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भारतीय संस्कृति को समझने के लिए हमें साधक बनना होगा : डाॅ. गोस्वामी
Sun, 24 May 2026 01:55 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
संवाद न्यूज एजेंसी, कुरुक्षेत्र
Updated Sun, 24 May 2026 01:55 AM IST
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कुरुक्षेत्र। प्रांत संयोजक बैठक में हिस्सा लेते कार्यकर्ता। स्वय
कुरुक्षेत्र। भारतीय संस्कृति को जानने-समझने के लिए हमें साधक बनना पड़ता है। अपने आप से संघर्ष करना पड़ता है। अपनी कुरीतियों और अपने अंदर बैठे शत्रुओं से संघर्ष करना पड़ता है। हमारे यहां अनेक स्मृतियां हैं और वे अलग-अलग काल में बनी हैं। ये स्मृतियां शास्त्र ही हैं। समाज को कैसे चलना, कैसे व्यवहार करना, कैसे चिंतन करना, ये अलग-अलग स्मृतियां इसीलिए बनी हैं कि समय जैसे-जैसे बदलता है और जड़ता आती चली जाती है। तब हमें बदलने की आवश्यकता का अनुभव होता है।
यह विचार विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. ललित बिहारी गोस्वामी ने कहे। वह विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की प्रांत संयोजकों की तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यगोष्ठी के दूसरे दिन देशभर से आए प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे। बैठक में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के संगठन मंत्री गोविंद चंद्र महंत, महामंत्री देशराज शर्मा, संस्थान की अध्यक्षा डाॅ. ममता सचदेवा एवं संस्कृति बोध परियोजना के संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित रहे। इस अवसर पर संस्थान के सह-सचिव डाॅ. पंकज शर्मा, प्रबंधक सुधीर कुमार एवं सदस्य कृष्ण कुमार भंडारी भी थे।
डाॅ. ललित बिहारी गोस्वामी ने कहा कि परम्परा सुविचारित होती है इसलिए आज जो कुछ उचित है उस उचित को हम अपनाएं लेकिन जो शाश्वत है, उसे छोड़ें नहीं। सत्यं शिवम् सुन्दरम को यदि हम छोड़ दें तो भारतीय संस्कृति पर विचार करना कठिन हो जाता है। भारतीय संस्कृति कुल मिलाकर समाज के लिए है इसलिए जब हम यहां बैठे हैं तो समाज का चिंतन करते हैं। यह हमारा सांस्कृतिक अधिष्ठान है।
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दूसरे सत्र में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के संगठन मंत्री गोविंद चंद्र महंत ने देशभर के प्रांतों से आए कार्यकर्ताओं का विवरण लिया। उन्होंने संस्कृति बोध अभियान के अंतर्गत प्रांतों की तिथियों का ब्यौरा लिया। इसके अतिरिक्त क्या-क्या करणीय कार्य होंगे इस पर भी कार्यकर्ताओं को टिप्स दिए। दोपहर बाद के सत्र मेंदुर्ग सिंह राजपुरोहित ने संस्कृति महोत्सव में आयोजित होने वाली विधाओं प्रश्नमंच, कथा-कथन, आशुभाषण, मूर्तिकला, लोकनृत्य आदि विधाओं पर दिशा-निर्देश दिए। इसके अतिरिक्त संस्थान के प्रबंधक सुधीर कुमार ने संस्कृति ज्ञान परीक्षा के विभिन्न कार्यों शुल्क प्रेषण, पुस्तक एवं प्रश्न पत्र प्रेषण, ओएमआर परीक्षा सहित अनेक कार्यों पर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।
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यह विचार विद्या भारती संस्कृति शिक्षा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डाॅ. ललित बिहारी गोस्वामी ने कहे। वह विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान की प्रांत संयोजकों की तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यगोष्ठी के दूसरे दिन देशभर से आए प्रतिभागियों को संबोधित कर रहे थे। बैठक में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के संगठन मंत्री गोविंद चंद्र महंत, महामंत्री देशराज शर्मा, संस्थान की अध्यक्षा डाॅ. ममता सचदेवा एवं संस्कृति बोध परियोजना के संयोजक दुर्ग सिंह राजपुरोहित रहे। इस अवसर पर संस्थान के सह-सचिव डाॅ. पंकज शर्मा, प्रबंधक सुधीर कुमार एवं सदस्य कृष्ण कुमार भंडारी भी थे।
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डाॅ. ललित बिहारी गोस्वामी ने कहा कि परम्परा सुविचारित होती है इसलिए आज जो कुछ उचित है उस उचित को हम अपनाएं लेकिन जो शाश्वत है, उसे छोड़ें नहीं। सत्यं शिवम् सुन्दरम को यदि हम छोड़ दें तो भारतीय संस्कृति पर विचार करना कठिन हो जाता है। भारतीय संस्कृति कुल मिलाकर समाज के लिए है इसलिए जब हम यहां बैठे हैं तो समाज का चिंतन करते हैं। यह हमारा सांस्कृतिक अधिष्ठान है।
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दूसरे सत्र में विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान के संगठन मंत्री गोविंद चंद्र महंत ने देशभर के प्रांतों से आए कार्यकर्ताओं का विवरण लिया। उन्होंने संस्कृति बोध अभियान के अंतर्गत प्रांतों की तिथियों का ब्यौरा लिया। इसके अतिरिक्त क्या-क्या करणीय कार्य होंगे इस पर भी कार्यकर्ताओं को टिप्स दिए। दोपहर बाद के सत्र मेंदुर्ग सिंह राजपुरोहित ने संस्कृति महोत्सव में आयोजित होने वाली विधाओं प्रश्नमंच, कथा-कथन, आशुभाषण, मूर्तिकला, लोकनृत्य आदि विधाओं पर दिशा-निर्देश दिए। इसके अतिरिक्त संस्थान के प्रबंधक सुधीर कुमार ने संस्कृति ज्ञान परीक्षा के विभिन्न कार्यों शुल्क प्रेषण, पुस्तक एवं प्रश्न पत्र प्रेषण, ओएमआर परीक्षा सहित अनेक कार्यों पर आवश्यक दिशा-निर्देश दिए गए।

कुरुक्षेत्र। प्रांत संयोजक बैठक में हिस्सा लेते कार्यकर्ता। स्वय