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मेंटली रिटार्टेड बच्चों के लिए सहारा बनीं शहर की पूजा
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मेंटली रिटार्टेड बच्चों के लिए सहारा बनीं पूजा
दिव्यांग बच्चों के लिए कई साल से कर रहीं हैं काम
2008 में प्रशासन ने भी स्टेट अवार्ड से नवाजा
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। शहर की पूजा घई ने मेंटली रिटार्टेड बच्चों के लिए सराहा बनने का काम किया है। एनजीओ समर्थ जियो के बैनर तले वह न सिर्फ दिव्यागों की मदद करतीं हैं बल्कि अब तक 700 से 800 बुजुर्गों की पेंशन लगवा चुकी हैं। वह आर्थिक रूप से कमजोर कई लड़कियों की शादी भी करवा चुकी हैं। पूजा की इन कामों को देखते हुए चंडीगढ़ प्रशासन ने उन्हें साल 2008 में स्टेट अवार्ड से भी सम्मानित किया है।
पूजा ने बताया कि अभी उनके पास 34 मेंटली रिटार्टेड बच्चे हैं जिनका रहना, खाना-पीना सब कुछ उनकी संस्था देखती है। इनमें से कई बच्चों के माता-पिता नहीं हैं। संस्था ऐसे बच्चों को कभी अभिभावकों की कमी नहीं महसूस करने देती है। पूजा का कहना है कि ये बच्चे जब 25 साल के हो जाते हैं तो स्पेशल स्कूल उनको रखने व ट्रेनिंग देने के लिए मना कर देते हैं, क्योंकि उनकी सहायता व ट्रेनिंग में सरकार की तरफ से कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे बच्चों को छोड़ नहीं सकते इसलिए उन्होंने इन बच्चों के लिए सहारा बनने का निर्णय लिया। साल 2005 से वह बच्चों की मदद में लगी हैं। पूजा घई का कहना है कि वह खुद एक दिव्यांग की मां हैं, ऐसे में वह इन बच्चों की पीड़ा को समझ सकती हैं। उनका कहना है कि इस काम से उन्हें सुकुन मिलता है।
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दिव्यांग बच्चों के लिए कई साल से कर रहीं हैं काम
2008 में प्रशासन ने भी स्टेट अवार्ड से नवाजा
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। शहर की पूजा घई ने मेंटली रिटार्टेड बच्चों के लिए सराहा बनने का काम किया है। एनजीओ समर्थ जियो के बैनर तले वह न सिर्फ दिव्यागों की मदद करतीं हैं बल्कि अब तक 700 से 800 बुजुर्गों की पेंशन लगवा चुकी हैं। वह आर्थिक रूप से कमजोर कई लड़कियों की शादी भी करवा चुकी हैं। पूजा की इन कामों को देखते हुए चंडीगढ़ प्रशासन ने उन्हें साल 2008 में स्टेट अवार्ड से भी सम्मानित किया है।
पूजा ने बताया कि अभी उनके पास 34 मेंटली रिटार्टेड बच्चे हैं जिनका रहना, खाना-पीना सब कुछ उनकी संस्था देखती है। इनमें से कई बच्चों के माता-पिता नहीं हैं। संस्था ऐसे बच्चों को कभी अभिभावकों की कमी नहीं महसूस करने देती है। पूजा का कहना है कि ये बच्चे जब 25 साल के हो जाते हैं तो स्पेशल स्कूल उनको रखने व ट्रेनिंग देने के लिए मना कर देते हैं, क्योंकि उनकी सहायता व ट्रेनिंग में सरकार की तरफ से कोई प्रावधान नहीं है। ऐसे बच्चों को छोड़ नहीं सकते इसलिए उन्होंने इन बच्चों के लिए सहारा बनने का निर्णय लिया। साल 2005 से वह बच्चों की मदद में लगी हैं। पूजा घई का कहना है कि वह खुद एक दिव्यांग की मां हैं, ऐसे में वह इन बच्चों की पीड़ा को समझ सकती हैं। उनका कहना है कि इस काम से उन्हें सुकुन मिलता है।
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