फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Kurukshetra News ›   The passion was such that he did not even care about the curfew, remained hungry and thirsty in the deserted temple for three days.

Kurukshetra News: जुनून ऐसा था कि कर्फ्यू की भी नहीं की परवाह, तीन दिन तक सुनसान मंदिर में रहे भूखे और प्यासे

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Tue, 16 Jan 2024 04:30 AM IST
विज्ञापन
The passion was such that he did not even care about the curfew, remained hungry and thirsty in the deserted temple for three days.
कुरुक्षेत्र। प्राचार्या यशपाल वधवा। संवाद
कुरुक्षेत्र। श्रीराम मंदिर को लेकर जुनून इस कदर था कि न तो पुलिस कार्रवाई की चिंता थी और न ही किसी भी प्रकार की बाधा की। बस मकसद था तो अयोध्या आंदोलन में शामिल होने का, जिसके लिए न केवल पुलिस को जगह-जगह चकमा दिया बल्कि अपनी जान की भी परवाह नहीं की। तीन दिन तक भूख व प्यास से व्याकुल गोमती नदी के किनारे सुनसान मंदिर में बिताने पड़े, लेकिन आज सुकून है कि उनके जैसे लोगों के कड़े संघर्ष की बदौलत ही न केवल श्रीराम मंदिर का निर्माण हुआ बल्कि श्रीराम लला भी 22 जनवरी को विराजमान हो रहे हैं।
विज्ञापन

श्रीराम जन्म भूमि को लेकर हुए अयोध्या आंदोलन की यादें ताजा करते हुए गीता निकेतन विद्या मंदिर मोहन नगर के प्राचार्य यशपाल वधवा बताते हैं कि वे कुरुक्षेत्र से आंदोलन के लिए निकले पहले जत्थे में शामिल थे। उस समय एबीवीपी जिला प्रमुख थे। इस जत्थे में भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे आत्म प्रकाश मनचंदा, लाडवा के विधायक रहे डॉ. पवन सैनी, सत्यप्रकाश रोशा, कृष्ण बजाज, डॉ. ओमप्रकाश अरोड़ा, सुरेश जोशी सहित अन्य लोग भी शामिल थे। लखनऊ प्लेटफार्म पर ट्रेन से उतरे तो सभी को पुलिस ने हिरासत में ले लिया, लेकिन वे खुद और डॉ. पवन सैनी, सुभाष, विजय माटा सहित सात लोग पुलिस को पानी पीने व शौच का बहाना कर चकमा देकर फरार हो गए। स्टेशन से बाहर निकले तो उन्हें राम दुलार भी मिले, जो कुरुक्षेत्र में ही पूर्व प्रधानमंत्री एवं भारत रत्न रहे गुलजारी लाल नंदा के पीए थे। उन्हें उत्तर प्रदेश के होने के नाते पूरी जानकारी थी और उन्होंने अयोध्या के लिए जाने का रास्ता दिखा दिया, ताकि पुलिस से भी बच सकें। सात किलोमीटर तक पैदल चलते हुए वे गोमती नदी के किनारे पहुंच गए, जहां गोलीकांड के चलते कर्फ्यू लगा था। यहीं पर एक सुनसान मंदिर दिखा, जिसमें सातों लोगों ने शरण ली।
विज्ञापन



गोमती नदी का पानी पीकर बुझाई प्यास, फिर देखा शव
यशपाल वधवा बताते हैं कि मंदिर में उनके पास खाने व पीने का भी कुछ नहीं बचा था और वे गोमती नदी का पानी पीकर ही भूख व प्यास बुझाने लगे थे। अगले ही दिन उन्हें नदी में शव बहता देखा तो वह पानी भी नहीं पिया जा सका। जब दूसरे साथियों की हालत भूख व प्यास से खराब होने लगी तो वे और डॉ. पवन सैनी एक बस्ती की ओर भागे ताकि कुछ खाने का बंदोबस्त किया जा सके। तभी पुलिस पीछे लगी तो एक घर का दरवाजा खुलवाकर शरण ली। उन्होंने अपनी कहानी बताई तो वहां के लोगों ने खाना भी दिया तो पुलिस अधिकारियों से बातचीत भी की। किसी तरह वहां के मौजिज लोगों ने उन्हें वहां से निकालने का प्रबंध किया तो किसी तरह वे चौथे दिन वहां से वापस लौट पाए। यहां आने पर लगभग सभी कारसेवकों का स्वागत भी किया गया। फिर 1992 के आंदोलन में भी वे अयोध्या तक पहुंच गए थे। इस दौरान भी उन्हें फैजाबाद से आगे पैदल ही सफर करना पड़ा था।
विज्ञापन
विज्ञापन



अब पूरे परिवार के साथ करेंगे श्रीरामलला के दर्शन
यशपाल वधवा का कहना है कि जो संघर्ष उस समय झेला व अपनी आंखों से देखा तो आज इतने साल बाद सपना पूरा हो रहा है। जो खुशी आज महसूस हो रही है, उसे कहा नहीं जा सकता। वे पूरे परिवार के साथ श्रीराम लला के दर्शन करने अयोध्या जाएंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed