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पीने लायक नहीं बचा जिला का भूमिगत पेयजल
Updated Mon, 19 Mar 2018 12:52 AM IST
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पीने लायक नहीं बचा जिले का भूमिगत पेयजल
नारनौल। नारनौल शहर सहित उपमंडल के अनेक गांवों में ट्यूबवेलों से आपूर्ति किए जाने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक होने से पीने लायक नहीं रहा है। लेकिन मजबूरी में लोग इस हानिकारक पानी को पी रहे हैं। इस पानी के लगातार सेवन से क्षेत्र के लोगों को दांतो, हड्डियों व जोड़ों की विभिन्न असाध्य बीमारियों से जूझना पड़ रहा है। हाल ही में स्वास्थ्य विभाग ने इसके लिए फिर से गाइड लाइन जारी कर लोगों को भूमिगत पेयजल पीने से मना किया है।
नारनौल शहर के अलावा आसपास के करीब तीस से अधिक गांवों में फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम से अधिक है, जो सेवन के लिए खतरनाक मानी जाती है। वहीं आठ गांवों में तो यह मात्रा पांच मिलीग्राम से भी अधिक हो गई है। जो बहुत ही खतरनाक है।
धीमा जहर है फ्लोराइड युक्त पानी
चिकित्सकों के अनुसार फ्लोराइड युक्त पानी के लगातार सेवन से यह पानी लोगों के लिए धीमा जहर जैसा साबित हो रहा है। वैसे तो स्वास्थ्य विभाग भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है, क्योंकि विभाग द्वारा स्वयं भी पानी में फ्लोराइड की मात्रा की समय-समय पर जांच कराई जाती है। बावजूद स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न कराकर विभाग ने यहां के लोगों के स्वास्थ्य को भगवान भरोसे छोड़ रखा है। चिकित्सकों के अनुसार पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा प्रति लीटर एक मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद नारनौल शहर तथा आसपास के गांवों के भूमिगत जल में पाई जाने वाली फ्लोराइड की मात्रा का प्रतिशत काफी अधिक व चौंकाने वाला है।
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क्या होता है फ्लोराइड होने से
फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से दांतों में पीलापन, हड्डियों में टेढ़ापन, जोड़ों में दर्द तथा अकड़न के अलावा अनिमिया, अब्रोसन, नपुंसकता व बच्चों का आई क्यू कम हो जाता है। दंत चिकित्सक डा. गजराज के अनुसार फ्लोराइड की मात्रा पानी में अधिक होने से दांतों व शरीर में हो अनेक बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए इससे बचाना भी बहुत जरूरी है। वहीं डा. सुरेंद्र यादव का कहना है कि पेयजल में पाई जा रही फ्लोराइड व टीडीएस की अत्यधिक मात्रा के कारण यहां के लोगों में दांतों की बीमारियों के अलावा हड्डियों तथा जोड़ों के रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।
समय-समय पर विभाग द्वारा फ्लोराइड की मात्रा की जांच की जाती है। इसके अलावा इसको रोकने के उपाय भी विभाग द्वारा किए जाते हैं। पानी को शुद्ध करने लिए आरओ व केनाल बेस वाटर सप्लाई सबसे उपयुक्त उपाय है।
गोपाल सिंह, एसडीओ जनस्वास्थ्य विभाग
10 फीसदी बच्चे फ्लोरोसिस से प्रभावित
स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा जिले के गांवों से भूमिगत जल के नमूने लिए जा रहे हैं। इसके अलावा प्राथमिक पाठशालाओं में तीसरी से पांचवीं कक्षा के बच्चों में दंत फ्लोरेसिस की जांच की जा रही है। अभी तक की गई जांच के अनुसार लगभग दस प्रतिशत बच्चे दंत फ्लोरोसिस बीमारी से प्रभावित पाएं गए हैं।
फ्लोरोसिस के कारण व बचाव
पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा का अधिक होना, काला नमक व अधिक फ्लोराईड युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन, तंबाकू/सुपारी व बिना दूध की चाय का सेवन, अधिक फ्लोराईड युक्त दंत मंजन के इस्तेमाल से भी फ्लोरोसिस बीमारी होती है। इससे बचाव के लिए पीन के लिए आरओ या नहरी पानी व बरसाती जल इस्तेमाल करें। दूध, दही, हरी सब्जी का सेवन करें। खट्टे फलों तथा विटामिन सी व डी युक्त भोजन के सेवन से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
