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नवरात्र के चौथे दिन माता कूष्मांडा की होगी पूजा : भारद्वाज
Mon, 07 Oct 2024 01:44 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Mon, 07 Oct 2024 01:44 AM IST
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फोटो संख्या:54- पंडित राहुल भारद्वाज--संवाद
महेंद्रगढ़। नवरात्र के चौथे दिन मां दुर्गा के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की पूजा की जाती है। शनिवार व रविवार दो दिन तृतीया तिथि होने के कारण सोमवार को चतुर्थी तिथि रहेगी। सोमवार को मां के चतुर्थ रूप कूष्मांडा की पूजा आराधना की जाएगी।
ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल भारद्वाज ने बताया कि देवी कूष्मांडा आदिशक्ति का वह स्वरूप है, जिनकी मंद मुस्कान से इस सृष्टि ने सांस लेना आरंभ किया, यानी इस सृष्टि का आरंभ किया। देवी कूष्मांडा का निवास स्थान सूर्यमंडल के बीच में माना जाता है। देवी का तेज ही इस संसार को तेज बल और प्रकाश प्रदान करता है। जब सृष्टि में चारों तरफ अंधकार फैला था। उस समय देवी ने जगत की उत्पत्ति की इच्छा से मंद मुस्कान किया। इस सृष्टि में अंधकार का नाश और सृष्टि में प्रकाश फैल गया था। उन्होंने बताया कि कूष्मांडा का अर्थ कुम्हड़ और बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है।
इस कारण से भी मां का कूष्मांडा पड़ा था। कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष- बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कुष्मांडा को पेठा सबसे प्रिय है। इसलिए इनकी पूजा में पेठा का भोग लगाना चाहिए।इ सके साथ ही माता को मालपुए और दही हलवे का भी भोग लगाना चाहिए। मां कुष्मांडा की पूजा में उपासकों को व्रत करने वाले लोगों को पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करनी चाहिए। मां की पूजा में पीले वस्त्र, पीले फल, पीली मिठाई और पीले फूल भी अर्पित करने चाहिए। माता के बीज मंत्र कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम: का जप करना चाहिए।
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ज्योतिषाचार्य पंडित राहुल भारद्वाज ने बताया कि देवी कूष्मांडा आदिशक्ति का वह स्वरूप है, जिनकी मंद मुस्कान से इस सृष्टि ने सांस लेना आरंभ किया, यानी इस सृष्टि का आरंभ किया। देवी कूष्मांडा का निवास स्थान सूर्यमंडल के बीच में माना जाता है। देवी का तेज ही इस संसार को तेज बल और प्रकाश प्रदान करता है। जब सृष्टि में चारों तरफ अंधकार फैला था। उस समय देवी ने जगत की उत्पत्ति की इच्छा से मंद मुस्कान किया। इस सृष्टि में अंधकार का नाश और सृष्टि में प्रकाश फैल गया था। उन्होंने बताया कि कूष्मांडा का अर्थ कुम्हड़ और बलियों में कुम्हड़े की बलि इन्हें सर्वाधिक प्रिय है।
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इस कारण से भी मां का कूष्मांडा पड़ा था। कूष्मांडा देवी की आठ भुजाएं हैं, जिनमें कमंडल, धनुष- बाण, कमल पुष्प, शंख, चक्र, गदा और सभी सिद्धियों को देने वाली जपमाला है। मां के पास इन सभी चीजों के अलावा हाथ में अमृत कलश भी है। इनका वाहन सिंह है और इनकी भक्ति से आयु, यश और आरोग्य की वृद्धि होती है। मां कुष्मांडा को पेठा सबसे प्रिय है। इसलिए इनकी पूजा में पेठा का भोग लगाना चाहिए।इ सके साथ ही माता को मालपुए और दही हलवे का भी भोग लगाना चाहिए। मां कुष्मांडा की पूजा में उपासकों को व्रत करने वाले लोगों को पीले रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करनी चाहिए। मां की पूजा में पीले वस्त्र, पीले फल, पीली मिठाई और पीले फूल भी अर्पित करने चाहिए। माता के बीज मंत्र कुष्मांडा: ऐं ह्री देव्यै नम: का जप करना चाहिए।
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