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Mahendragarh-Narnaul News: एक सप्ताह में दस गुना बढ़ गई मिट्टी के मटकों और कैंपरों की मांग
Sun, 25 May 2025 12:58 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Sun, 25 May 2025 12:58 AM IST
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फोटो संख्या:60- कन्हैयालाल--संवाद
महेंद्रगढ़। एक सप्ताह के दौरान मिट्टी से बने मटकों और कैंपरों की मांग दस गुना बढ़ गई है। शहर में 150 से अधिक परिवार मिट्टी के मटकों और कैंपरों के कारोबार से जुड़े हुए हैं।
बाजार में टोंटी लगे मटके एवं मिट्टी से बने कैंपरों की अधिक मांग है। इस समय बाजार में साधारण मटके की कीमत 80 रुपये से 250 रुपये तक क्षमता के हिसाब से तय है। पांच लीटर से के छोटे मटके 80 रुपये तक उपलब्ध हैं। साधारण मटके की कीमत 120 रुपये से शुरू होकर 160 रुपये तक, बडी झाल 250 रुपये, मिट्टी के टोंटी लगे कैंपर 150 रुपये से 300 रुपये तक उपलब्ध हैं। कारीगरों का कहना है कि इस बार चिकनी मिट्टी की कमी के चलते मांग के अनुरूप मटके तैयार नहीं कर पा रहे हैं। तीन से चार महीने ही व्यापार करने के दिन है। महेंद्रगढ़ क्षेत्र में 150 से अधिक परिवार मिट्टी के मटके तैयार करते है।
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मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए चिकनी मिट्टी की जरूरत होती है, जो आसानी से नहीं मिलती। जहां मिलती है उसे लाने में काफी परेशानी होती है और महंगी भी ज्यादा पड़ती है। मिट्टी महंगी मिलने से उनके व्यवसाय पर सीधा असर पड़ता है। आसपास चिकनी मिट्टी नहीं मिलती बल्की राजस्थान बुहाना क्षेत्र लेकर आनी पड़ती है। ग्रामीण क्षेत्र में जोहड़ों की छटाई के द्वारा निकलने वाली चिकनी मिट्टी लेकर आते हैं। एक ट्रैक्टर-ट्राली पर तीन से चार हजार रुपये का भुगतान करना पड़ता है।
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-- - कन्हैयालाल प्रजापत,का कहना है कि
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मिट्टी के बर्तन में पानी रखने से पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है, जबकि फ्रिज में पानी बिजली की मदद से ठंडा होता है। इससे बिजली की खपत होती है। मिट्टी के बर्तन में रखने से बिजली की बचत होती है और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोगों को भी फायदा होता है।
-- - सुरेश कुमार प्रजापत, कारीगर
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बाजार में टोंटी लगे मटके एवं मिट्टी से बने कैंपरों की अधिक मांग है। इस समय बाजार में साधारण मटके की कीमत 80 रुपये से 250 रुपये तक क्षमता के हिसाब से तय है। पांच लीटर से के छोटे मटके 80 रुपये तक उपलब्ध हैं। साधारण मटके की कीमत 120 रुपये से शुरू होकर 160 रुपये तक, बडी झाल 250 रुपये, मिट्टी के टोंटी लगे कैंपर 150 रुपये से 300 रुपये तक उपलब्ध हैं। कारीगरों का कहना है कि इस बार चिकनी मिट्टी की कमी के चलते मांग के अनुरूप मटके तैयार नहीं कर पा रहे हैं। तीन से चार महीने ही व्यापार करने के दिन है। महेंद्रगढ़ क्षेत्र में 150 से अधिक परिवार मिट्टी के मटके तैयार करते है।
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मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए चिकनी मिट्टी की जरूरत होती है, जो आसानी से नहीं मिलती। जहां मिलती है उसे लाने में काफी परेशानी होती है और महंगी भी ज्यादा पड़ती है। मिट्टी महंगी मिलने से उनके व्यवसाय पर सीधा असर पड़ता है। आसपास चिकनी मिट्टी नहीं मिलती बल्की राजस्थान बुहाना क्षेत्र लेकर आनी पड़ती है। ग्रामीण क्षेत्र में जोहड़ों की छटाई के द्वारा निकलने वाली चिकनी मिट्टी लेकर आते हैं। एक ट्रैक्टर-ट्राली पर तीन से चार हजार रुपये का भुगतान करना पड़ता है।
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मिट्टी के बर्तन में पानी रखने से पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा होता है, जबकि फ्रिज में पानी बिजली की मदद से ठंडा होता है। इससे बिजली की खपत होती है। मिट्टी के बर्तन में रखने से बिजली की बचत होती है और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोगों को भी फायदा होता है।

फोटो संख्या:60- कन्हैयालाल--संवाद

फोटो संख्या:60- कन्हैयालाल--संवाद

फोटो संख्या:60- कन्हैयालाल--संवाद