इन गांवों में है फ्लोराइड की मात्रा
गांव 2013 पीपीएम 2017 पीपीएम
कांवी 3.1 7.8
मुरारीपुर 6.2 8.5
मुलोदी 4.2 10.7
भुगांरका 5.4 7.2
भोजावास 5.6 6.4
रघुनाथपुरा 4.5 4.7
ढाणी किरारोद 4.9 5.8
फैजाबाद 5.4 7.6
मित्रपुरा 4.5 6.0
कुकसी 0.8 3.8
रामपुरा 3.3 6.8
डेरोली जाट 1.0 6.7
निम्भेहडा 4.1 4.3
अटाली 1.5 6.4
झूक 1.1 4.0
पाली 3.3 4.9
पालडी पनीहार 2.1 3.4
फ्लोराइड की अधिकता के कारण लोगों में फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो रही है। भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार पीने के पानी में फ्लोराइड की सुरक्षित मात्रा 1.5 पीपीएम बताई गई है। इससे अधिक मात्रा में यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रहा है। जिससे लोगों में दांतों, हड्डियों तथा पेट संबंधित बीमारियां हो रही हैं।
-डा. इंद्रजीत धनखड़, सिविल सर्जन
नांगल चौधरी, नारनौल व निजामपुर ब्लाक के कुछ गांवों के भूमिगत जल में फ्लोराइड मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। चिकित्सकों के पास फ्लोरोसिस बीमारी की कोई भी दवा उपलब्ध नहीं है, केवल फ्लोरोसिस से बचाव ही इस बीमारी का समाधान है।
-डा. धर्मेश सैनी, नोडल अधिकारी, फ्लोरोसिया
समय-समय पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को फ्लोरोसिस से बचाव की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे क्षेत्र में इसके प्रति आमजन को जागरूक कर सके। ग्रामीण क्षेत्र के लोग सोचते हैं कि नहरी पानी, सतही जल भूमिगत जल की तुलना में पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता, जबकि यह धारणा बिल्कुल गलत है। बोरवेल का पानी साफ दिखाई देता तो है, लेकिन उसमें फ्लोराइड, लेड तथा आरसेनिक जैसे घातक रासायनिक पदार्थ घुले हुए होते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। पानी के ट्रीटमेंट के बाद नहरी पानी पीने के लिए पूर्णतया सुरक्षित है।
संजय कुमार, प्रोग्रामर, फ्लोराइड
नारनौल। नारनौल शहर सहित उपमंडल के अनेक गांवों में ट्यूबवेलों से आपूर्ति किए जाने वाले पानी में फ्लोराइड की मात्रा बहुत अधिक होने से पीने लायक नहीं रहा है। लेकिन मजबूरी में लोग इस हानिकारक पानी को पी रहे हैं। इस पानी के लगातार सेवन से क्षेत्र के लोगों को दांतो, हड्डियों व जोड़ों की विभिन्न असाध्य बीमारियों से जूझना पड़ रहा है। हाल ही में स्वास्थ्य विभाग ने इसके लिए फिर से गाइड लाइन जारी कर लोगों को भूमिगत पेयजल पीने से मना किया है।
नारनौल शहर के अलावा आसपास के करीब तीस से अधिक गांवों में फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम से अधिक है, जो सेवन के लिए खतरनाक मानी जाती है। वहीं आठ गांवों में तो यह मात्रा पांच मिलीग्राम से भी अधिक हो गई है। जो बहुत ही खतरनाक है।
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धीमा जहर है फ्लोराइड युक्त पानी
चिकित्सकों के अनुसार फ्लोराइड युक्त पानी के लगातार सेवन से यह पानी लोगों के लिए धीमा जहर जैसा साबित हो रहा है। वैसे तो स्वास्थ्य विभाग भी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है, क्योंकि विभाग द्वारा स्वयं भी पानी में फ्लोराइड की मात्रा की समय-समय पर जांच कराई जाती है। बावजूद स्वच्छ पेयजल उपलब्ध न कराकर विभाग ने यहां के लोगों के स्वास्थ्य को भगवान भरोसे छोड़ रखा है। चिकित्सकों के अनुसार पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा प्रति लीटर एक मिलीग्राम से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके बावजूद नारनौल शहर तथा आसपास के गांवों के भूमिगत जल में पाई जाने वाली फ्लोराइड की मात्रा का प्रतिशत काफी अधिक व चौंकाने वाला है।
