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बिना द्रोण कैसे बनेंगे अर्जुन
ब्यूरो/अमर उजाला
Updated Sun, 28 Aug 2016 11:00 PM IST
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sports ground
महेंद्रगढ़। गांव सतनाली में न तो स्टेडियम है न ही कोई कोच है। इसके बाद भी क्षेत्र का खिलाड़ी संदीप पूनिया रियो ओलंपिक में पैदल चाल में खूब रफ्तार से चला। संदीप पूनिया ओलंपिक खेलों में खेलने वाला जिले का पहला खिलाड़ी है। दुर्भाग्य की बात है कि क्षेत्र में एक छोटा स्टेडियम भी नहीं है जिससे खिलाड़ी आकर अभ्यास कर सके। इसके बावजूद भी संदीप पूनिया अपनी मेहनत के बल पर विश्व के सबसे खेल महोत्सव ओलंपिक में जा पहुंचा।
संदीप पूनिया के गृह जिले में खेलों के प्रति सरकार का कोई ध्यान नहीं है। जिले में मात्र सात स्टेडियम और सात कोच हैं जबकि कुछेक खेलों के सामान को छोड़कर खेलों का सामान भी नहीं है। ऐसे में बिना द्रोणाचार्य कैसे अर्जुन तैैयार होंगे। यहां से जो भी खिलाड़ी नेशनल लेवल पर खेलने जाते हैं तो वे अपने दम पर जाते हैं जबकि गरीब खिलाड़ी तो रुपये और खेल सुविधाओं के अभाव में ही दम तोड़ जाते हैं। प्रदेश की खट्टर सरकार भले ही राज्य की अच्छी खेल नीति का दावा करती हो लेकिन वास्तविकता तो कुछ ओर ही है।
262 खिलाड़ी करते हैं अभ्यास
महेंद्रगढ़ जिले में न तो स्टेडियम है न ही कोच हैं। पूरे जिले में लगभग 346 पंचायतें हैं। इन पंचायतों में मात्र सात स्टेडियम और सात कोच हैं। जहां कोच हैं वहां भी सुबह और शाम खेलों का अभ्यास ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा। वर्तमान में जिले में 262 खिलाड़ी ऑन रिकार्ड इन स्टेडियम में खेलों का अभ्यास करते हैं लेकिन हकीकत यह है कि महेंद्रगढ़ स्टेडियम में एक कोच है वो भी स्टेडियम में सुबह और शाम के समय दिखाई नहीं देता। ऐसे में बिना द्रोणाचार्य कैसे अर्जुन तैयार होंगे। जबकि महेंद्रगढ़ स्टेडियम के हालात यह है कि स्टेडियम में बड़ी-बड़ी झाड़, घास, झाड़ियों आदि खड़ी हैं वहां दौड़ना तो दूर पैदल भी नहीं चला जा सकता।
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नहीं है खेलों का सामान
खेल कोच के अभाव में खेला का सामान भी स्टेडियम में उपलब्ध नही हैं। जिले के स्टेडियम में वॉलीबाल, हैंडबाल आदि का सामान ही उपलब्ध है। इसके अलावा स्टेडियम में टेबल टेनिस, लॉन टेनिस, बास्केटबॉल, हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स खेल सामान, बॉक्सिंग, क्रिकेट, बेसबॉल आदि का सामान पिछले कई वर्षों से नहीं आ रहा। गरीब तबके के खिलाड़ी तो खेल सुविधाओं के अभाव में खेलना ही बंद कर देते हैं जबकि आर्थिक रूप से सम्पन्न बच्च स्वयं के खर्चे पर खेलते हैं।
बिना महिला कोच कैसे तैयार हों ‘साक्षी-सिंधु’
जिले में मात्र एक महिला एथलेटिक्स कोच हैं इसके अलावा न तो कुश्ती तथा न ही बैडमिंटन का कोई कोच है। ऐसे में जिले की महिला खिलाड़ी साक्षी और सिंधु कैसे बन पाएंगी, जबकि यहां की महिला खिलाड़ी नेशनल लेवल पर जीत का परचम लहरा चुकी हैं।
पांच खेलों में सिमटा पूरा जिला
जिले में 2 कोच वालीबॉल के, 2 कुश्ती, 1 एथलेटिक्स, 1 हॉकी तथा 1 योगा का कोच है। इसके अलावा कोई कोच नहीं हैं। पूरा जिला कुल पांच खेलों पर ही सिमट कर रह गया है। जरूरत की मुताबिक जितने भी खेल हैं उसका एक कोच अवश्य होना चाहिए। जिले में सात स्टेडियम हैं जिनमें पांच राजीव गांधी खेल स्टेडियम तथा एक महेंद्रगढ़ तथा एक नारनौल में स्टेडियम हैं।
इस संबंध में रियो ओलंपिक खिलाड़ी संदीप पूनिया ने कहा कि खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं हैं। अगर सरकार इस क्षेत्र में खेलों पर ध्यान दे तो यहां से अनेकों संदीप ओलंपिक के लिए जा सकते हैं। यहां बहुत से ऐसे खिलाड़ी हैं जो बिना गाइड लाइन के आगे नहीं बढ़ पाते। अगर उनको अनुभवी कोच और अच्छी खेल सुविधा मिल जाएं तो वो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल सकते हैं।
