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देश को वंशीधर जैसे अफसरों की जरूरत
Updated Sat, 11 Aug 2018 01:10 AM IST
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देश को ‘नमक का दारोगा’ के मुंशी वंशीधर जैसे मजबूत चरित्र वाले अफसरों की जरूरत’
सबहेड
सीबीआई कोर्ट ने की विशेष टिप्पणी, कहा- यह मामला बताता है कि कैसे भ्रष्टाचार का कैंसर फैलता जा रहा है
- 170 पेज के फैसले में विशेष जज ने कहा, नैतिक चरित्र इस शताब्दी में भी एक गुण
अमरीश शर्मा
चंडीगढ़। ‘मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कहानी ‘नमक का दारोगा’ आज 21वीं सदी में भी प्रासंगिक है, जब भ्रष्टाचार समाज में कैसर की तरह बीमारी बनता जा रहा है, इसलिए वक्त के अनुसार पुलिस में ‘नमक का दारोगा’ के मुख्य पात्र मुंशी वंशीधर जैसे मजबूत चरित्र के अफसरों की जरूरत है। उसने पुलिस अफसर होते हुए अफसरों के लिए ईमानदारी की मिसाल कायम की। नमक की तस्करी रोकने के लिए वंशीधर को अपनी कानूनी ड्यूटी न करने के लिए कई लोगों ने रिश्वत देने की कोशिश की लेकिन उसने कभी किसी से रिश्वत नहीं ली।’ सीबीआई कोर्ट की विशेष जज गगन गीत कौर ने यह टिप्पणी आईपीएस देशराज को भ्रष्टाचार मामले में तीन साल की सजा सुनाते हुए की। 170 पेज के फैसले में विशेष जज ने कहा कि, सरकारी कर्मचारियों में भ्रष्टाचार और रिश्वत आर्थिक अपराध की सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी में से एक है, जिसे सफेद कॉलर अपराध के रूप में जाना जाता है। यह कॉरपोरेट व्यक्तियों, तकनीकी विशेषज्ञों और सरकारी कर्मचारियों के अधीन उच्च रैंक वाले व्यक्तियों द्वारा किया जाता है।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि, नैतिक चरित्र इस शताब्दी में भी गुण है और यही कारण है कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियां आज भी चरित्र निर्माण के लिए स्कूल सिलेबस का हिस्सा हैं।
भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त संदेश देते हुए विशेष जज ने अपने फैसले में लिखा कि, यह एक अनोखा मामला है। इसमें शिकायतकर्ता खुद एक पब्लिक सर्वेंट है और उसने जिस पर आरोप लगाए हैं, वह उसका सीनियर अफसर है। देशराज को शिकायतकर्ता के खिलाफ शुरू की गई विभागीय जांच में उसके पक्ष में रिपोर्ट करने के लिए रिश्वत मांगने का दोषी पाया गया। वहीं दिलचस्प बात यह है कि दोषी की सिफारिश पर ही यह इंक्वायरी शुरू की गई थी। इस मामले ने पर्दा उठाया कि, कैसे भ्रष्टाचार का कैंसर सिस्टम में फैलता जा रहा है।
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बाक्स
कम से कम और अधिक से अधिक सजा का हकदार नहीं
सीबीआई अदालत ने फैसले में कहा कि, अदालत को दोषी को कम से कम सजा देने और अधिक से अधिक सजा देने के लिए साक्ष्य नहीं मिले। केस में ऐसी को भी परिस्थितियां नहीं दिखीं, जिससे दोषी को कम से कम सजा दी जाए। वहीं दोषी के बच्चों की बीमारी की समस्या को ध्यान में रखते हुए अदालत को उन्हें अधिकतम सजा सुनाने के लिए ऐसी परिस्थितियां नहीं मिलीं।
बाक्स
सजा से पहले और बाद में कोर्ट के बाद टहलता रहा देशराज
सुबह दोनों पक्षों की ओर से अंतिम बहस सुनने के बाद विशेष अदालत ने फैसले के बाद दोपहर बाद का समय तय किया। देशराज दोपहर दो बजे कोर्ट रूम पहुंच गया, लेकिन सजा सुनाए जाने से पहले करीब एक घंटा तक वह कोर्ट रूम के बाहर अकेले टहलता रहा। सजा सुनाए जाने के बाद भी वह कोर्ट रूम के बाहर फैसले की कॉपी के इंतजार के दौरान अकेले टहलता रहा। इस दौरान उसके चेहरे पर तनाव साफ झलक रहा था। वहीं सजा सुनाए जाने के दौरान और उसके बाद उसका चेहरा लाल हो गया था।
सजा के बाद बोला देशराज, मेरे साथ अन्याय हुआ
सीबीआई कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद देशराज ने कहा कि उसके साथ गलत हुआ है। उसे केस में फंसाया गया था। उसके साथ हुए अन्याय के खिलाफ वह हाईकोर्ट में अपील करेगा और उसे पूरा विश्वास है कि वहां से उसे न्याय जरूर मिलेगा।
