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Mahendragarh-Narnaul News: दाखिले के साथ पुस्तकों व वर्दी के खर्च कर रहा अभिभावकों की जेब ढीली
Mon, 07 Apr 2025 12:17 AM IST
रोहतक ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
Updated Mon, 07 Apr 2025 12:17 AM IST
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महेंद्रगढ़। नए शैक्षणिक सत्र की शुरूआत हो चुकी है। इसी के साथ बच्चों की किताबें व वर्दी का खर्च भी बढ़ने से अभिभावकों की जेब ढीली होने लगी है।
निजी स्कूलों में नया सत्र शुरू होते ही ड्रेस, जूता, टाई-बेल्ट, किताबें पाठ्यक्रम के नाम पर कमीशन का खेल जारी है। जिले में 400 निजी स्कूल हैं। इनमें से करीब 80 संस्थान बड़े स्तर चलते हैं, जिनमें हजारों बच्चे होते हैं। बेहतर शिक्षा के नाम पर अभिभावकों को स्कूल ड्रेस से लेकर किताबें व टाई-बेल्ट भी निजी स्कूलों के अनुसार ही खरीदनी पड़ती हैं। साथ ही करीब 300 ऐसी संस्थाएं हैं जिनमें बच्चों की संख्या सीमित है।
अधिकांश बड़े स्कूलाें में किताबों से लेकर ड्रेस, टाई बेल्ट, जूते जुराब तक भी स्कूलाें के अंदर बनी दुकानों से ही उपलब्ध कराई जा रही हैं। इन स्कूलों पर जिला प्रशासन का कोई अंकुश नहीं है। निजी स्कूलों की ओर से बड़े स्तर पर किसी विशेष फर्म से ड्रेस तैयार कराई जाती हैं। इस पर स्कूल का लोगो लगा होता है। इसका भार भी अभिभावकों को ही उठाना पड़ रहा है।
अभिभावकों का कहना कि निजी स्कूलाें की ओर से निर्धारित पाठ्यक्रम की किताबें पहली कक्षा की करीब एक से दो हजार रुपये की होती हैं। इसके बाद कक्षा के हिसाब से यह कीमत बढ़ती जाती है जो आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते 9 से 10 हजार रुपये तक हो जाती है। इसमें भी बाजार में मिलने वाले कपड़ों से इस ड्रेस की कीमत दोगुना होती है। मजबूरी में खरीदना पड़ता है। बाजारों में पहली कक्षा की किताबें 500 रुपये हैं। इसके बाद दसवीं की तीन से चार हजार रुपये की है।
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गरीब बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो रहा है। गरीब विद्यार्थी पढ़ने की उम्मीद कर सकता है, लेकिन पढ़ नहीं सकता। स्कूलों में ऐसा है कि हर वर्ष पाठ्यक्रम बदल देते है। सरकार से मांग है कि समान शिक्षा के नियम बनाए।- अभिभावक सोहनलाल
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अभिभावकों पर निजी स्कूलों की फीस का बोझ बढ़ रहा है। अभिभावकों को भ्रमित किया जा रहा है। महंगी किताबें खरीदने का मजबूर हैं। सरकार से मांग है कि ऐसा नियम बनाए ताकि बच्चों की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। - अभिभावक घनश्याम दास
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निजी स्कूलों में नया सत्र शुरू होते ही ड्रेस, जूता, टाई-बेल्ट, किताबें पाठ्यक्रम के नाम पर कमीशन का खेल जारी है। जिले में 400 निजी स्कूल हैं। इनमें से करीब 80 संस्थान बड़े स्तर चलते हैं, जिनमें हजारों बच्चे होते हैं। बेहतर शिक्षा के नाम पर अभिभावकों को स्कूल ड्रेस से लेकर किताबें व टाई-बेल्ट भी निजी स्कूलों के अनुसार ही खरीदनी पड़ती हैं। साथ ही करीब 300 ऐसी संस्थाएं हैं जिनमें बच्चों की संख्या सीमित है।
अधिकांश बड़े स्कूलाें में किताबों से लेकर ड्रेस, टाई बेल्ट, जूते जुराब तक भी स्कूलाें के अंदर बनी दुकानों से ही उपलब्ध कराई जा रही हैं। इन स्कूलों पर जिला प्रशासन का कोई अंकुश नहीं है। निजी स्कूलों की ओर से बड़े स्तर पर किसी विशेष फर्म से ड्रेस तैयार कराई जाती हैं। इस पर स्कूल का लोगो लगा होता है। इसका भार भी अभिभावकों को ही उठाना पड़ रहा है।
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अभिभावकों का कहना कि निजी स्कूलाें की ओर से निर्धारित पाठ्यक्रम की किताबें पहली कक्षा की करीब एक से दो हजार रुपये की होती हैं। इसके बाद कक्षा के हिसाब से यह कीमत बढ़ती जाती है जो आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते 9 से 10 हजार रुपये तक हो जाती है। इसमें भी बाजार में मिलने वाले कपड़ों से इस ड्रेस की कीमत दोगुना होती है। मजबूरी में खरीदना पड़ता है। बाजारों में पहली कक्षा की किताबें 500 रुपये हैं। इसके बाद दसवीं की तीन से चार हजार रुपये की है।
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गरीब बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो रहा है। गरीब विद्यार्थी पढ़ने की उम्मीद कर सकता है, लेकिन पढ़ नहीं सकता। स्कूलों में ऐसा है कि हर वर्ष पाठ्यक्रम बदल देते है। सरकार से मांग है कि समान शिक्षा के नियम बनाए।- अभिभावक सोहनलाल
अभिभावकों पर निजी स्कूलों की फीस का बोझ बढ़ रहा है। अभिभावकों को भ्रमित किया जा रहा है। महंगी किताबें खरीदने का मजबूर हैं। सरकार से मांग है कि ऐसा नियम बनाए ताकि बच्चों की पढ़ाई पर कोई असर न पड़े। - अभिभावक घनश्याम दास