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मनुष्य शरीर भगवान का दिया हुआ सर्वश्रेष्ठ प्रसाद : पं. कुलदीप
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फोटो संख्या:55- गांव लावण में श्रीमद्भागवत कथा के समापन पर हवन करते श्रद्धालु--स्रोत- आयोजक
महेंद्रगढ़। गांव लावण में आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का शनिवार को हवन के साथ समापन किया गया। कथा व्यास पंडित कुलदीप भारद्वाज महाराज ने भक्तों को श्रीमद्भागवत कथा की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि शरीर भी भगवान प्रदत्त प्रसाद है और इसका हमेशा ध्यान रखना चाहिए।
यह प्रसंग उन्होंने आजकल लोगों की बदलती शैली और युवाओं में बढ़े वाहन क्रेज को लेकर कही। उन्होंने लोगों से भक्ति मार्ग से जुड़ने और सत्कर्म करने को कहा। बताया कि हवन से वातावरण एवं वायुमंडल शुद्ध होने के साथ-साथ व्यक्ति को आत्मिक बल मिलता है। व्यक्ति में धार्मिक आस्था जागृत होती है। दुर्गुणों की बजाय सद्गुणों के द्वार खुलते हैं। यज्ञ से देवता प्रसन्न होकर मनवांछित फल प्रदान करते हैं।
भागवत कथा के श्रवण से व्यक्ति भव सागर से पार हो जाता है। श्रीमद्भागवत से जीव में भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं। इसके श्रवण मात्र से व्यक्ति के पाप पुण्य में बदल जाते हैं।
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उन्होंने कहा कि प्रसाद तीन अक्षर से मिलकर बना है। पहला प्र का अर्थ प्रभु, दूसरा सा का अर्थ साक्षात व तीसरा द का अर्थ होता है दर्शन। जिसे हम सब प्रसाद कहते हैं। मनुष्य शरीर भी भगवान का दिया हुआ सर्वश्रेष्ठ प्रसाद है। जीवन में कभी प्रसाद का अपमान नहीं करना चाहिए। यह भगवान का अपमान है।
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यह प्रसंग उन्होंने आजकल लोगों की बदलती शैली और युवाओं में बढ़े वाहन क्रेज को लेकर कही। उन्होंने लोगों से भक्ति मार्ग से जुड़ने और सत्कर्म करने को कहा। बताया कि हवन से वातावरण एवं वायुमंडल शुद्ध होने के साथ-साथ व्यक्ति को आत्मिक बल मिलता है। व्यक्ति में धार्मिक आस्था जागृत होती है। दुर्गुणों की बजाय सद्गुणों के द्वार खुलते हैं। यज्ञ से देवता प्रसन्न होकर मनवांछित फल प्रदान करते हैं।
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भागवत कथा के श्रवण से व्यक्ति भव सागर से पार हो जाता है। श्रीमद्भागवत से जीव में भक्ति, ज्ञान एवं वैराग्य के भाव उत्पन्न होते हैं। इसके श्रवण मात्र से व्यक्ति के पाप पुण्य में बदल जाते हैं।
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उन्होंने कहा कि प्रसाद तीन अक्षर से मिलकर बना है। पहला प्र का अर्थ प्रभु, दूसरा सा का अर्थ साक्षात व तीसरा द का अर्थ होता है दर्शन। जिसे हम सब प्रसाद कहते हैं। मनुष्य शरीर भी भगवान का दिया हुआ सर्वश्रेष्ठ प्रसाद है। जीवन में कभी प्रसाद का अपमान नहीं करना चाहिए। यह भगवान का अपमान है।