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बैंगन की खेती में कम लागत लगाकर अच्छा मुनाफा कमा रहे चेलावास के सतवीर सिंह

Sun, 04 Jul 2021 11:00 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 04 Jul 2021 11:00 PM IST
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Satveer Singh of Chelawas is earning good profits by investing less cost in the cultivation of brinjal
कनीना। बाजरे की फसल के बजाय उप मंडल के गांव चेलावास के किसान सतवीर सिंह ने अपने आधा एकड़ खेत में बैंगन की फसल लगाई और बाजरे से अधिक आय कमा रहा है। किसान सतवीर सिंह ने बताया कि उन्होंने 10 फरवरी को आधा एकड़ बैंगन की खेती के लिए पौध तैयार की थी। 20 अप्रैल को बैंगन की पौध को खेत में बेड बनाकर उन पर लगा दिया। बैंगन की फसल में अधिक मेहनत की जरूरत नहीं होती इसलिए खेत में बने बेड पर मल्चिंग और ड्रिप सिस्टम तैयार कर दिया। इस वक्त बैंगन महेंद्रगढ़-दादरी की मंडी में 13 रुपये किलो के हिसाब से बिक रहा है। एक माह में 30 हजार रुपये का बैंगन बेच दिया है। यह नवंबर तक चलेगा, जिससे तकरीबन ढाई लाख रुपये तक की आमदनी होने की उम्मीद है। किसान सतवीर ने बताया कि वह पिछले 2 वर्ष से परंपरागत खेती को छोड़कर सब्जी उगा रहा है। पिछले वर्ष आधा एकड़ में मूली की खेती की थी। इसमें 70 हजार रुपये की आमदनी की।
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::ऐसे करें नर्सरी तैयार
नर्सरी फरवरी में तैयार की जाती है और बुआई अप्रैल में की जाती है। बैंगन की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कार्य होता है खेत को तैयार करना। मिट्टी परीक्षण करने के बाद खेत में एक हेक्टेयर के लिए 4 से 5 ट्रॉली पक्का हुआ गोबर का खाद बिखेर दे। बैंगन की खेती के लिए दो पौधों और दो कतार के बीच की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी ही चाहिए।
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खेती के मौसम अनुकूल
बैंगन की खेती मैदानी इलाके में पूरी साल की जा सकती है लेकिन इसकी खेती के लिए रबी का मौसम सबसे अच्छा होता है। जून, जुलाई, अक्तूबर, नवंबर, फरवरी और मार्च में बागवानी की जाती है।
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अंतर-
इसकी अच्छी उपज पौध के बीच दूरी उगाई जाने वाली किस्म के प्रकार और रोपण के मौसम पर निर्भर करता है। आमतौर पर लंबी फल वाली किस्मों को 60-3-45 सेमी, गोल किस्मों को 75-3-60 सेमी और अधिक उपज देने वाली किस्मों को 90-3-90 सेमी की दूरी पर प्रत्यारोपित किया जाता है। हल्की मिट्टी में मेड़ के किनारे पर रोपों में रोपाई की जाती है। रोपाई से 3-4 दिन पहले पूर्व-भिगोने वाली सिंचाई दी जाती है। रोपाई के समय पौध की जड़ों को बाविस्टिन (2 ग्राम प्रति लीटर पानी) के घोल में डुबो देना चाहिए। इसकी रोपाई अधिकांश शाम को की जानी चाहिए।
सिंचाई:-
पौधे के जड़ क्षेत्र के आसपास नमी की निरंतर आपूर्ति बनाए रखनी चाहिए। रोपाई के बाद पहले और तीसरे दिन हल्की सिंचाई करनी चाहिए। इसके बाद सर्दियों में 8-10 दिन और गर्मी में 5-6 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए।
तुड़ाई:-
बैगन की तुड़ाई इनके फल जब मुलायम व चमकदार अवस्था में आ जाते है तब इनकी तुड़ाई करनी चाहिए। तुड़ाई में देरी करने से ये बदरंग और सख्त हो जाते है। साथ ही इनके अंदर बीज का विकास बढ़ जाता है।
::बैंगन के कीड़े और बीमारियां:-
फसल चक्र और टिलेज, कीड़ों और बीमारियों के खिलाफ पहली सावधानी है। दूसरी सावधानी बरतने के रूप में केवल प्रमाणित और बीमारी-रहित बीज और पौधे खरीद सकते हैं।

बैंगन की खेती करते समय सिंचाई का विशेष ध्यान रखना होता है। साथ ही इसमें लगने वाले कीड़े से बचाव के लिए समय-समय पर दवाओं का छिड़काव भी करना होता है। बैंगन की खेती सबसे लंबी अवधि की होती है। जिसमें ज्यादा से ज्यादा उत्पादन होता है। अधिक उत्पादन होने से कम लागत लगाकर अच्छा मुनाफा कमाया जा सकता है। सब्जी की खेती से जमीन का फसल चक्र भी बदल जाता है और किसान को अधिक आय भी हो जाती है।
-डॉ. प्रेम कुमार यादव, डीएचओ एकीकृत बागबान केंद्र, सुंद्रह
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