नई दिल्ली में हुई और कुछ वर्ष बाद चंडीगढ़ में आ गईं। अभी वह चंडीगढ़ साइबर सेल, आईआरबी और पीईबी ब्रांच की डीएसपी पद पर तैनात हैं। रश्मि यादव ने कई परीक्षाओं के साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने घरवालों को बताया तक नहीं। जब रिजल्ट आया तो वह सेलेक्ट हो गईं थीं। अब जैसे ही यह बात घरवालों को पता चली तो वह काफी नाखुश हुए। घरवाले नहीं चाहते थी कि उनकी बेटी पुलिस बने। शायद कुछ डर था लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। किसी तरह उन्होंने अपने घरवालों को राजी कर वर्ष 2011 में ट्रेनिंग पर गईं।
केवल महिलाएं संचालित करती हैं मंदिर
चंडीगढ़। ज्यादातर मंदिरों के संचालन की जिम्मेदारी पुरुषों के हाथ में ही होती है पर चंडीगढ़ में एक मंदिर ऐसा भी है जिसे सिर्फ महिलाएं संचालित करती हैं। यह है चंडीगढ़ के सेक्टर-40 में स्थित हनुमंत धाम। इसमें प्रधान से लेकर कार्यकारिणी की हर सदस्य महिला ही है।
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श्री हनुमंत धाम को महिला सुंदरकांड सभा संचालित करती हैं। करीब 19 वर्ष पहले मंदिर संचालन के लिए कमेटी का गठन हुआ। पहले यह लगा कि मंदिर बनाने में महिलाएं फंड कहां से जुटा पाएंगी लेकिन वह भी सब पूरा हो गया। यह कहना है सेक्टर 40 स्थित श्री हनुमंत धाम को संचालित करने वाली संस्था महिला सुंदरकांड सभा की अध्यक्ष नीना तिवारी का। नीना तिवारी कहती हैं कि 32 फीट के विशाल हनुमान जी की प्रतिमा है। उन्होंने बताया कि हनुमान जी की छाती में करोड़ों राम हैं, ऐसा इसलिए कि जब प्रतिमा बनाई जा रही थी तो राम के करोड़ों नाम लिखे कागज के टुकड़ों को सीमेंट और रेत में मिलाकर बनाया गया। वहां पर गदा भी बड़ी है। मंदिर में त्रिलिंगेश्वर महादेव के अलावा, राधा कृष्ण, रामपरिवार, अंजनी माता की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। महिला सुंदरकांड सभा के सभी सदस्य और पदाधिकारी पारदर्शी तरीके से काम करती हैं। किसी भी प्रकार का कोई तकरार नहीं होती। नीना तिवारी ने कहा कि मंदिर कमेटी की ओर से यहां पर चैरिटेबल तरीके से महिलाओं के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर, सेल्फ डिफेंस, सिलाई सेंटर और ब्यूटी पार्लर के अलावा गरीब बच्चों को टयूशन पढ़ाने का काम भी होता है।
बीस वर्ष की उम्र में 200 लड़कियों की गुरु बनीं शिप्रा
हरियाणा की शिप्रा पढ़ाई के साथ दे रही हैं मुफ्त शिक्षा, जातिवाद के खिलाफ चलाई मुहिम भी रंग ला रही
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। सड़कों पर भीख मांगते बच्चों को क्या देखा कि शिप्रा पसीज गईं। मन में सवाल उठा, हाथ में कलम थामने की उम्र में भीख मांगने और गाड़ियों की सफाई करने वाले छोटे बच्चे क्या शिक्षा हासिल नहीं कर सकते। शिप्रा ने खुद प्रण लिया कि वह ऐसे बच्चों को शिक्षित बनाएंगी।
शिप्रा ने ऐसे बच्चों केअभिभावकों को खोजा। पहले उन्हें अक्षर ज्ञान दिया। उन्हें पढ़ाई करवाई। अब हालात यह हैं कि शिप्रा 200 बच्चों को वह मुफ्त में एजूकेशन दे रही हैं। वह 20 साल की उम्र में 200 लड़कियों की गुरु बन गईं। शिप्रा की उड़ान यहीं तक नहीं है, वह जातिवाद के खिलाफ भी आवाज उठा रही हैं। यही कारण है कि वह अपने नाम के आगे सरनेम नहीं लगाती। उनका कहना है कि सरनेम जातिवाद को उजागर करता है।
