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Mahendragarh-Narnaul News: बच्चों को ड्रेस खरीदने के लिए विवश किया जाता है
Thu, 10 Apr 2025 11:45 PM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Thu, 10 Apr 2025 11:45 PM IST
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फोटो नंबर-13एक दुकान में रखी निजी स्कूल की ड्रेस। संवाद
नारनौल। शहर में चल रहे निजी स्कूलों में जहां किताब व फीस का भारी भरकम बोझ अभिभावकों पर पड़ता है। वहीं निजी स्कूलों में ड्रेस में भी मोटा कमीशन का खेल खेला जा रहा है।
शहर में चल रहे ज्यादातर निजी स्कूल अपने पास से ही बच्चों को ड्रेस देते हैं। इसमें सबसे बड़ी बात तो यह है कि एक ही स्कूल में दो-तीन तरह की सर्दी व गर्मी के हिसाब से ड्रेस है। सभी बच्चों को खरीदने के लिए विवश किया जाता है। स्कूल जो ड्रेस दी जाती है, वह बाजार में आधे से भी कम भाव में मिल जाती है, लेकिन उस पर स्कूल का नाम नहीं होने के कारण पहनने नहीं दी जाती।
निजी स्कूलों में बाकी खर्च के साथ ड्रेस का खर्च भी अभिभावकों पर बहुत भारी पड़ता है। स्कूलों में किताबें बेचने के अलावा हर दूसरे साल निजी स्कूल संचालक यूनिफार्म का रंग भी बदल देते हैं। इस कारण अभिभावकों को नए यूनिफार्म, जूते, जुराब खरीदने पड़ते हैं। यही नहीं निजी स्कूलों की मनमानी की वजह से दो ड्रेस लेनी पड़ती है। एक यूनिफार्म सोमवार, मंगलवार, वीरवार और शुक्रवार को चलती है तो दूसरी यूनिफार्म बुधवार और शनिवार को पहनकर जानी होती है। यह यूनिफार्म खास तौर पर स्पोर्ट्स यूनिफार्म होती है। इन दोनों यूनिफार्म को खरीदने के लिए अभिभावकों को मजबूर किया जाता है। इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर आता है। स्कूल ड्रेस को लेकर कुछ स्कूलों ने अपनी दुकानें भी तय की हुई जिनकी ड्रेस केवल वहीं मिलती हैं।
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शिक्षा मंत्रालय की तरफ सभी डीईओ और डीईईओ को निर्देश दिया है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में यूनिफॉर्म व अनावश्यक किताबें जैसी अन्य चीजें खरीदने के लिए मजबूर करने वाले स्कूल के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करें। किसी भी स्कूल द्वारा अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ नहीं डाला जाए।
इंसेट
सर्दियाें में स्वेटर व ब्लेजर करते हैं अनिवार्य
अभिभावकों को गर्मियों में दाखिले के समय ड्रेस खरीदने के बाद सर्दियों में ब्लेजर व हॉफ बाजू की स्वेटर खरीदने के लिए मजबूर किया जाता हैं। स्वेटर, ब्लेजर के रंग बदलने के कारण अभिभावकों को नया लेना पड़ता है। एक यूनिफार्म यानी पैंट और शर्ट ही 1500 से 2000 रुपये में पड़ती है, जो ब्लेजर बाजार में 1000 रुपये में आ जाता निजी स्कूल उस पर केवल अपना नाम लिखवा कर दो से अढ़ाई हजार रुपये ले रहे हैं। इसके अलावा टाई, बेल्ट, जूते और जुराब अलग से लेने पड़ते हैं।
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शहर में चल रहे ज्यादातर निजी स्कूल अपने पास से ही बच्चों को ड्रेस देते हैं। इसमें सबसे बड़ी बात तो यह है कि एक ही स्कूल में दो-तीन तरह की सर्दी व गर्मी के हिसाब से ड्रेस है। सभी बच्चों को खरीदने के लिए विवश किया जाता है। स्कूल जो ड्रेस दी जाती है, वह बाजार में आधे से भी कम भाव में मिल जाती है, लेकिन उस पर स्कूल का नाम नहीं होने के कारण पहनने नहीं दी जाती।
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निजी स्कूलों में बाकी खर्च के साथ ड्रेस का खर्च भी अभिभावकों पर बहुत भारी पड़ता है। स्कूलों में किताबें बेचने के अलावा हर दूसरे साल निजी स्कूल संचालक यूनिफार्म का रंग भी बदल देते हैं। इस कारण अभिभावकों को नए यूनिफार्म, जूते, जुराब खरीदने पड़ते हैं। यही नहीं निजी स्कूलों की मनमानी की वजह से दो ड्रेस लेनी पड़ती है। एक यूनिफार्म सोमवार, मंगलवार, वीरवार और शुक्रवार को चलती है तो दूसरी यूनिफार्म बुधवार और शनिवार को पहनकर जानी होती है। यह यूनिफार्म खास तौर पर स्पोर्ट्स यूनिफार्म होती है। इन दोनों यूनिफार्म को खरीदने के लिए अभिभावकों को मजबूर किया जाता है। इसका सीधा असर अभिभावकों की जेब पर आता है। स्कूल ड्रेस को लेकर कुछ स्कूलों ने अपनी दुकानें भी तय की हुई जिनकी ड्रेस केवल वहीं मिलती हैं।
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शिक्षा मंत्रालय की तरफ सभी डीईओ और डीईईओ को निर्देश दिया है कि वह अपने अधिकार क्षेत्र में यूनिफॉर्म व अनावश्यक किताबें जैसी अन्य चीजें खरीदने के लिए मजबूर करने वाले स्कूल के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करें। किसी भी स्कूल द्वारा अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ नहीं डाला जाए।
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सर्दियाें में स्वेटर व ब्लेजर करते हैं अनिवार्य
अभिभावकों को गर्मियों में दाखिले के समय ड्रेस खरीदने के बाद सर्दियों में ब्लेजर व हॉफ बाजू की स्वेटर खरीदने के लिए मजबूर किया जाता हैं। स्वेटर, ब्लेजर के रंग बदलने के कारण अभिभावकों को नया लेना पड़ता है। एक यूनिफार्म यानी पैंट और शर्ट ही 1500 से 2000 रुपये में पड़ती है, जो ब्लेजर बाजार में 1000 रुपये में आ जाता निजी स्कूल उस पर केवल अपना नाम लिखवा कर दो से अढ़ाई हजार रुपये ले रहे हैं। इसके अलावा टाई, बेल्ट, जूते और जुराब अलग से लेने पड़ते हैं।