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Mahendragarh-Narnaul News: फैसला समझ आए, तभी तो न्याय कहलाए
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फोटो 4 न्यायालयों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के प्रयासों के लिए सर्वोच्च न्यायालय क
नारनौल। न्याय केवल अदालत के फैसले का नाम नहीं है। असली न्याय तब है, जब फैसला उस व्यक्ति को भी समझ आए जिसके जीवन पर उसका असर पड़ता है। यही सवाल नारनौल के वकील मनीष वशिष्ठ लंबे समय से उठा रहे हैं। उनका प्रयास अदालतों में हिंदी के इस्तेमाल को बढ़ाने का है। इस दिशा में उन्हें मिली एक उपलब्धि इस बहस को और मजबूत करती है।
मनीष ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से अंग्रेजी में दिए गए एक फैसले का हिंदी अनुवाद हासिल किया। अंग्रेजी में 67 पेज के इस फैसले का हिंदी अनुवाद 114 पेज में हाथ से लिखकर उपलब्ध कराया गया। उनके अनुसार, वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हाईकोर्ट से इस तरह किसी फैसले का हिंदी अनुवाद प्राप्त किया है।
यह उपलब्धि अचानक नहीं मिली। इसके पीछे लंबा प्रयास है। वशिष्ठ ने अधीनस्थ अदालत में फैसला हिंदी में उपलब्ध कराने की मांग की थी। उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि अदालत के पास अनुवादक नहीं है और वह स्वयं वकील हैं, इसलिए अंग्रेजी समझ सकते हैं। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
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यह मामला सिर्फ एक अनुवाद तक सीमित नहीं है। यह अदालत और आम आदमी के बीच भाषा की दूरी का सवाल है। अंग्रेजी में लिखे फैसले कई बार मुवक्किल के लिए कठिन होते हैं। वह अपने ही मामले में अदालत ने क्या कहा, इसे पूरी तरह समझ नहीं पाता। ऐसे में हिंदी में फैसला मिलना उसके लिए बड़ी राहत हो सकती है।
फिर भी वशिष्ठ इसे पूरी जीत नहीं मानते। उनका कहना है कि अदालतों में पूरी तरह हिंदी में कामकाज के लिए लंबा रास्ता तय करना बाकी है। संवाद
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मनीष ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से अंग्रेजी में दिए गए एक फैसले का हिंदी अनुवाद हासिल किया। अंग्रेजी में 67 पेज के इस फैसले का हिंदी अनुवाद 114 पेज में हाथ से लिखकर उपलब्ध कराया गया। उनके अनुसार, वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने हाईकोर्ट से इस तरह किसी फैसले का हिंदी अनुवाद प्राप्त किया है।
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यह उपलब्धि अचानक नहीं मिली। इसके पीछे लंबा प्रयास है। वशिष्ठ ने अधीनस्थ अदालत में फैसला हिंदी में उपलब्ध कराने की मांग की थी। उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी गई कि अदालत के पास अनुवादक नहीं है और वह स्वयं वकील हैं, इसलिए अंग्रेजी समझ सकते हैं। इसके बाद उन्होंने इस फैसले को चुनौती दी। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की अदालत ने हिंदी अनुवाद उपलब्ध कराने का आदेश दिया।
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यह मामला सिर्फ एक अनुवाद तक सीमित नहीं है। यह अदालत और आम आदमी के बीच भाषा की दूरी का सवाल है। अंग्रेजी में लिखे फैसले कई बार मुवक्किल के लिए कठिन होते हैं। वह अपने ही मामले में अदालत ने क्या कहा, इसे पूरी तरह समझ नहीं पाता। ऐसे में हिंदी में फैसला मिलना उसके लिए बड़ी राहत हो सकती है।
फिर भी वशिष्ठ इसे पूरी जीत नहीं मानते। उनका कहना है कि अदालतों में पूरी तरह हिंदी में कामकाज के लिए लंबा रास्ता तय करना बाकी है। संवाद