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Mahendragarh-Narnaul News: हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने मिट्टी से स्वदेसी कूलर तैयार किया
Wed, 19 Mar 2025 11:06 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Wed, 19 Mar 2025 11:06 PM IST
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फोटो संख्या:51- हकेंवि के वाणिज्य विभाग के शोद्यार्थियों की ओर से तैयार किया गया स्वदेसी कूल
महेंद्रगढ़। हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने मिट्टी से स्वदेसी कूलर तैयार किया है। यह कूलर प्राकृतिक रूप से एसी जैसी ठंडी हवा देता है। इसके इस्तेमाल से जहां बिजली की खपत में कमी आएगी, वहीं यह पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाएगा। हकेंवि के वाणिज्य विभागाध्यक्ष आरपी मीणा ने बताया परंपरागत रूप से तैयार यह देसी कूलर शून्य अपशिष्ट प्रणाली पर काम करता है। इसकी कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए छोटी मोटर का प्रयोग किया जाता है। सौलर आधारित मोटर के प्रयोग से बिजली खपत भी कम होती है।
ऐसे काम करता है कूलर: शोधार्थी यश प्रताप सिंह ने बताया स्वदेशी कूलर में मिट्टी के पाइप, मटके, कुल्हड़ का इस्तेमाल किया जाता है। इस कूलर में पानी की दो टंकियां लगी होती हैं। नीचे वाली टंकी में भरा पानी पंप की मदद से ऊपर की टंकी में जाता है। टंकी में लगी लौहे या प्लास्टिक की पाइपों के बारीक छेद से यह पानी मिट्टी के पात्रों पर गिरता है। मिट्टी के पात्र जब गीले हो जाते हैं तो उनसे गुजरने वाली गर्म हवा ठंडी हवा में बदल जाती है। धीरे-धीरे पानी का कुछ हिस्सा मिट्टी के पाइप या इस्तेमाल किए जाने वाले पात्र से होकर वाष्प में बदल जाता है और बचा हुआ पानी वापस कूलर की नीचे वाली टंकी में पहुंच जाता है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। स्वदेसी कूलर सीएफसी का उत्सर्जन घटाएगा :यश प्रताप सिंह ने बताया स्वदेसी कूलर हवा के प्रभाव से ठंडक पैदा करता है। स्वदेसी कूलर के इस्तेमाल से एसी पर निर्भरता कम हो सकती है। ऐसा होने से एसी से निकलने वाली हानिकारक सीएफसी (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) का उत्सर्जन कम होगा, जो ओजोन परत के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है।
देसी कूलर को स्थापित करना आसान है। चार गुना चार फीट का कूलर महज 1200 से 1500 रुपये की लागत में तैयार किया जा सकता है। इसे मनचाहे आकार में बना सकते हैं। संवाद
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ऐसे काम करता है कूलर: शोधार्थी यश प्रताप सिंह ने बताया स्वदेशी कूलर में मिट्टी के पाइप, मटके, कुल्हड़ का इस्तेमाल किया जाता है। इस कूलर में पानी की दो टंकियां लगी होती हैं। नीचे वाली टंकी में भरा पानी पंप की मदद से ऊपर की टंकी में जाता है। टंकी में लगी लौहे या प्लास्टिक की पाइपों के बारीक छेद से यह पानी मिट्टी के पात्रों पर गिरता है। मिट्टी के पात्र जब गीले हो जाते हैं तो उनसे गुजरने वाली गर्म हवा ठंडी हवा में बदल जाती है। धीरे-धीरे पानी का कुछ हिस्सा मिट्टी के पाइप या इस्तेमाल किए जाने वाले पात्र से होकर वाष्प में बदल जाता है और बचा हुआ पानी वापस कूलर की नीचे वाली टंकी में पहुंच जाता है। यह क्रम लगातार चलता रहता है। स्वदेसी कूलर सीएफसी का उत्सर्जन घटाएगा :यश प्रताप सिंह ने बताया स्वदेसी कूलर हवा के प्रभाव से ठंडक पैदा करता है। स्वदेसी कूलर के इस्तेमाल से एसी पर निर्भरता कम हो सकती है। ऐसा होने से एसी से निकलने वाली हानिकारक सीएफसी (क्लोरोफ्लोरोकार्बन) का उत्सर्जन कम होगा, जो ओजोन परत के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है।
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देसी कूलर को स्थापित करना आसान है। चार गुना चार फीट का कूलर महज 1200 से 1500 रुपये की लागत में तैयार किया जा सकता है। इसे मनचाहे आकार में बना सकते हैं। संवाद
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फोटो संख्या:51- हकेंवि के वाणिज्य विभाग के शोद्यार्थियों की ओर से तैयार किया गया स्वदेसी कूल

फोटो संख्या:51- हकेंवि के वाणिज्य विभाग के शोद्यार्थियों की ओर से तैयार किया गया स्वदेसी कूल