इस संबंध में डीएसओ जय सिंह पिलानियां ने बताया कि खेलों के सामान के बारे में सरकार को अवगत करवाया गया है तथा कोच की कमी के बारे में भी बताया गया है जैसे ही खेल का सामान आएगा तो वो खिलाड़ियों को प्रदान करवा देंगे।
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संदीप पूनिया के गृह जिले में खेलों के प्रति सरकार का कोई ध्यान नहीं है। जिले में मात्र सात स्टेडियम और सात कोच हैं जबकि कुछेक खेलों के सामान को छोड़कर खेलों का सामान भी नहीं है। ऐसे में बिना द्रोणाचार्य कैसे अर्जुन तैैयार होंगे। यहां से जो भी खिलाड़ी नेशनल लेवल पर खेलने जाते हैं तो वे अपने दम पर जाते हैं जबकि गरीब खिलाड़ी तो रुपये और खेल सुविधाओं के अभाव में ही दम तोड़ जाते हैं। प्रदेश की खट्टर सरकार भले ही राज्य की अच्छी खेल नीति का दावा करती हो लेकिन वास्तविकता तो कुछ ओर ही है।
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262 खिलाड़ी करते हैं अभ्यास
महेंद्रगढ़ जिले में न तो स्टेडियम है न ही कोच हैं। पूरे जिले में लगभग 346 पंचायतें हैं। इन पंचायतों में मात्र सात स्टेडियम और सात कोच हैं। जहां कोच हैं वहां भी सुबह और शाम खेलों का अभ्यास ठीक ढंग से नहीं हो पा रहा। वर्तमान में जिले में 262 खिलाड़ी ऑन रिकार्ड इन स्टेडियम में खेलों का अभ्यास करते हैं लेकिन हकीकत यह है कि महेंद्रगढ़ स्टेडियम में एक कोच है वो भी स्टेडियम में सुबह और शाम के समय दिखाई नहीं देता। ऐसे में बिना द्रोणाचार्य कैसे अर्जुन तैयार होंगे। जबकि महेंद्रगढ़ स्टेडियम के हालात यह है कि स्टेडियम में बड़ी-बड़ी झाड़, घास, झाड़ियों आदि खड़ी हैं वहां दौड़ना तो दूर पैदल भी नहीं चला जा सकता।
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नहीं है खेलों का सामान
खेल कोच के अभाव में खेला का सामान भी स्टेडियम में उपलब्ध नही हैं। जिले के स्टेडियम में वॉलीबाल, हैंडबाल आदि का सामान ही उपलब्ध है। इसके अलावा स्टेडियम में टेबल टेनिस, लॉन टेनिस, बास्केटबॉल, हॉकी, फुटबॉल, एथलेटिक्स खेल सामान, बॉक्सिंग, क्रिकेट, बेसबॉल आदि का सामान पिछले कई वर्षों से नहीं आ रहा। गरीब तबके के खिलाड़ी तो खेल सुविधाओं के अभाव में खेलना ही बंद कर देते हैं जबकि आर्थिक रूप से सम्पन्न बच्च स्वयं के खर्चे पर खेलते हैं।
बिना महिला कोच कैसे तैयार हों ‘साक्षी-सिंधु’
जिले में मात्र एक महिला एथलेटिक्स कोच हैं इसके अलावा न तो कुश्ती तथा न ही बैडमिंटन का कोई कोच है। ऐसे में जिले की महिला खिलाड़ी साक्षी और सिंधु कैसे बन पाएंगी, जबकि यहां की महिला खिलाड़ी नेशनल लेवल पर जीत का परचम लहरा चुकी हैं।
पांच खेलों में सिमटा पूरा जिला
जिले में 2 कोच वालीबॉल के, 2 कुश्ती, 1 एथलेटिक्स, 1 हॉकी तथा 1 योगा का कोच है। इसके अलावा कोई कोच नहीं हैं। पूरा जिला कुल पांच खेलों पर ही सिमट कर रह गया है। जरूरत की मुताबिक जितने भी खेल हैं उसका एक कोच अवश्य होना चाहिए। जिले में सात स्टेडियम हैं जिनमें पांच राजीव गांधी खेल स्टेडियम तथा एक महेंद्रगढ़ तथा एक नारनौल में स्टेडियम हैं।
इस संबंध में रियो ओलंपिक खिलाड़ी संदीप पूनिया ने कहा कि खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं हैं। अगर सरकार इस क्षेत्र में खेलों पर ध्यान दे तो यहां से अनेकों संदीप ओलंपिक के लिए जा सकते हैं। यहां बहुत से ऐसे खिलाड़ी हैं जो बिना गाइड लाइन के आगे नहीं बढ़ पाते। अगर उनको अनुभवी कोच और अच्छी खेल सुविधा मिल जाएं तो वो भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल सकते हैं।
इस संबंध में डीएसओ जय सिंह पिलानियां ने बताया कि खेलों के सामान के बारे में सरकार को अवगत करवाया गया है तथा कोच की कमी के बारे में भी बताया गया है जैसे ही खेल का सामान आएगा तो वो खिलाड़ियों को प्रदान करवा देंगे।