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क्या होता है फ्लोराइड होने से
फ्लोराइड की मात्रा अधिक होने से दांतों में पीलापन, हड्डियों में टेढ़ापन, जोड़ों में दर्द तथा अकड़न के अलावा अनिमिया, अब्रोसन, नपुंसकता व बच्चों का आई क्यू कम हो जाता है। दंत चिकित्सक डा. गजराज के अनुसार फ्लोराइड की मात्रा पानी में अधिक होने से दांतों व शरीर में हो अनेक बीमारियां हो सकती हैं। इसलिए इससे बचाना भी बहुत जरूरी है। वहीं डा. सुरेंद्र यादव का कहना है कि पेयजल में पाई जा रही फ्लोराइड व टीडीएस की अत्यधिक मात्रा के कारण यहां के लोगों में दांतों की बीमारियों के अलावा हड्डियों तथा जोड़ों के रोगियों की संख्या निरंतर बढ़ रही है।
समय-समय पर विभाग द्वारा फ्लोराइड की मात्रा की जांच की जाती है। इसके अलावा इसको रोकने के उपाय भी विभाग द्वारा किए जाते हैं। पानी को शुद्ध करने लिए आरओ व केनाल बेस वाटर सप्लाई सबसे उपयुक्त उपाय है।
गोपाल सिंह, एसडीओ जनस्वास्थ्य विभाग
10 फीसदी बच्चे फ्लोरोसिस से प्रभावित
स्वास्थ्य विभाग की टीम द्वारा जिले के गांवों से भूमिगत जल के नमूने लिए जा रहे हैं। इसके अलावा प्राथमिक पाठशालाओं में तीसरी से पांचवीं कक्षा के बच्चों में दंत फ्लोरेसिस की जांच की जा रही है। अभी तक की गई जांच के अनुसार लगभग दस प्रतिशत बच्चे दंत फ्लोरोसिस बीमारी से प्रभावित पाएं गए हैं।
फ्लोरोसिस के कारण व बचाव
पीने के पानी में फ्लोराइड की मात्रा का अधिक होना, काला नमक व अधिक फ्लोराईड युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन, तंबाकू/सुपारी व बिना दूध की चाय का सेवन, अधिक फ्लोराईड युक्त दंत मंजन के इस्तेमाल से भी फ्लोरोसिस बीमारी होती है। इससे बचाव के लिए पीन के लिए आरओ या नहरी पानी व बरसाती जल इस्तेमाल करें। दूध, दही, हरी सब्जी का सेवन करें। खट्टे फलों तथा विटामिन सी व डी युक्त भोजन के सेवन से इसके प्रभाव को कम किया जा सकता है।
इन गांवों में है फ्लोराइड की मात्रा
गांव 2013 पीपीएम 2017 पीपीएम
कांवी 3.1 7.8
मुरारीपुर 6.2 8.5
मुलोदी 4.2 10.7
भुगांरका 5.4 7.2
भोजावास 5.6 6.4
रघुनाथपुरा 4.5 4.7
ढाणी किरारोद 4.9 5.8
फैजाबाद 5.4 7.6
मित्रपुरा 4.5 6.0
कुकसी 0.8 3.8
रामपुरा 3.3 6.8
डेरोली जाट 1.0 6.7
निम्भेहडा 4.1 4.3
अटाली 1.5 6.4
झूक 1.1 4.0
पाली 3.3 4.9
पालडी पनीहार 2.1 3.4
फ्लोराइड की अधिकता के कारण लोगों में फ्लोरोसिस नामक बीमारी हो रही है। भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार पीने के पानी में फ्लोराइड की सुरक्षित मात्रा 1.5 पीपीएम बताई गई है। इससे अधिक मात्रा में यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो रहा है। जिससे लोगों में दांतों, हड्डियों तथा पेट संबंधित बीमारियां हो रही हैं।
-डा. इंद्रजीत धनखड़, सिविल सर्जन
नांगल चौधरी, नारनौल व निजामपुर ब्लाक के कुछ गांवों के भूमिगत जल में फ्लोराइड मात्रा खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है। चिकित्सकों के पास फ्लोरोसिस बीमारी की कोई भी दवा उपलब्ध नहीं है, केवल फ्लोरोसिस से बचाव ही इस बीमारी का समाधान है।
-डा. धर्मेश सैनी, नोडल अधिकारी, फ्लोरोसिया
समय-समय पर स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों व कर्मचारियों को फ्लोरोसिस से बचाव की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे क्षेत्र में इसके प्रति आमजन को जागरूक कर सके। ग्रामीण क्षेत्र के लोग सोचते हैं कि नहरी पानी, सतही जल भूमिगत जल की तुलना में पीने के लिए उपयुक्त नहीं होता, जबकि यह धारणा बिल्कुल गलत है। बोरवेल का पानी साफ दिखाई देता तो है, लेकिन उसमें फ्लोराइड, लेड तथा आरसेनिक जैसे घातक रासायनिक पदार्थ घुले हुए होते हैं, जोकि स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होते हैं। पानी के ट्रीटमेंट के बाद नहरी पानी पीने के लिए पूर्णतया सुरक्षित है।
संजय कुमार, प्रोग्रामर, फ्लोराइड