इन धाराओं में हुई सजा
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 में तीन साल और 50 हजार रुपये जुर्माना
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (2) आर/डब्ल्यू 13 (1) (डी) में तीन साल की सजा और 50 हजार रुपये जुर्माना
नोट: दोनों सजा एक साथ चलेंगी।
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सीबीआई कोर्ट ने की विशेष टिप्पणी, कहा- यह मामला बताता है कि कैसे भ्रष्टाचार का कैंसर फैलता जा रहा है
- 170 पेज के फैसले में विशेष जज ने कहा, नैतिक चरित्र इस शताब्दी में भी एक गुण
अमरीश शर्मा
चंडीगढ़। ‘मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कहानी ‘नमक का दारोगा’ आज 21वीं सदी में भी प्रासंगिक है, जब भ्रष्टाचार समाज में कैसर की तरह बीमारी बनता जा रहा है, इसलिए वक्त के अनुसार पुलिस में ‘नमक का दारोगा’ के मुख्य पात्र मुंशी वंशीधर जैसे मजबूत चरित्र के अफसरों की जरूरत है। उसने पुलिस अफसर होते हुए अफसरों के लिए ईमानदारी की मिसाल कायम की। नमक की तस्करी रोकने के लिए वंशीधर को अपनी कानूनी ड्यूटी न करने के लिए कई लोगों ने रिश्वत देने की कोशिश की लेकिन उसने कभी किसी से रिश्वत नहीं ली।’ सीबीआई कोर्ट की विशेष जज गगन गीत कौर ने यह टिप्पणी आईपीएस देशराज को भ्रष्टाचार मामले में तीन साल की सजा सुनाते हुए की। 170 पेज के फैसले में विशेष जज ने कहा कि, सरकारी कर्मचारियों में भ्रष्टाचार और रिश्वत आर्थिक अपराध की सबसे महत्वपूर्ण श्रेणी में से एक है, जिसे सफेद कॉलर अपराध के रूप में जाना जाता है। यह कॉरपोरेट व्यक्तियों, तकनीकी विशेषज्ञों और सरकारी कर्मचारियों के अधीन उच्च रैंक वाले व्यक्तियों द्वारा किया जाता है।
अपने आदेश में अदालत ने कहा कि, नैतिक चरित्र इस शताब्दी में भी गुण है और यही कारण है कि मुंशी प्रेमचंद की कहानियां आज भी चरित्र निर्माण के लिए स्कूल सिलेबस का हिस्सा हैं।
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कम से कम और अधिक से अधिक सजा का हकदार नहीं
सीबीआई अदालत ने फैसले में कहा कि, अदालत को दोषी को कम से कम सजा देने और अधिक से अधिक सजा देने के लिए साक्ष्य नहीं मिले। केस में ऐसी को भी परिस्थितियां नहीं दिखीं, जिससे दोषी को कम से कम सजा दी जाए। वहीं दोषी के बच्चों की बीमारी की समस्या को ध्यान में रखते हुए अदालत को उन्हें अधिकतम सजा सुनाने के लिए ऐसी परिस्थितियां नहीं मिलीं।
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सजा से पहले और बाद में कोर्ट के बाद टहलता रहा देशराज
सुबह दोनों पक्षों की ओर से अंतिम बहस सुनने के बाद विशेष अदालत ने फैसले के बाद दोपहर बाद का समय तय किया। देशराज दोपहर दो बजे कोर्ट रूम पहुंच गया, लेकिन सजा सुनाए जाने से पहले करीब एक घंटा तक वह कोर्ट रूम के बाहर अकेले टहलता रहा। सजा सुनाए जाने के बाद भी वह कोर्ट रूम के बाहर फैसले की कॉपी के इंतजार के दौरान अकेले टहलता रहा। इस दौरान उसके चेहरे पर तनाव साफ झलक रहा था। वहीं सजा सुनाए जाने के दौरान और उसके बाद उसका चेहरा लाल हो गया था।
सजा के बाद बोला देशराज, मेरे साथ अन्याय हुआ
सीबीआई कोर्ट द्वारा फैसला सुनाए जाने के बाद देशराज ने कहा कि उसके साथ गलत हुआ है। उसे केस में फंसाया गया था। उसके साथ हुए अन्याय के खिलाफ वह हाईकोर्ट में अपील करेगा और उसे पूरा विश्वास है कि वहां से उसे न्याय जरूर मिलेगा।
इन धाराओं में हुई सजा
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 में तीन साल और 50 हजार रुपये जुर्माना
- भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13 (2) आर/डब्ल्यू 13 (1) (डी) में तीन साल की सजा और 50 हजार रुपये जुर्माना
नोट: दोनों सजा एक साथ चलेंगी।