शिप्रा हरियाणा के भिवानी जिले की रहने वाली हैं। 2016 में वह चंडीगढ़ पहुंची तो भीख मांगने वाले बच्चों को देखा तो उन बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी लेकिन दिक्कत खड़ी थी खुद की पढ़ाई की भी। वह पीयू से स्नातक कर रही थीं। परिवार में पिता डॉ. पवन कुमार भारद्वाज को भी यह बात बताई। पहले तो परिवार के लोग राजी नहीं हुए बाद में मान गए। उनका तर्क था कि पहले खुद पैरों पर खड़ी हो और उसकेबाद यह काम करे लेकिन शिप्रा कहां मानने वाली थी। उन्होंने सेक्टर-25 में ऐसे बच्चों को चिन्हित किया और उनको पढ़ाई के लिए राजी किया। पीयू केसेक्टर 25 स्थित यूआईईटी में दो कमरे आवंटित कराए और पढ़ाई शुरू कर दी। पहले बच्चों का बेसिक क्लीयर किया और उसके बाद उन्हें साफ-सफाई के बारे में बताया गया। आज 200 से अधिक बच्चे उनके पास शिक्षा पा रहे हैं। यही नहीं 20 से अधिक गरीब महिलाएं भी पढ़ने आ रही हैं। शिप्रा कहती हैं कि महिलाएं सशक्त हो रही हैं लेकिन अभी इसके लिए और समय लगेगा।
चंडीगढ़। एक वक्त ऐसा था कि औरत का घर की चौखट से बाहर निकलना मुश्किल था लेकिन आज महिलाओं ने खुद को इतना सशक्त बना लिया है कि वह घर से न निकलें तो बड़े-बड़े काम रुक जाएं। ऐसी ही एक महिला हैं, बिजनेस वुमन निशा सिंगला। निशा ने अपनी शादी के बाद कई बंदिशें देखीं पर कभी उन बंदिशों को न तो तोड़ने की कोशिश की न ही पति के आदेश का उल्लंघन किया। बस इंतजार किया सही वक्त का। पति संदीप सिंगला ने जब मॉल खोला तो उनके लिए मुश्किल थी कि कोई ऐसा साथी हो, जो आत्मविश्वास से भरा हो। पत्नी निशा सिंगला से बात की तो निशा ने कहा इस काम में उनसे बेहतर साथी उन्हें नहीं मिल सकता। निशा सिंगला ने बताया कि पति को उनकी बात जम गई हालांकि कुछ दिन बाद जब वह मॉल में पहुंचीं तो उनको एक कठिन जिम्मेदारी दे दी गई लेकिन उन्होंने खुद को साबित कर दिया। निशा सिंगला ने बताया कि मॉल की सारी परचेजिंग उनको ही करनी होती है। एक हजार ब्रांड्स में से किसे खरीदना है और किसे नहीं यह तय करना भी उन्हीं का काम होता है। निशा ने कहा कि उनके बच्चे छोटे थे तो भी वह घर में बच्चों की केयर करने के बाद सीधे मॉल पहुंचती थीं। निशा सिंगला ने कहा कि यदि इंसान ठान ले तो कोई काम कठिन नहीं है।
समाजसेवा के लिए पहनी पुलिस की वर्दी : डीएसपी रश्मि यादव
चंडीगढ़। ‘कभी माता-पिता के साथ घर के बाहर घूमने जाती तो अक्सर पुलिस वाले दिखाई देते थे। कुछ रिश्तेदार भी पुलिस में थे। कभी-कभी पुलिस की वर्दी में महिलाएं भी दिखती थीं, तब लगता था कि मैं भी एक दिन वर्दी पहनूंगी और लोगों की सेवा करूंगी। बचपन का यह ख्वाब बड़ा होकर कैसे हकीकत में बदलेगा, यह तो मैंने सोचा ही नहीं था लेकिन आखिरकार ख्वाब पूरा हो ही गया। यह कहना है डीएसपी रश्मि यादव का। तेजतर्रार और हर मोर्चे पर डटी रहने वाली रश्मि यादव ने बताया कि उन्होंने सात वर्ष की उम्र में पुलिस अफसर बनने का सपना देखा था। सपना देखना एक बात होती है और पूरा करना दूसरी। उन्होंने कहा कि घरवाले चाहते थे कि वह एक डाक्टर बनें पर उन्होंने ठान लिया था कि वह पुलिस अधिकारी ही बनेंगी। हालांकि घरवालों ने उनको कुछ समय के लिए मेडिकल की पढ़ाई करने अमृतसर भेज दिया था। चंडीगढ़ की रहने वाली रश्मि यादव ने कहा कि किस्मत उनके साथ रही। उन्होंने परीक्षाएं तो कई दीं पर उनका सेलेक्शन हुआ वर्ष 2009 में दानिप्स कैडर में। उस समय उनकी पोस्टिंग नई दिल्ली में हुई और कुछ वर्ष बाद चंडीगढ़ में आ गईं। अभी वह चंडीगढ़ साइबर सेल, आईआरबी और पीईबी ब्रांच की डीएसपी पद पर तैनात हैं। रश्मि यादव ने कई परीक्षाओं के साथ सिविल सर्विसेज की तैयारी करना शुरू किया। इसके लिए उन्होंने घरवालों को बताया तक नहीं। जब रिजल्ट आया तो वह सेलेक्ट हो गईं थीं। अब जैसे ही यह बात घरवालों को पता चली तो वह काफी नाखुश हुए। घरवाले नहीं चाहते थी कि उनकी बेटी पुलिस बने। शायद कुछ डर था लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है। किसी तरह उन्होंने अपने घरवालों को राजी कर वर्ष 2011 में ट्रेनिंग पर गईं।
