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आवेदन को तीन साल चक्कर लगाने के बाद भी नहीं मिली जानकारी

Sun, 04 Sep 2022 11:57 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sun, 04 Sep 2022 11:57 PM IST
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After three years neither the information was received nor the amount of damages
मंडी अटेली। जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत गांव खेड़ी निवासी सतेंद्र यादव ने 14 अगस्त 2019 को अटेली बीडीपीओ कार्यालय से डस्टबिन की खरीद और उसे लगाने के संबंध में जानकारी मांगी थी। सूचना न देने पर सूचना आयुक्त चंद्रप्रकाश ने सरपंच व ग्राम सचिव पर 25 हजार रुपये जुर्माना लगाया था और आवेदनकर्ता को सूचना देने के साथ ही दो हजार रुपये हर्जाना देने का आदेश भी दिया था। तीन साल बीतने के बाद भी न तो आवेदक को सूचना मिली और न ही हर्जाने की धनराशि ही गई। विभाग ने आवेदनकर्ता को पत्र देकर जवाब दिया गया कि आपके द्वारा मांगी गई जानकारी कार्यालय रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं है।
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बता दें कि गांव खेड़ी निवासी युवक सतेंद्र यादव ने 14 अगस्त 2019 जनसूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत गांव कांटी के सरपंच से प्रशासनिक कार्यकाल में कुल कितने डस्टबिन की खरीद की गई तथा डस्टबिन कहां-कहां पर रखे गए। डस्टबिन संबंधित खरीद प्रस्ताव, खरीद बिल कोटेशन, स्टोक रजिस्टर, कैश बुक, पास बुक, वोच्चर फाइल, डस्टबिन खरीद संबंधित सरकार के दिशा निर्देश, सरकार द्वारा निर्धारित रेट, वजन, साइज व जवाबदेही संबंधित सत्यापित दस्तावेज मांगे थे, लेकिन सरपंच ने जन सूचना अधिकार अधिनियम के नियमों को ताक पर रखा और आवेदनकर्ता को जानकारी नहीं दी। इसके बाद आवेदनकर्ता सतेंद्र यादव ने 18 सितंबर 2019 को बीडीपीओ अटेली नांगल को प्रथम अपील करते हुए जानकारी दिलाने का आवेदन किया। बीडीपीओ कार्यालय द्वारा सरपंच को दो बार बुलाया गया, लेकिन सरपंच ने जानकारी देना तो दूर खंड कार्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना भी जरूरी नहीं समझा। इसके बाद नियमानुसार आवेदनकर्ता सतेंद्र यादव ने द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग चंडीगढ़ में कर दी। जानकारी के अनुसार 13 अप्रैल 2021 को भी सरपंच ने राज्य सूचना आयोग के कार्यालय नहीं पहुंचा तथा इसके बाद भी तत्कालीन सरपंच ने चंडीगढ़ स्थित राज्य सूचना आयोग के समक्ष पेश नहीं हुए तो सूचना आयुक्त चंद्रप्रकाश ने सरपंच व ग्राम सचिव पर पच्चीस हजार रुपये जुर्माना लगाया गया तथा बाकि जानकारी आवेदनकर्ता को देने के आदेश दिए थे। साथ ही आवेदनकर्ता को दो हजार रुपये हर्जाना देने के आदेश भी दिये थे, लेकिन 3 साल तक प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष चक्कर लगाने के बाद भी आवदेन के हाथ कुछ नहीं लगा। जो आवेदनकर्ता के लिए चिंताजनक है।
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