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Mahendragarh-Narnaul News: पेट्रोलिंग के दौरान शहीद हुए अकबरपुर के लाल, सैन्य सम्मान के साथ हुआ अंतिम संस्कार

Sat, 10 Jan 2026 11:08 PM IST
Rohtak Bureau रोहतक ब्यूरो
Updated Sat, 10 Jan 2026 11:08 PM IST
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A soldier from Akbarpur was martyred during a patrol; his last rites were performed with full military honors.
फोटो 3शहीद को सलामी देते जवान।संवाद
नांगल चौधरी। उत्तरी कश्मीर के जिला बारामुला में शुक्रवार शाम गश्त के दौरान एक दुर्गम पहाड़ी से गिरकर भारतीय सेना की विशेष आतंकवाद विरोधी इकाई राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात सूबेदार हीरालाल की शहादत हो गई। जैसे ही शहीद का पार्थिव शरीर शनिवार को तिरंगे में लिपटकर पैतृक गांव अकबरपुर पहुंचा तो पूरा गांव गमगीन हो उठा।
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शहीद जवान के अंतिम दर्शन के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा। गांव के युवाओं ने हाथों में तिरंगा लेकर मोटर साइकिलों पर भव्य तिरंगा यात्रा निकाली और भारत माता की जय व शहीद हीरालाल अमर रहें के नारों से पूरा गांव गूंज उठा। इसके बाद पूरे सैन्य सम्मान और भावभीनी विदाई के साथ शहीद का अंतिम संस्कार किया गया। वहीं प्रशासनिक अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। शहीद के अंतिम संस्कार में पूरे गांव के साथ नांगल चौधरी विधायक मंजू चौधरी व डीएसपी सुरेश कुमार काफी संख्या में लोग मौजूद रहे।
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जानकारी के अनुसार, सूबेदार हीरालाल 9 जनवरी को अपने साथियों के साथ एक बेहद संवेदनशील और दुर्गम पहाड़ी इलाके में नियमित पेट्रोलिंग पर थे। बर्फबारी के चलते फिसलन भरे संकरे रास्ते पर अचानक संतुलन बिगड़ने के कारण वे गहरी खाई में जा गिरे। इस दुखद हादसे में उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
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शहीद हीरालाल को बेटे ने दी मुखाग्नि
शहीद हीरालाल को बेटे गजेंद्र ने मुखाग्नि दी। हीरालाल के 90 वर्षीय पिता हरिराम गांव में रहते हैं और हार्ट के मरीज हैं। बेटे की शहादत की खबर से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। पत्नी रोशनी देवी गृहिणी हैं। बेटा गजेंद्र आईआईटी पुणे में पढ़ाई कर रहे हैं और बेटी स्नेहलता दिल्ली में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही हैं। शहीद का बेटा गजेंद्र बोला उसे अपने पापा पर गर्व हैं। जिस तरह उसके पापा ने देश की सेवा की है उसी तरह वह भी किसी तरह देश के काम आ सकें।


25 साल देश के नाम, आखिरी सलामी गांव में

27 अप्रैल 1981 को जन्मे हीरालाल ने 30 जनवरी 2000 को सेना की वर्दी पहन ली थी। उस दिन से लेकर आखिरी सांस तक उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। जम्मू-कश्मीर जैसे कठिन इलाकों में वर्षों तक डटे रहे। अनुशासन और साहस उनकी पहचान थी। उनकी काबिलियत और अनुभव का सम्मान करते हुए 23 मई 2023 को उन्हें सूबेदार के पद पर पदोन्नत किया गया।
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