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केवल महिलाएं संचालित करती हैं मंदिर
चंडीगढ़। ज्यादातर मंदिरों के संचालन की जिम्मेदारी पुरुषों के हाथ में ही होती है पर चंडीगढ़ में एक मंदिर ऐसा भी है जिसे सिर्फ महिलाएं संचालित करती हैं। यह है चंडीगढ़ के सेक्टर-40 में स्थित हनुमंत धाम। इसमें प्रधान से लेकर कार्यकारिणी की हर सदस्य महिला ही है।
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श्री हनुमंत धाम को महिला सुंदरकांड सभा संचालित करती हैं। करीब 19 वर्ष पहले मंदिर संचालन के लिए कमेटी का गठन हुआ। पहले यह लगा कि मंदिर बनाने में महिलाएं फंड कहां से जुटा पाएंगी लेकिन वह भी सब पूरा हो गया। यह कहना है सेक्टर 40 स्थित श्री हनुमंत धाम को संचालित करने वाली संस्था महिला सुंदरकांड सभा की अध्यक्ष नीना तिवारी का। नीना तिवारी कहती हैं कि 32 फीट के विशाल हनुमान जी की प्रतिमा है। उन्होंने बताया कि हनुमान जी की छाती में करोड़ों राम हैं, ऐसा इसलिए कि जब प्रतिमा बनाई जा रही थी तो राम के करोड़ों नाम लिखे कागज के टुकड़ों को सीमेंट और रेत में मिलाकर बनाया गया। वहां पर गदा भी बड़ी है। मंदिर में त्रिलिंगेश्वर महादेव के अलावा, राधा कृष्ण, रामपरिवार, अंजनी माता की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। महिला सुंदरकांड सभा के सभी सदस्य और पदाधिकारी पारदर्शी तरीके से काम करती हैं। किसी भी प्रकार का कोई तकरार नहीं होती। नीना तिवारी ने कहा कि मंदिर कमेटी की ओर से यहां पर चैरिटेबल तरीके से महिलाओं के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर, सेल्फ डिफेंस, सिलाई सेंटर और ब्यूटी पार्लर के अलावा गरीब बच्चों को टयूशन पढ़ाने का काम भी होता है।
बीस वर्ष की उम्र में 200 लड़कियों की गुरु बनीं शिप्रा
हरियाणा की शिप्रा पढ़ाई के साथ दे रही हैं मुफ्त शिक्षा, जातिवाद के खिलाफ चलाई मुहिम भी रंग ला रही
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। सड़कों पर भीख मांगते बच्चों को क्या देखा कि शिप्रा पसीज गईं। मन में सवाल उठा, हाथ में कलम थामने की उम्र में भीख मांगने और गाड़ियों की सफाई करने वाले छोटे बच्चे क्या शिक्षा हासिल नहीं कर सकते। शिप्रा ने खुद प्रण लिया कि वह ऐसे बच्चों को शिक्षित बनाएंगी।
शिप्रा ने ऐसे बच्चों केअभिभावकों को खोजा। पहले उन्हें अक्षर ज्ञान दिया। उन्हें पढ़ाई करवाई। अब हालात यह हैं कि शिप्रा 200 बच्चों को वह मुफ्त में एजूकेशन दे रही हैं। वह 20 साल की उम्र में 200 लड़कियों की गुरु बन गईं। शिप्रा की उड़ान यहीं तक नहीं है, वह जातिवाद के खिलाफ भी आवाज उठा रही हैं। यही कारण है कि वह अपने नाम के आगे सरनेम नहीं लगाती। उनका कहना है कि सरनेम जातिवाद को उजागर करता है।
शिप्रा हरियाणा के भिवानी जिले की रहने वाली हैं। 2016 में वह चंडीगढ़ पहुंची तो भीख मांगने वाले बच्चों को देखा तो उन बच्चों के लिए कुछ करने की ठानी लेकिन दिक्कत खड़ी थी खुद की पढ़ाई की भी। वह पीयू से स्नातक कर रही थीं। परिवार में पिता डॉ. पवन कुमार भारद्वाज को भी यह बात बताई। पहले तो परिवार के लोग राजी नहीं हुए बाद में मान गए। उनका तर्क था कि पहले खुद पैरों पर खड़ी हो और उसकेबाद यह काम करे लेकिन शिप्रा कहां मानने वाली थी। उन्होंने सेक्टर-25 में ऐसे बच्चों को चिन्हित किया और उनको पढ़ाई के लिए राजी किया। पीयू केसेक्टर 25 स्थित यूआईईटी में दो कमरे आवंटित कराए और पढ़ाई शुरू कर दी। पहले बच्चों का बेसिक क्लीयर किया और उसके बाद उन्हें साफ-सफाई के बारे में बताया गया। आज 200 से अधिक बच्चे उनके पास शिक्षा पा रहे हैं। यही नहीं 20 से अधिक गरीब महिलाएं भी पढ़ने आ रही हैं। शिप्रा कहती हैं कि महिलाएं सशक्त हो रही हैं लेकिन अभी इसके लिए और समय लगेगा।